मेरी कहानी

मेरी कहानीः एक हादसे में टांग गंवाने के बाद मैंने अपने जीवन को हासिल किया

तर्कसंगत

February 2, 2018

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मैं 18 साल की हूं. मेरा जन्म कोलकाता में हुआ. मेरे पिता एक कारोबारी थे और मां घर संभालती थीं. मेरा बचपन बहुत अच्छा था. स्कूल में मैं ख़ूब मौजमस्ती करती, दोस्तों के साथ घुमक्कड़ी भी किया करती.

स्कूल के बाद मैंने कोलकाता की एक प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग करने का सोचा था. स्कूल जाने वाले सभी बच्चों की तरह ही मैं भी कॉलेज के नए जीवन को लेकर उत्साहित थी.

हालांकि पहले ही दिन, 21 अगस्त 2017,  को मेरे जीवन की एक नई शुरुआत हुई. लेकिन इसमें जीवन को लेकर बहुत अनिश्चितताएं थीं.

उस दिन सुबह मैं घर से कॉलेज के लिए निकली थी. मुझे देर हो रही थी क्योंकि बसें देरी से आ रहीं थीं. मैंने कॉलेज तक के अपने सफर को दो हिस्सों में बांटने का फ़ैसला किया.  मैं अब भी सोचती हूं कि काश मैंने सीधी कॉलेज तक जाने वाली बस के लिए कुछ और मिनट इंतेज़ार कर लिया होता.

मैंने एक बस पकड़ ली और दूसरे बस स्टॉप पर उतर गई. सड़क पार करके मैं दूसरी बस के आने का इंतेज़ार करने लगी. सुबह के साढ़े नौ बजे थे जब वो एसी बस आई. बहुत से लोग उस बस में चढ़ने की कोशिश कर रहे थे. मैं लाइन के आख़िर में खड़ी थी. बस कंडक्टर ने लाइन से आगे बढ़ने के लिए कहा.

मुझे सेकंड का वो हिस्सा अब भी याद है जब मैं नीचे गिर जाने को लेकर शर्मिंदा थी. लेकिन ये शर्म तुरंत ही अकल्पनीय ख़ौफ़ में बदल गई. मैं असहनीय पीड़ा में थी. मैंने पीछे मुड़कर देखा कि मेरी नीली लैगिंग का फटा हुआ हिस्सा दिख रहा था. मेरा पूरा बायां पैर बस के टायर के नीचे आ गया था. ये पूरी तरह कुचला जा चुका था.

इतना ख़ौफ़नाक़ मंज़र देखने के बाद भी मेरे होश बाक़ी थे. मैंने अपना फ़ोन निकाला और मां का नंबर मिला दिया.

मेरे चारों और खड़े लोग जो बातें कर रहे थे मैं सुन पा रही थी. मेरी मां ने ट्रैफ़िक पुलिस से संपर्क किया और मुझे नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया. इसी बीच मेरा ख़ून तेज़ी से बह रहा था. मेरी उम्मीद टूट रही थी और उस समय मैं बस ज़िंदा रहना चाहती थी.

अस्पताल में सबसे पहले मेरे अंकल पहुंचे. मुझे थोड़ा संबल मिला कि अब इस परिस्थिति से मुझे अकेले नहीं लड़ना है. कॉलेज से मेरे सीनियर और दोस्त भी आ गए. उन्होंने मुझे शांत करने की भरसक कोशिश की.

जब मां और चाची इमरजेंसी वॉर्ड में आईं तो मैं रोने लगी. अब मैं एक बहादुर लड़की की तरह व्यवहार नहीं कर पा रही थी. अस्पताल ने मेरे परिजनों से किसी बेहतर अस्पताल ले जाने के लिए कहा और मुझे कोलंबिया एशिया अस्पताल में भर्ती करा दिया गया.

एंबुलेंस में मुझे असहनीय पीड़ा हो रही थी और मैं चिल्लाकर रो रही थी.

फिर मुझे एक्सरे के लिए ले जाया गया और शाम साढ़े सात बजे मेरी सर्जरी हुई. डॉक्टरों ने मेरी टांग बचाने की हर संभव कोशिश की. लेकिन उनके सारे प्रयास बेकार ही रहे.

रात दस बजे जब मेरी आंख खुली तो मेरी टांग काटी जा चुकी थी, लेकिन मुझे ज़िंदा बचने की ख़ुशी थी. मैंने अपनी घायल टांग देखी. वो अब जा चुकी थी. मैंने अपने परिजनों और दोस्तों की ओर देखा और अपने चेहरे पर एक मुस्कान धरी.

अस्पताल के अगले कुछ दिन दर्द की यादगार हैं. लेकिन मैंने हालात को स्वीकार कर लिया और जीवन को आगे बढ़ाने का फ़ैसला लिया.

दो सप्ताह बाद में वापस कॉलेज में थी. मैं व्हीलचेयर पर थी और इधर-उधर जाने के लिए पूरी तरह दोस्तों पर निर्भर थी. मेरे सभी दोस्तों ने मुझे अवसाद से लड़ने में मदद की और वो हर पल मेरे साथ रहे.

समय उड़ चला. तीन महीने बाद में प्रोस्थेशिस ट्रेनिंग के लिए गई. कई महीने बाद मैं फिर से अपनी दोनों टांगों पर चल पाई. सबकुछ आसान नहीं था, लेकिन हर नए क़दम के साथ चीज़ें आसान होती चली गईं. मेरी प्रोस्थेटिक टांग ने जीवन वापस लौटा दिया है और अब मैं बहुत सी चीज़ें अपने आप करने के लिए आज़ाद हूं. मैं सामान्य जीवन की ओर लौट रही हूं.

17 दिसंबर 2017 को मैंने टाटा स्टील मैराथन में हिस्सा लिया. वो दिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उस दिन मुझे अहसास हुआ कि मेरा व्यक्तित्व कितना मज़बूत है और मैं पहले किस तरह अपने व्यक्तिक्तव को ही दबाती रही थी.

मैंने अपने परिवार को रोते हुए देखा है और अपनी तस्वीर को अख़बार में प्रकाशित होते हुए भी देखा है. अब मैं एक कामयाब इंजीनियर बनकर एक स्थिर नौकरी हासिल करना चाहती हूं. मैं आज भी दुनिया घूमने का सपना देखती हूं.

हम सबके पास पीड़ित बनने या विजेता बनने का विकल्प है. और मैंने विजेता बनना तय किया है. क्योंकि हम ही हैं जो अपने अतीत को परिभाषित करते हैं, हमारा अतीत हमें परिभाषित नहीं करता है.

मेधा साहा


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