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डूबते को ड्रम का सहारा, तेल के ड्रम के सहारे म्यामांर से बांग्लादेश आया नबी हुसैन

तर्कसंगत

November 13, 2017

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जिंदा रहने की ललक में और मौत को मात देने की कोशिश में नबी हुसैन ने कुछ ऐसा किया जिसपर यकीन करना मुश्किल है लेकिन यही सच्चाई है . रोहिंग्या मुसलमान किशोर नबी की उम्र महज 13 साल है और उसे तैरना नहीं आता. नबी हुसैन ने जिंदा रहने की जंग एक पीले रंग के प्लास्टिक के ड्रम के सहारे जीती.

उसने म्यांमार से बांग्लादेश तक का समुद्र का सफर पीले रंग के प्लास्टिक के खाली ड्रम पर मजबूत पकड़ के सहारे लहरों को मात देकर पूरा किया. म्यांमार में अपने गांव से भागने से पहले उसने कभी करीब से समुद्र नहीं देखा था. करीब ढाई मील की इस दूरी के दौरान समुद्री लहरों के थपेड़ों के बावजूद उसने ड्रम पर अपनी पकड़ नहीं छोड़ी. जिस कारन वो सही सलामत पड़ोसी देश बांग्लादेश पहुंच गया.   

म्यांमार में हिंसा की वजह से रोहिंग्या मुसलमान अपना सब कुछ छोड़ कर वहां से निकलने की कोशिश में तैरकर पड़ोस के बांग्लादेश जाने की कोशिश कर रहे हैं. एक हफ्ते में ही तीन दर्जन से ज्यादा लड़के और युवकों ने खाने के तेल के ड्रमों का इस्तेमाल छोटी नौके के तौर पर नफ नदी को पार करने के लिये किया और शाह पोरिर द्वीप पहुंच गये.

पतलेदुबले नबी ने कहा कि मैं मरने को लेकर बेहद डरा हुआ था. मुझे लगा कि यह मेरा आखिरी दिन होने वाला है. अगस्त के बाद से करीब छह लाख रोहिंग्या बांग्लादेश जा चुके हैं. कमाल हुसैन (18) भी तेल के ड्रम के सहारे ही बांग्लादेश पहुंचा था. उसने कहा कि हम बेहद परेशान था इसलिये हमें लगा कि पानी में डूब जाना कहीं बेहतर होगा.

नबी इस देश में किसी को नहीं जानता और म्यांमार में उसके मातापिता को यह नहीं पता कि वह जीवित है. उसके चेहरे पर अब पहले वाली मुस्कान नहीं रहती और वह लोगों से आंख भी कम ही मिलाता है. नबी अपने मातापिता की नौ संतानों में चौथे नंबर का था. म्यामांर में पहाड़ियों पर रहने वालो उसके किसान पिता पान के पत्ते उगाते थे.

समस्या तब शुरू हुई जब एक रोहिंग्या विद्रोही संगठन ने म्यामांर के सुरक्षा बलों पर हमला किया. म्यांमार के सुरक्षा बलों ने इसपर बेहद सख्त कार्रवाई की और सैन्य कार्रवाई के दौरान ढेर सारे लोग मारे गये, उनके घरों व संपत्तियों को आग लगा दी गयी. नबी ने जब आखिरी बार अपने गांव को देखा था तब वहां सभी घर जलाये जा चुके थे. 

फोटो- गांव कनेक्शन


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