मेरी कहानी

मेरी कहानीः मैंने मनोचिकित्सक की मदद ली, ये मेरा सबसे अच्छा काम है

तर्कसंगत

November 13, 2017

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क़रीब तीन साल पहले की बात है, मुझे अहसास हुआ कि मेरे साथ सबकुछ ठीक नहीं है. इसकी शुरुआत कुछ ख़राब दिनों से हुई और थोड़े ही दिनों में ये स्थिति स्थायी हो गई. मुझे लगता था कि कोई मुझे गंभीरता से नहीं लेगा. मैं हर समय दुखी और उदास रहती थी और अंततः मैंने अपे दोस्तों और परिवार को बताने का फ़ैसला लिया.

मैं उस समय चौदह साल की थी और ज़्यादातर लोगों ने इसे किशोरावस्था कहकर खारिज कर दिया था. बीतते समय के साथ मेरे हालात और ख़राब होते गए.

मैं कई दिनों तक ख़ुद को घर में क़ैद करके रखती. लोगों से मिलना जुलना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा था. ऐसा लगता था जैसे कोई काला बादल मेरे ऊपर हावी होता जा रहा हो. सुबह उठना ही एक बेहद मुश्किल काम लगता था. मुझे बार-बार स्वयं को नुक़सान पहुंचाने के ख़्याल आते थे.

इस साल जनवरी में, एक बेहद ख़राब रात में, मैंने स्वंय को बिलकुल टूटा हुआ महसूस किया. मुझे लगा कि अब मैं इन हालातों को एक और दिन बर्दाश्त नहीं कर पाउंगी और अब मुझे कुछ करना ही चाहिए.

मैंने एक मनोवैज्ञानिक से समय लिया और अपनी मां को अपने साथ लेकर गई. डॉक्टर ने बताया कि मैं असवाद और ‘सोशल एंग्ज़ाइटी’ से पीड़ित हूं.

मुझे अंततः जवाब मिल गया था कि मैं पागल नहीं हूं बल्कि मेरे साथ एक समस्या है जिसे सुधारा जा सकता है.

मैंने दवाई लेनी शुरू कि और एक बार जब मैंने अपने और इलाज के ऊपर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया तो चीज़ें बेहतर होती गईं. मैंने हंसना और जीवन के हर पल का आनंद लेना सीख लिया. जीवन के बुरे और अच्छे पहलुओं को स्वीकार करना सीख लिया. कुछ ही दिन बाद मुझे कोई मिल भी गया.

हमने अपने जीवन के और सारी दुनिया के बारे में बातें की. हालांकि हम किसी रिश्ते में नहीं बंधे थे लेकिन हमें एक दूसरे का साथ बहुत अच्छा लगता था.

उसे मेरी मानसिक स्थिति के बारे में जानकारी थी लेकिन पहले मैं जिस तरह अपने आप को लेकर शर्मिंदा रहती थी उसके बजाए मैंने उसे बताया कि मुझे अपने आप पर गर्व है. बदलाव की शुरुआत यहीं से हुई.

एक बार जब आप स्वयं को स्वीकार कर लेते हैं तब दुनिया के पास आपको स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता.

यहां तक पहुंचने में उसने बहुत मदद की है. उसने मुझे छोटी छोटी बातों में विशेष महसूस करवाया है. वो कभी मेरे लिए फूल लेकर आता तो कभी कहता कि मुझे तुम पर गर्व है.

वो मेरी पूरी दुनिया नहीं है बल्कि मेरी दुनिया का एक हिस्सा है. लेकिन मैं अपने जीवन के सबसे ख़ुशहाल दौर में हूं. मैं इतनी ख़ुश कभी नहीं रही थी.

जनवरी की उस रात ने सबकुछ बदल दिया है. मैंने जैसी ही अपनी मदद करने का फ़ैसला किया, हालात भी बदलते गए.

अगले सप्ताह मैं अपनी मां के साथ थेरेपी कराने जा रही हूं. मैं जानती हूं कि ये मुझे मां के और करीब ले आएगा. मेरे परिवार के बाकी लोग अभी मेरे अवसाद को पूरी तरह नहीं समझ पाएं हैं लेकिन मुझे उम्मीद है कि जल्द ही एक दिन वो भी मुझे स्वीकार कर ही लेंगे.

मैं जो सबसे महत्वपूर्ण बात कहना चाहती हूं वो ये है कि सिर्फ़ आप ही अपने आप की मदद कर सकते हैं. ठीक न होने और मदद लेने में कोई बात नहीं हैं. ये बिलकुल सामान्य है.

मैंने हाल ही में उन अंधेरे दिनों में लिखी अपनी एक कविता पढ़ी. ये कविता आत्महत्या के बारे में है. मैं यक़ीन नहीं कर पा रही हूं कि मैंने ऐसा लिखा था. मैंने बहुत लंबा सफर तय कर लिया है और मुझे ख़ुद पर गर्व है.

अपनी अब तक की यात्रा की याद में मैंने अपने शरीर पर सेमीकॉलन का टैटू गुदवा लिया है. ये मेरी ओर से मुझे तोहफ़ा है.

लेखक जब एक वाक्य समाप्त करना चाहते हैं लेकिन करते नहीं हैं तब सेमीकॉलन का इस्तेमाल करते हैं. ये वो स्मरणचिन्ह है जो मैं अपने लिए चाहती हूं.

भले ही मैं रुकी हूं, मेरे जीवन में मुश्किल समय रहा है लेकिन कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है. जीवन का वाक्य अभी पूरा नहीं हुआ है.

"About 3 years ago, I started feeling like something just wasn’t right. It started with a few bad days at first, but…

Posted by Humans of Bombay on Friday, 10 November 2017


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