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झारखंडः स्वर्ण पदक विजेता तीरंदाज़ कर रहा है मनरेगा में मज़दूरी

तर्कसंगत

November 10, 2017

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झारखंड में एक स्वर्ण पदक विजेता तीरंदाज़ अब मनरेगा के तहत मज़दूरी कर रहे हैं.

अशोक सोरेन ने साल 2008 में जमशेदपुर में हुई दक्षिण एशियाई तीरंदाज़ी प्रतियोगिता में भारत के लिए दो स्वर्ण पदक जीते थे.

लेकिन 28 वर्षीय अशोक सोरेन ने अब खेलना छोड़ दिया है. वो जमशेदपुर के भिलाई पहाड़ी इलाक़े में मिट्टी के बने कच्चे घर में रहते हैं.

जिन हाथों में तीर कमान हुआ करता था उनमें अब कुदाल फावड़ा आ गया है.

जिन अशोक के तीर निशाने भेदते थे वो अब अपने परिवार का पेट पालने की जुगत में लगे हैं.

अशोक सोरेन 2005 में ट्राइबल स्पोर्ट्स मीट में चमके थे और अपनी तीरंदाज़ी से सबको चकित कर दिया था.

अशोक ने 2006 में राज्य स्तरीय जूनियर तीरंदाज़ी में रजत जीता था. अगले साल उन्होंने राज्यस्तरीय सीनियर तीरंदाज़ी में उन्होंने स्वर्ण पद क जीता.

इसके अगले साल जमशेदपुर में हुए दक्षिण एशियाई तीरंदाज़ी प्रतियोगिता में अशोक ने दो स्वर्ण पदक जीतकर धमाल मचा दिया था.

लेकिन साल 2008 में ही अशोक की मां का देंहात हो गया. इस सदमे से अशोक उबर नहीं पाए.

परिवार के पास ज़मीन बेहद कम थी जिसकी वजह से उनके सामने पेट भरने का संकट पैदा हो गया.

साल 2015 एक हादसे में पैर गंवाने के बाद अशोक अब बैसाखियों के सहरे चलते हैं.

कुछ दिन पहले स्थानीय अख़बारों में मनरेगा करते अशोक की तस्वीर प्रकाशित हुई थी.

बीते तीन सालों से वो मनरेगा के तहत ही मज़दूरी करके अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने के बाद भी अपने खेल के दम पर अशोक कोई नौकरी नहीं पा सके.

अशोक फिर से तीरंदाज़ी करना चाहते हैं, उन्हें मौके की तलाश है, जो मिलता अब बहुत मुश्किल दिख रहा है.


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