मेरी कहानी

मेरी कहानीः मेरी मां ने कहा मैंने बेटा पैदा किया था हिजड़ा नहीं और मैंने घर छोड़ दिया

तर्कसंगत

October 18, 2017

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मैं बिहार और शिमला के बीच पला-बढ़ा हूं. किशोरावस्था में जब मेरे दोस्त लड़कियों की ओर आकर्षित होने की बातें करते तो मैं कभी उस आकर्षण को महसूस नहीं कर पाता. मुझे बहुत पहले ही ये पता चल गया था कि मैं लड़कियों के गाउन, मेकअप और ऊंची हील में ज़्यादा दिलचस्पी लेता हूं.

मुझे उस समय ये पता नहीं था कि मेरे साथ कुछ ग़लत है या अलग है लेकिन जब कोई लड़का मेरे करीब आता तो मुझे अपने बदन में अजीब सा कंपन महसूस होता.

जब मैं और थोड़ा बढ़ा हुआ तो मुझे गे शब्द के मायने समझ आए और तब मुझे ये भी पता चला कि मैं भी गे हूं.

मैंने अपनी इन भावनाओं को जब तक हो सका अपने परिवार से छुपाने की कोशिश की. एक दिन मैं फ़ोन पर अपने बॉयफ्रेंड से लड़ रहा था और मेरी एक बहन ने ये बातें सुन लीं. मुझे लगता है कि तब पहली बार उसे मुझ पर शक़ हुआ होगा. मुझे ये लगता है कि मेरी बहन ने फ़ेक प्रोफ़ाइल बनाई और क्वीर कैंपस फ़ेसबुक पेज से जुड़ गई. जब उसका शक़ पक्का हो गया तो उसने पूरे परिवार को मेरे बारे में बता दिया.

जब मेरे पिता को ये पता चला तो उन्होंने कई तरह के बहाने बनाए और कहा कि हो सकता है ये कोई मानसिक समस्या है, या हार्मोन असंतुलन है. उन्होंने कहा कि वो इसका हल खोज लेंगे. मैंने उनसे कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है.

उन्होंने मुझसे एक महीने के लिए नियमित योगा करने का आग्रह किया. उन्हें लगा कि हो सकता है कि इससे मेरा मन बदल जाए. मैं उनके लिए योग करने के लिए तैयार हो गया. एक महीने बाद मैंने उन्हें शुक्रिया किया. क्योंकि अब मुझे पक्का पता चल गया था कि मैं क्या हूं.

मैंने अपनी सच्चाई को स्वीकार कर लिया था. मेरे पिता ने कह दिया था कि जो जी चाहे करो लेकिन मेरी मां ने जो कहा था मैं उसे कभी भूल नहीं पाया हूं. उन्होंने कहा, मैंने एक बेटे को जन्म दिया था, हिजड़े को नहीं.

मैंने अपना घर छोड़ दिया. मैं अपने परिवार को और शर्मिंदा नहीं करना चाहता था. शुरुआत के दिनों में मैंने ख़ुद को बदलने की बहुत कोशिश भी की थी. लेकिन मैं नाकामयाब रहा.

ढाई साल पहले मैं मुंबई आ गया और मैंने अपनी समलैंगिक पहचान सार्वजनिक कर दी. मैंने शुरु से अपना कुछ करने की शुरुआत की, मैंने तय कर लिया कि मैं अपनी लैंगिक पहचान को अपना मूल्य नहीं तय करने दूंगा. मैं इससे कहीं ज़्यादा हूं.

जब से मैंने अपनी पहचान सार्वजनिक की है, मैं अपने लिए पहले से अधिक मज़बूती से खड़ा हो पाया हूं. जब जब लोगों ने मुझे दबाने की कोशिश की है, मैंने अपना पक्ष लिया है.

एक बार खार में मैं एक फ़िल्म की स्क्रीनिंग देखने गया था. ब्रेक के समय और पेनल चर्चा से पहले मैं और मेरी दोस्त बाहर सिगरेट पीने आए थे. तब वहां एक शराबी व्यक्ति था. दिन दहाड़े वो व्यक्ति मेरे पास आया और निजी अंग पकड़ लिए. मैंने प्रतिक्रिया में उस व्यक्ति को थप्पड़ जड़ दिया. इस दौरान उसके चार पांच दोस्त आ गए जिन्होंने मुझे बहुत मारा. वहां मौजूद लोगों में से किसी ने भी मुझे नहीं बचाया.

कुछ देर बाद एक लड़की दौड़ती हुई आई, उसने मेरा हाथ पकड़ा और खींचते हुए मुझे संकरे रास्ते से बचाते हुए ले गई. लेकिन मैंने इस घटना को यूं ही नहीं जाने दिया. मैंने एफ़आईआर दर्ज करवाई. मैं पुलिस के साथ फिर से घटनास्थल पर गया, हमला करने वाले लोगों की पहचान करवाई और ये सुनिश्चित किया कि वो अपने किए के लिए जेल जाएं.

क्योंकि ये सिर्फ़ मेरा मसला नहीं था. ये मुझसे कहीं बड़ा मसला था. हम लोग जैसे हैं वैसे अपनी पहचान के साथ जिना चाहते हैं, बिना इस तरह के शोषण और उत्पीड़न के. हम आधारभूत मानवता के साथ जीना चाहते हैं. क्या हम लोग बहुत ज़्यादा मांग रहे हैं?

“I grew up in between Bihar and Shimla. During my teens, I could never relate to boys by my age when they spoke about…

Posted by Humans of Bombay on Tuesday, 17 October 2017


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