मेरी कहानी

मेरी कहानीः अगर मेरी मां के साथ ऐसा होता तो मैं क्या करता? ये सवाल मेरे मन में कौंधता रहा

तर्कसंगत

October 27, 2017

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मैं मुंबई के एक स्लम में पला बढ़ा हूं. मेरे पिता का काम बहुत अच्छा नहीं था इसलिए घर चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी मां पर थी जिन्हें दो वक्त की रोटी का इंतेज़ाम करने के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी.

उन्होंने कैटरिंग का अपना काम शुरू किया और कई बार उन्हें रोज़ाना 12 घंटों से ज़्यादा काम करना पड़ता था.

मेरी मां अक्सर रात में देर से घर आती और हमारी झुग्गी बस्ती के लोग इस बात को लेकर उन पर फ़ब्तियां कसा करते थे. लेकिन मेरी नज़र में मां के लिए इज़्ज़त और बढ़ गई थी.

सौलह साल की उम्र में मैंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और मां की मदद के लिए काम करना शुरू कर दिया.

मेरी पहली नौकरी एक ऑफ़िस बॉय की थी. मैं कंप्यूटर ठीक करने में भी मदद करता था. मैं सबसे पहले ऑफ़िस पहुंचता था और सबसे बाद में ऑफ़िस से जाता था.

मैं हमेशा सीखने की कोशिश करता, ज़्यादा काम करने की कोशिश करता.

समय के साथ ऑफ़िस में मेरा क़द बढ़ता गया और मैं ऑफ़िस बॉय से सेल्समैन बन गया. कुछ ही सालों में एक चर्चित एड एजेंसी में मेरी नौकरी लग गई. ज़िंदगी कहां से कहां पहुंच गई थी.

इसी दौरान एक घटना ने मेरी ज़िंदगी बदल दी. मुझे ऑफ़िस जाने के लिए रोज़ ट्रेन से सफर करना होता था.  मैंने देखा कि महिला डिब्बे में चढ़ने की कोशिश कर रही महिलाओं के साथ कुछ पुरुष छेड़छाड़ कर रहे हैं. मैं उन लोगों से अकेले नहीं लड़ सकता था. इसलिए मैं पुलिस के पास गया लेकिन पुलिस ने शुरुआत में मेरी शिकायत को खारिज करने की कोशिश की.  तब तक वो पुरुष भी जा चुके थे.

लेकिन इस घटना ने मुझ पर ग़हरा असर डाला. मैंने सोचा कि मेरी मां भी देर से घर आती हैं और अगर रास्ते में उन्हें इस तरह के हालात का सामना करना पड़ता तो क्या मैं कुछ नहीं करता? क्या मैं कुछ नहीं करता? ये सवाल मेरे मन में कौंधता रहा.

मैंने और मेरे एक दोस्त ने इस बारे में अधिक जानकारियां जुटाना शुरू किया. हमें पता चला कि ऐसे पुरुष तो सैकड़ों की तादाद में हैं और सफर करने वाली अधिकतर महिलाओं ने इस तरह की छेड़छाड़ या डर का सामना किया था.

मैंने एचडी कैमरा वाला एक चश्मा ख़रीदा. मैं महिला डिब्बे के किनारे पर खड़े हो जाता और जो भी सामने हो रहा होता वो रिकॉर्ड होता रहता. लेकिन इन वीडियो ने मुझे बहुत प्रभावित किया. मुझे उन महिलाओं की तरह महससू हुआ जो रोज़ इस तरह के हालातों का सामना करती हैं.

हमने ये वीडियो पुलिस को दिखाए. अच्छी बात ये थी कि इस बार वो स्थिति की गंभीरता को समझ पाए थे. चालीस पुलिसकर्मियों की टीम ने हमारे साथ काम करना शुरू कर दिया. हर दिन ये पुलिसकर्मी और मैं दो ट्रेन स्टेशनों के बीच खड़े होते. वीडियो की लाइव फीड में छेड़खानी करने वाले लोग दिख जाते. जब तक वो अगले स्टेशन पर पहुंचते पुलिस वहां उनका इंतेज़ार कर रही होती.

छह महीने के भीतर ही हमने छेड़खानी करने वाले 140 लोगों को गिरफ़्तार करवा दिया. इन्हें जेल भेज दिया गया. हमारी लड़ाई अभी जारी है.

अब मैं अब घरेलू हिंसा के मामले भी उठाता हूं और ऐसी महिलाओं की आवाज़ भी उठाता हूं जो किसी भी परिस्थिति में डर महसूस करती हैं. उनकी मदद के लिए जो भी मुझसे हो सकता है, मैं करता हूं.

मैने जो भी किया वो इसलिए किया क्योंकि जानवरों की तरह व्यवहार कर रहे इन पुरुषों के लिए मैंने कहीं न कहीं खुद को भी ज़िम्मेदार माना.

इस तरह के कुछ सौ लोग ऐसी हरकतें करते हैं और इनकी वजह से हर जगह पुरुषों पर शक़ किया जाता है. मैं बस इसी में संतुलन स्थापित करना चाहता था. मैं ये बताना चाहता था कि सभी पुरष ऐसे नहीं है.

मेरे मन में महिलाओं के प्रति गहरा सम्मान है और इसकी शुरुआत मेरे घर से ही हुई. मैं अपनी मां का बहुत सम्मान करता हूं. मेरी मां ने मुझे अच्छी शिक्षा दी.

मुझे लगता है कि हमें यही संदेश दुनिया को देने चाहिएघर में अच्छे बेटे पैदा करो, दुनिया में महिलाओं का सम्मान न करने वाली की संख्या अपने आप कम हो जाएगी.

दीपेश टांक


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