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सचेतः भटिंडा से बीकानेर जाने वाली ट्रेन क्यों हो गई कैंसर एक्सप्रेस?

Poonam

December 14, 2017

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पिछले एक दशक के दौरान पता नहीं कब भटिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नामकैंसर एक्सप्रेसपड़ गया.

लोग अब ऐसे नाम से ट्रेन को बुलाये जाने पर चौंकते नहीं। कोई प्रतिक्रिया ही ना आना और भी अजीब लगता है. पंजाब के भटिंडा, फरीदकोट, मंसा, संगरूर जैसे कुछ जिले जिनको मालवा भी कहा जाता था, वो पूरा इलाका ही कैंसर को आम बीमारी मानने लगा है। इसकी वजह भी बिलकुल सीधीसाधारण सी है.

हरित क्रांति लाने में जुटे, कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि इतने खेत में पचास मिलीलीटर कीटनाशक लगेगा, उससे सुनकर आये किसान ने सोच ये चार पांच चम्मच में क्या होगा भला ? तो उसने पचास का सौ कर दिया लेकिन पंजाब काकिसानखुद तो खेती करता नहीं उसने अपने बिहारी मजदूर को कीटनाशक छिड़कने दिया. मजदूर ने सोचा ये भी कम है, तो सौ बढ़कर डेढ़ सौ मिलीलीटर हो गया.

जब ज्ञानीगुनी जन चाय और तम्बाकू में कैंसर की वजह ढूंढ रहे थे तो उनके पेट में लीटरकिलो के हिसाब से पेस्टीसाइड जा रहा था. पंजाब के किसान प्रति हेक्टेयर 923 ग्राम कीटनाशक इस्तेमाल कर रहे होते हैं, जबकि देश भर में ये औसत 570 ग्राम/हेक्टयेर है. पंजाब में सिर्फ खाने का गेहूं ही नहीं उपज रहा होता यहाँ कपास भी उपजता है. वैज्ञानिक मानते हैं की कपास पर इस्तेमाल होने इन वाले 15 कीटनाशकों में से 7 या तो स्पष्ट रूप से या परोक्ष रूप से कैंसर की वजह होते हैं.

खेती भारत में एक परंपरा है, संस्कृति है. संस्कृति वो नहीं होती जो आप कभी पर्वत्यौहार पर एक बार कभी साल छह महीने में करते हों, वो हर रोज़ सहज ही दोहराई जा रही चीज़ होती है.

अपने मवेशी को चारा देना, खेतों को देखने जाना, बीज संरक्षण, जल संसाधन ये सब रोज दोहराई जा रही संस्कृति का ही हिस्सा हैं. खाने में गेहूं की रोटी ना हो, या पहनने को सूतीकपास ना हो ऐसा एक दो दिन के लिए करना भी भारत के एक बड़े वर्ग के लिए अजीब सा हाल हो जाएगा.

इस संस्कृति को हमने छोड़ा कैसे ? ज्यादा उपज के लालच में प्रकृति से छेड़छाड़ भर नहीं की है. सबसे पहले उसके लिए अपनी परम्पराओं को तिलांजलि दे डाली. बीज जो संरक्षित होते थे, स्थानीय लाला के पास से खरीदेकर्ज पे लिए जाते थे उनके लिए कहीं दूर की समाजवादी दिल्ली पर आश्रित रहना शुरू किया। जो तकनीक दादादादी की गोद में बैठे सीख ली थी, वो बेकार मान ली। फिल्मों ने बताया लाला धूर्त, पंडित पाखंडी, जमींदार जालिम है। हमने एक, दो, चार बार, बारबार देखा और उसे ही सच मान लिया.

बार बार एक ही बात देखते सुनते हमने मान लिया कि पुराना, परंपरागत तो कोई ज्ञानविज्ञान है ही नहीं हमारे पास ! “स्वदेशका इंजिनियर कहीं अमेरिका से आएगा तो पानीबिजली लाएगा, गाँव में इनका कोई पारंपरिक विकल्प कैसे हो सकता है ? नतीजा ये हुआ कि रोग प्रतिरोधक, कीड़े ना लगने वाली फसलें पिछले कुछ ही सालों में गायब हो गई. बीज खरीदे जाने लगे, संरक्षित भी किये जाते हैं ये कोई सोचता तक नहीं. किसी ने जानने की जहमत नहीं उठाई की आर.एच.रिछरिया के भारत के उन्नीस हज़ार किस्म के चावल कहाँ गए.

उनकी किताब 1960 के दशक में ही आकर खो गई और जब बरसों बाद कोरापुट (ओड़िसा) के किसान डॉ. देबल देव के साथ मिलकर धान के परंपरागत बीज संरक्षित करने निकले तो भी वो करीब दो हज़ार बीज एक छोटे से इलाके से ही जुटा लेने में कामयाब हो गए.

इसमें जो फसलें हैं वो बीमारीकीड़ों से ही मुक्त नहीं हैं. कुछ ऐसी हैं जो कम से कम पानी में, कोई दूसरी खारे पानी में, तो कोई बाढ़ झेलकर भी बच जाने वाली नस्लें हैं. इनमें से किसी को कीटनाशक की भी जरूरत नहीं होती इसलिए इनको लगाने का खर्च भी न्यूनतम है.

रासायनिक खादकीटनाशक के इस्तेमाल को बंद कर के उत्तर पूर्व का मनिपुर करीब करीब 100% जैविक (organic) खेती करने लगा है. अन्य राज्यों में भी किसानों ने समाजवादी भाषण सुनना बंद कर के जैविक खेती की शुरुआत की है. कम पढ़े लिखे के मुकाबले अब शिक्षित युवा भी खेती में आने लगे हैं. संस्कृति से कट चुके किसानों के परिवार जहाँ मजदूरी के लिए शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं, वहीँ युवाओं का एक बड़ा वर्ग खेती की तरफ भी लौटने लगा है.

पंजाबी पुट लिए अक्षय कुमार अभिनीत एक फिल्म आई थीचांदनी चौक टू चाइना.  वहां आलू के अन्धविश्वास में जकड़े नायक को उसका मार्शल आर्ट्स का गुरु सिखाता है कि मुझे तुम्हारी उन हज़ार मूव्स से खतरा नहीं जिसे तुमने एक बार किया है, मुझे उस एक मूव से डर है जिसका अभ्यास तुमने हज़ार बार किया है. नैमिषारण्य में जब संस्कृति के रोज दोहराए जाने वाली चीज़ की बात हो रही थी तो मेरे दिमाग में कोई कलाशिल्प, नाटकनृत्य नहीं आ रहे थे। मेरे दिमाग में रोटीकपड़े के लिए की जा रही खेती चल रही थी जो रोज की जाती है। हमारी संस्कृति तो कृषि है.

बाकी संस्कृति को किसी आयातित विचारधारा ने कैंसर की तरह जकड़ लिया है, या फिर संस्कृति को छोड़कर, आयातित खातेसोचतेपहनते हम कैंसर की जकड़ में आ गए हैं, ये एक बड़ा सवाल होता है। और बाकी जो है, सो तो हैइये है !

आनंद कुमार के फ़ेसबुक वॉल से

पिछले एक दशक के दौरान पता नहीं कब भटिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम “कैंसर एक्सप्रेस” पड़ गया। लोग अब ऐसे नाम स…

Posted by Anand Kumar on Wednesday, December 13, 2017


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