मेरी कहानी

मेरी कहानीः वो मुझे रंडी का बेटा कहते, मैंने पढ़कर जवाब दिया

तर्कसंगत

March 6, 2018

SHARES

1980 के दशक में जब कोठों की संस्कृति समाप्त हो रही थी मैं मुंबई के कांग्रेस हाउस और कोलकाता की बंदूक गली में बड़ा हो रहा था जहां लोग नाचने वाली महिलाओं पर दस-दस के नोट उड़ाया करते थे.

यहां काम करने वाली औरतों को कोई तवायफ़ कहता, कोई बैजी, कोठेवाली, कमानेवाली लेकिन सभी के लिए एक साझा शब्द रंडी भी इस्तेमाल किया जाता.

नाचने  वाली ये महिलाएं सेक्स वर्कर नहीं थी लेकिन उनके पास आने वाले लोगों के लिए नाचकर कमाने वाली वेश्यावृति करने वाली लड़कियों में फर्क करना मुश्किल था. क्योंकि उन्हें लगता था कि मुजरा करने वाली सेक्स के लिए भी उपलब्ध है.

जब वो ठुमका लगता हुए गाती सलाम-ए-इश्क़ मेरी जां ज़रा क़बूल कर लो तो वहां मौजूद हर पुरुष को लगता कि ये बस उसी के लिए गाया जा रहा है.

और जब नाचने वाली अगली लाइन तुम हमसे प्यार करने की ज़रा सी भूल कर लो पर आती तो उनके क़दम और आगे बढ़ जाते. यहां कि महिलाएं अपनी अदा बेच रहीं थी लेकिन पुरुष किसी और चीज़ के ही ख़रीददार थे.

मैं जब भी कोठे से बाहर निकलता तो किसी न किसी के शब्द मेरे कान में पड़ते, वो कहा करते रंडी का बेटा.

मेरी मां जब किशोरी थीं तब ही उन्हें एक कोठेवाली मैडम को बेच दिया गया था. उससे पहले उनका बालविवाह हो चुका था और वो आगरा  के एक परिवार के घर बंधुआ मज़दूर भी रहीं थीं. वो पुणे के कंजरभट समुदाय से थीं.

मेरी मां किसी जादूगर की तरह प्रस्तुति देती थीं. वो चमकदार कपड़े पहनती और उत्तेजक ख़ुशबू लगातीं.

वो किसी एकरोबेट की तरह नाचती थीं. सिर पर थम्स अब की बोतल का संतुलन बनाती और अपने बदन को घुमाकर लोगों के मुंह से नोट निकालतीं.

जब वो चर्चित गज़ले गाती तो उनकी आवाज़ में एक अलग ही कशिश होती. मैं हतप्रभ होकर उन्हें देखा करता. मैं उनकी नकल करने की कोशिश करता लेकिन मेरी आवाज़ या नृत्य उन जैसा नहीं था.

बचपन में मेरे लिए उनके काम से सामजस्य बिठाने से ज़्यादा मुश्किल था कोठे के भीतर और बाहर के माहौल में ख़ुद को ढालना. कोठे के भीतर जीवन जन्नत जैसा था, बाहर हमारे लिए सिर्फ़ नर्क ही था.

लोगों के ताने का आदी होने में थोड़ा वक़्त लगा. मेरी मां ने पहले कुरसोंग और बाद में दार्जीलिंग के एक हॉस्टल में मुझे भर्ती करा दिया. घर के बाहर जो मुश्किल हालात थे उनसे निबटने में किताबों ने मदद की.

मैं पढ़ाई में डूब गया था, स्कूल की लाइब्रेरी की किताबों को चाट गया, बचपन में ही मुझ पर लेखक बनने का जुनून सवार हो गया.

मेरे अंदर ये झुकाव इसलिए नहीं था कि मैं अपनी मां की कहानी कहना चाहता था. मैं बस किसी और भाषा को अपना लेना चाहता था ताकि घर के बाहर का जो ज़हरीला माहौल था उससे प्रभावित न हो सकूं. में सर्दियों की छुट्टी बिताने वापस कोठे पर ही जाया करता था.

कुछ सालों बाद रंडी का बेटा तंज का प्रभाव ख़त्म हो गया. शिक्षा ने मुझे अपमान से ऊपर उठा दिया था. अब गालियां मुझे प्रभावित नहीं करती थीं.

कोठे और उसकी बाहर की दुनिया के मेरे दोस्त को लगा कि मैंने उन्हें धोखा दिया क्योंकि हाल ही में मैंने अपने पुराने जीवन के बारे में बात करनी शुरू कर दी है. मैं अपनी कहानी साझा कर रहा हूं. उन्हें अंदाज़ा नहीं है कि इससे मैं कितना सशक्त महसूस कर रहा हूं.

मैं अब एक पत्रकार हूं और द हिंदू अख़बार के लिए लिखता हूं. इससे पहले मैं स्क्राल और मिडडे के लिए भी लिख चुका हूं. पत्रकारिता की मेरी न कोई पृष्ठभूमि है और न ही मैंने कोई प्रशिक्षण लिया है. लेकिन मैं यहां तक पहुंच पाया हूं क्योंकि मेरी मां ने मुझे पढ़ाया. मेरी पहली किताब ‘लीन डेज़’ प्रकाशित होने जा रही है. इसे हार्पर कोलिंस ने छापा है.

अब मुझे लगता है कि मेरी मां के संघर्ष की कहानी को कहने का सही वक़्त आ गया है.

(फ्रीलांस पत्रकार मनीष गायकवाड़ की कहानी)


Contributors

Edited by :

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...