मेरी कहानी

मेरी कहानीः फिरोज़ की आंखें नहीं हैं लेकिन उन्होंने मेरी अंधी ज़िंदगी में रोशनी भर दी है

तर्कसंगत

October 18, 2017

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जब मैं तीन साल की थी तब टाइफ़ाइड की वजह से मेरी आंखों की रोशनी चली गई. जिस साल मैंने अपनी आंखें खोई उसी साल मेरे पिता भी दुनिया छोड़ गए. अंधपन मेरी ज़िंदगी में किसी अभिशाप की तरह आया. मेरी मां के अलावा कोई मुझसे ठीक से बात तक नहीं करता था.

सब लोग मेरे पीछे मेरे बारे में बात करते और मेरी मज़ाक बनाते थे. मेरी बहन तक ये कहती थी कभी मेरी शादी और बच्चे नहीं होंगे. कभी मेरा अपना घर नहीं होगा. कभी कोई मुझे प्यार नहीं करेगा. बचपन में मैं सब चीज़ों से कट सी गई थी. मैं हमेशा लोगों से ख़ुद को छुपाने की कोशिश करती रहती.

मेरे ज़िंदा रहने की सिर्फ़ एक ही वजह थी- मेरी मां. मैंने अपनी मां की आंखों से इस दुनिया को देखा. मेरी पढ़ाई जारी रखने के लिए वो दूसरे को घरों में नौकरानी बन गईं. लेकिन बीते साल मेरी मां का भी देहांत हो गया और उनके साथ वो आंखें भी चली गईं जिनसे मैं दुनिया देखती थी.

फ़िरोज़ से मेरी पहचान एक दोस्त के ज़रिए हुई थी. जब मैं पहली बार एक पार्क में फ़िरोज़ से मिली तो उनसे बात करके ऐसा लगा जैसे हम दोनों एक दूसरे को सालों से जानते हैं. जब हम अंधे होने की वजह से होने वाली परेशानियां को साझा कर रहे थे तब ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने आप से ही बात कर रही हूं. कुछ मिनटे में ही हम एक दूसरे के बहुत क़रीब आ गए. हम दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़कर रोने लगे. फिरोज़ ने मुझे बताया कि अपने चौबीस साल के जीवन में उन्होंने ऐसा पहले कभी महसूस नहीं किया है. वो मुझे थामे हुए थे और बच्चों की तरह रो रहे थे.

पूरा दिन हम एक दूसरे के साथ टहलते रहे. अपने सपनों के बारे में बातें की, अपनी परेशानियों को साझा किया. पूरे समय मैंने फिरोज़ का हाथ पकड़ा हुआ था. वो ही मुझे रास्ता बता रहे थे. कुछ ही मिनटों में मैं ये भूल गई कि मैं अकेली हूं और ज़िंदगी में खोई हुई सी हूं. उसी शाम फिरोज़ ने मुझे शादी का प्रस्ताव दिया. हमने अपने होने वाले बच्चे के बारे में भी सपने देख लिया और उसका नाम तक सोच लिया. हमने कहा कि अगर बेटी हुई तो हम उसका नाम स्नेहा रखेंगे.

22 दिन पहले हम दोनों ने शादी कर ली है. लेकिन हमारे पास रहने के लिए अपनी कोई जगह नहीं है. मैं अपनी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहती हूं और फिरोज़ अपने परिवार के साथ रहते हैं. जब हम एक दूसरे को बहुत मिस करते हैं तो किसी होटल में साथ में वक़्त बिताते हैं. ये तीसरी बार है जब हम अपनी शादी के बाद एक होटल में रुकने आए हैं. हम दोनों दो दिन एक दूसरे के साथ बिताते हैं. फिरोज़ बसों में किताबें बेचते हैं और बहुत कम ही कमा पाते हैं. इतने कम पैसों में हम दो दिन से ज़्यादा साथ नहीं रह सकते हैं.

हमारी शादी के दिन फिरोज़ ने मेरे लिए नाक में पहनने की सोने की लोंग ख़रीदीं थी. हमारी ज़िंदगी नर्क से स्वर्ग में बदल गई है. जब हम चलते हैं तो फिरोज़ हमेशा मेरा हाथ थामते हैं. खुला आसमन और हवा हमें सुकून देती है.

जब मैं अपनी मां को याद करके रोती हूं तो मेरे दर्द से फिरोज़ की आंखें भी भीग जाती हैं. लेकिन अब मैं गुमसुम नहीं रहती.

लेकिन फिरोज़ की मां ने मुझे स्वीकार नहीं किया है क्योंकि मैं भी देख नहीं सकती हूं और उन्हें लगता है कि दो अंधे साथ में कैसे ज़िंदगी बिता पाएंगे. लेकिन फिरोज़ ने उनसे कहा है कि सिर्फ़ एक अंधा व्यक्ति ही एक अंधे व्यक्ति के दर्द को समझ सकता है. दो अंधे लोग मिलकर ही एक दूसरे को पूर्ण कर सकते हैं. फिरोज़ अपनी मां को मनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं. हम उम्मीद करते हैं कि एक दिन वो हमें स्वीकार कर लेंगे और हमें एक साथ रहने के लिए घर मिल जाएगा.

-रिहाना 24, फिरोज़ 24

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Posted by GMB Akash on Thursday, 5 October 2017


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