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अंतरिक्ष में इसरो ने लगाया शतक, पाकिस्तान को हुई चिंता जिसके लिए आज भी खुद की सेटेलाइट एक सपना जैसा है

Poonam

January 13, 2018

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अंतरिक्ष में भारत ने कामयाबी की नई बुलंदियों को छु लिया है, जिससे पाकिस्तान परेशान हो गया है और चीन चिंता में आ गया है. इसरो ने 12 जनवरी को 31 सैटेलाइट्स को लॉन्च किया. जिसमें इसरो का कार्टोसैट 2 यानि रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट भी शामिल है. और इसी ने पाकिस्तान और चीन की नींद उड़ा दी है..

अंतरिक्ष में भारत द्वारा सैटेलाइट छोड़ने से भले ही पाकिस्तान परेशान है लोकिन आपको ये बात जानकर और हैरानी होगी की पाकिस्तान ने अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत से 8 साल पहले ही शुरू किया था. अंतरिक्ष और सैटेलाइट की दुनिया में जहां भारत नए किर्तीमान बनाता जा रहा है वहीं पाकिस्तान के लिए आज भी खुद की सेटेलाइट एक सपना जैसा है.

5 दशकों में हमारे देश की स्पेस एजेंसी इसरो ने दुनिया भर में अपनी साख कायम कर ली है जबकी पाकिस्तान की स्पेस एजेंसी सुपारको अब तक सुपर फिसड्डी साबित हुई है. पाकिस्तान ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत से आठ साल पहले 1961 में शुरू किया था.लेकिन पाकिस्तान 57 साल में भी खुद का सैटेलाइट तक नहीं बना पाया और इसरो ने कम वक्त में ही कई वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए हैं .

पाकिस्तान स्पेस साइंस में किस कदर पिछड़ चुका है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उसने अपने सेटेलाइट के लिए दो-चार साल नहीं बल्की 23 साल बाद का टारगेट तय किया है. वो साल 2040 तक खुद का सैटेलाइट और लांचिंग पैड बनाने के मिशन पर काम कर रहा है.

पाकिस्तान की नेशनल स्पेस एजेंसी की नींव वैज्ञानिक अब्दुस सलाम की सलाह पर पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अय्यूब खान ने रखी थी. ये वो दौर था जब विज्ञान जगत में अब्दुस सलाम की तूती बोलती थी और उन्हें कुछ लोग ‘पाकिस्तान का होमी भाभा’ भी कहते थे. सुपारको के शुरुआती दिन बेहतरीन रहे. जनरल अयूब खान के दौर में पाकिस्तानी स्पेस कार्यक्रम काफ़ी फला-फूला और अमेरीका तक ने पाकिस्तान के काम को सराहा.

बदलाव का दौर सिर्फ दस साल तक रहा और जनरल याह्या खान और प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के दौर में प्राथमिकताएं तेज़ी से बदलती चली गईं. स्पेस प्रोग्राम की फंडिंग में कटौती होती रही जो जनरल ज़िया-उल-हक़ के ज़माने में लगभग ठप हो गई .

पकिस्तान के पहले सैटलाइट बद्र-1 को 1990 में चीन से अंतरिक्ष में छोड़ा गया था. लेकिन पाक़िस्तान का ध्यान धीरे-धीरे मिसाइलें बनाने पर लग गया. लिहाजा पाकिस्तान के स्पेस प्रोग्राम का हाल अब ये है कि न तो नए सैटलाइट विकसित हो रहे हैं और न ही उनकी लांचिंग का खाका बन पा रहा है.

दरअसल पाकिस्तान के हुक्मरानों ने जंगी प्लान तो बहुत से बनाए लेकिन अपने युवाओं की तालीम और तकनीकी विकास पर तवज्जो नहीं दिया. रही सही कसर आतंकियों ने पूरी कर दी. बम और बंदूक की आवाज़ के बीच किसी सैटेलाइट के काउंटडाउन के बारे में सोच पाना फिलहाल पाकिस्तान के नसीब में नहीं.


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