सप्रेक

सप्रेकः मुंबई की झुग्गी से इसरो के वैज्ञानिक तक का सफ़र

Poonam

December 6, 2017

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दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की कामयाबी की कहानी लाखों लोगों को प्रेरित करती रही है.

ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है प्रथमेश हिर्वे की जो इसरो में वैज्ञानिक के पद पर चुने गए हैं.

25 साल के प्रथमेश ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है.

मुंबई की एक झुग्गी झोपड़ी में दस बाई दस के कमरे में रहने वाले प्रथमेश हिर्वे ने इसरो के लिए चयनित होकर साबित कर दिया है कि जहां चाह होती है वहां राह निकल ही आती है.

प्रथमेश के लिए हालात कितने मुश्किल थे इसका अंदाज़ा आप इस बात सा लगा सकते हैं कि जिस कमरे में वो पढ़ाई करते थे उसी में उनके मातापिता सोते भी थे.

ऐसे में जब प्रथमेश पढ़ने के लिए ट्यूबलाइट जलाते तो उनके मांबाप को अपनी नींद से समझौता करना पड़ता.

अपनी कामयाबी पर प्रथमेश हिर्वे ने कहा, “मुझे बहुत ख़ुशी है. मेरे संघर्ष का नतीजा निकला है. देश की सेवा करने के अपने उद्देश्य की ओर आगे बढ़कर बहुत ख़ुशी हो रही है.”

दस बाई दस के कमरे में अपने मांबाप के साथ रहना मेरे लिए अलग तरह का अनुभव था. मैं जब रात में पढ़ता था तब मेरे मम्मीपापा को नींद त्यागनी पढ़ती. वो अपनी नींद त्यागते रहे और मुझे पढ़ाई के लिए बढ़ावा देते रहे. उन्हें भरोसा था कि मैं एक दिन कामयाब हो जाउंगा.”

हिर्वे के पिता ने कहा, “पहली कक्षा से दसवीं तक उसने जो भी पढ़ाई की उसका पूरा श्रेय उसकी मम्मी को जाता है जो हर दिन उसकी पढ़ाई के बारे में पूछती थीं और उसका काम हमेशा पूरा रखवाती थीं.”

उन्होंने कहा, “मुझे बेहद ख़ुशी है कि मेरे बेटे का इतनी बड़ी जगह के लिए चयन हुआ है.”

रेड एफ़एम से बात करते हुए हिर्वे ने कहा, “मैंने दसवीं तक की पढ़ाई मराठी माध्यम से की है. उसके बाद मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है. लेकिन मेरा कैंपस सेलेक्शन नहीं हुआ था. मेरा मुख्य टार्गेट यूपीएससी की इंजीनियरिंग सेवा की परीक्षा पास करना था.”

हिर्वे कहते हैं, “मैंने प्रीलिम परीक्षा पास कर ली थी लेकिन गणित में फेल हो गया था. अंततः मैंने इसरो की परीक्षा पास कर ली.”

हिर्वे कहते हैं, “मेरी कामयाबी की सबसे ज़्यादा ख़ुशी मेरे मातापिता को है. उन्हें बचपन से अब तक की हर बात याद आ रही है. वो एक साथ हंस रहे हैं और रो भी रहे हैं.”

हिर्वे कहते हैं, “मेरे लिए सबसे अच्छी बात थी अपने मम्मीपापा के साथ रूम साझा करना. वो देखते रहते थे कि मैं क्या कर रहा हूं. मम्मीपापा से जो बात होती थी उससे बहुत बढ़ावा मिलता था. मांबाप के साथ पांचदस मिनट की बातचीत बच्चों को बहुत प्रेरित करती है.”

प्रथमेश के पास पढ़ने के लिए अपना कमरा नहीं था. लेकिन उन्होंने अपनी इसी मुश्किल को अपनी कामयाबी की वजह बना लिया.

हम प्रथमेश हिर्वे के जज़्बे को सलाम करते हैं और उम्मीद करती है कि उनकी कामयाबी की ये कहानी अन्य छात्रों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी.

Source: Mid Day, Red FM, The Times of India


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