मेरी कहानी

मेरी कहानी : मैं कितना खुशनसीब हूं जो उसके कर्मों की नकल करके खुद की बाकी बची जिंदगी जी रहा हूं.

Poonam

February 26, 2018

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कुछ साल पहले तक मेरी जिंदगी बिल्कुल अच्छी चल रही थी, मेरी जिंदगी पूर्ण थी. मेरी शादी मेरी बचपन की दोस्त के साथ हुई जो एक अच्छी डॉक्टर भी है. हमारे दो बच्चे भी हैं जिन्हें बड़े नाज़ों से हमने पाला और आज वो विदेश में बस चुके हैं. मै हमेशा खुद से कहता हूं की मैं अपनी जिंदगी पूरी तरह जी चुका हूं किसी भी बात का कोई मलाल नहीं है.

मेरी पत्नी को डायबिटीज़ है जो कभी कभी परेशान करता है लेकिन किस्मत से बात कभी बिगड़ी नहीं और वो नियंत्रण में आ जाता है. वो कहते हैं न की किस्मत हमेशा साथ नहीं देता, 2014 में एक दिन अचानक मामला इतना बिगड़ गया की मेरी पत्नी नहीं रही. एक ही रात में मेरी जिंदगी जर्जर हो गयी. उसके जाने के दो सालों तक तो मैं बिल्कुल पागल हो गया. मैं घर छोड़कर कहीं जाता नहीं था, मुझे ठीक से नींद नहीं आती थी. खालीपन मुझे खोखला करता जा रहा था. मेरी स्थिती जानकर मेरे बच्चे बारी बारी आकर मेरे पास रुकने लगे. मैं 60 साल का था जब वो मुझे छोड़कर गयी. मैने अपनी पत्नी के बगैर जिंदगी की कल्पना भी नहीं कि थी. मेरे उपर उदासीनता हावी हो गयी था और मैं कहीं खो सा गया.

अकेलेपन और अलगाव के इस दौर में एक दिन अचानक मुझे लगा की कोई वजह है जिसके कारण मैं जिंदा हूं. मैं पहले नहीं गया इसके पीछे प्रकृति का कोइ मकसद जरूर है. मुझे ही अब दोनों जिंदगी जीनी हैं क्योंकि मुझे अपनी पत्नी की विरासत के साथ न्याय करना है.

डॉक्टर होने के कारण उसने हर तरीके से जरुरतमंदों की मदद की. मैने निश्चय कियी की मैं उसके इस काम को आगे करता रहूंगा. मैं समाज के वंचित बच्चों के लिए काम करता हूं, चाहे उन्हें खाना मुहैया कराना हो या फिर उनकी स्कूल की जरुरतों के पूरा करना हो. मैं पूरी कोशिश करता हूं की ज्यादा से ज्यदा बच्चों की जरुरतों को पूरा कर पाऊं. अब मुझे अचानक जीने की एक वजह मिल गई. लेकिन मैं अभी भी अकेला नहीं रह पाता हूं. जब भी मैं उसके बारे में सोचता हूं या उसकी बात होती है तो मैं खुद को रोक नहीं पाता और आंसु पानी की तरह बहने लगते हैं. हालांकि मैं जहां था उससे बहुत आगे बढ़ चुका हूं इसलिए खुद के करीब आने के लिए मैं फिर से वैसे ही चुटकुले सुनाता हूं.

मैं ये समझ चुका हूं की मेरी पत्नी के बगैर सब कुछ पहले जैसा नहीं हो सकता है. लेकिन जितना ज्यादा मैं उसकी यादों में करीब जाता हूं उतना ही मुझे उसके अधूरे काम को पूर करने का एहसास होता है. इस प्रक्रिया में मैं पहले से बेहतर भी हो रहा हूं. मैं कितना खुशनसीब हूं जो उसके कर्मों की नकल करके खुद की बाकी बची जिंदगी जी रहा हूं. शायद स्वर्ग से भी वो मुझे देख रही होगी.

Story Courtesy- Humans of Bombay


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