ख़बरें

किसान आंदोलन को मीडिया कवरेज क्यों नहीं?

Poonam

March 12, 2018

SHARES

महाराष्ट्र के नासिक से 6 मार्च को पैदल निकला किसानों का काफ़िला राजधानी मुंबई पहुंच गया है. किसानों की यात्रा रविवार रात भी जारी रही और आज़ाद मैदान पहुंचकर मार्च ठहर गया ताकि सुबह परीक्षा देने जा रहे छात्रों को दिक्कत न हो.

क़रीब चालीस हज़ार किसानों का जत्था महाराष्ट्र विधानसभा की ओर बढ़ रहा है जहां किसानों का प्रतिनिधिमंडल मुख्य मंत्री देवेंद्र फड़नवीस से मुलाक़ात करेगा. 160 किलोमीटर पैदल चलकर ये किसान सरकार को अपनी मांगें सौंपने पहुंचे हैं.

किसानों की मुख्य मांग पूर्ण कर्ज़माफ़ी है. इसके अलावा वो चाहते हैं कि स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशें लागू की जाएं. स्वामीनाथन आयोग ने सिफ़ारिश की थी कि किसानों की फ़सल के दाम लागत से डेढ़ गुना अधिक होने चाहिए.

कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसे राजनीतिक दलों ने किसानों की मांगों का समर्थन किया है. भाकपा (मार्क्सवादी) से जुड़ा किसान संगठन अखिल भारतीय किसान महासभा इस मार्च का आयोजन कर रहा है.

छह दिन पहले जब ये मार्च शुरू हुआ था तो किसानों को मुख्यधारा की मीडिया में जगह नहीं मिल सकी थी. जैसे-जैसे किसान आगे बढ़ते गए सोशल मीडिया के ज़रिए उनकी तस्वीरें लोगों तक पहुंचती गईं और उनका जनसमर्थन बढ़ता गया. लेकिन मुख्यधारा की मीडिया, ख़ासकर टीवी ने उन्हें पर्दे से ग़ायब ही रखा.

जिस दौरान किसान मार्च कर रहे थे टीवी पर क्रिकेटर मोहम्मद शमी के वैवाहिक विवाद की ख़बरें ही छाईं रहीं. ज्ञान देने वाले टीवी एंकरों ने किसानों के मुद्दों को आवाज़ देने की ज़रूरत महसूस नहीं की. सवाल ये उठता है कि मुख्यधारा की मीडिया किसानों, उनके मुद्दों और उनके प्रदर्शनों को नज़रअंदाज़ क्यों कर रही है?

महाराष्ट्र के किसान बारिश की कमी, सूखे और क़र्ज़ से परेशान है. मध्य प्रदेश के किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की लड़ाई लड़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश के किसान बंपर पैदावार होने के बावजूद फ़सल के दाम न मिलने से परेशान हैं.

बुंदेलखंड में हर दिन किसान फंदे पर लटक रहे हैं और उनकी मौत अख़बारों के पहले पन्ने की ख़बर नहीं बन पा रही है. इसकी एक स्पष्ट वजह ये समझ आती है कि किसान विज्ञापनदाता नहीं है. बल्कि जो कंपनियां अपने विज्ञापन से मीडिया को पोषित करती हैं वो ही कम दामों में किसानों का माल ख़रीदकर उन्हें शोषित करती हैं. ऐसे में किसानों के मुद्दों और मीडिया के व्यवसायिक हितों का स्पष्ट टकराव दिखता है.

किसानों की नाराज़गी को अगर मीडिया में हवा दी गई तो ये देश में भी माहौल मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ कर सकती है. इस वजह से भी किसानों का संघर्ष टीवी स्क्रीन के टिकर से आगे नहीं बढ़ पा रहा है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरी भारत की अर्थव्यवस्था के बीच लगातार बढ़ता फ़ासला किसानों के प्रति तुरंत ध्यान दिए जाने की ज़रूरत को रेखांकित कर रहा है बावजूद इसके किसानों के मुद्दे नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं.

किसानों के प्रदर्शन से सरकार किस हद तक डरती है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में जब किसानों ने विधानसभा के आगे आलू डालकर प्रदर्शन किया तो समूचा पुलिसतंत्र उन गुरिल्ला किसानों को गिरफ़्तार करने के लिए लगा दिया गया जिन्होंने विधानसभा और मुख्यमंत्री आवास के बाहर आलू फेंककर सरकार की फजीहत करने की कोशिश की थी.

किसानों के मुद्दे समझने के बजाए यूपी सरकार ने पूरा ज़ोर आलू फेंकने की आपराधिक साज़िश का पर्दाफ़ाश करने पर लगा दिया था. क्योंकि अगर किसानों के मुद्दे पर बात की जाती तो सरकार के लिए जवाब देना मुश्किल हो जाता. सरकार और बाज़ार का मीडिया पर कैसा प्रभाव है ये इस प्रकरण के अख़बारी शीर्षकों में नज़र आया जब आलू फेंकने वाले किसानों को साज़िशकर्ता लिखा गया.

अब जब महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में चालीस हज़ार के क़रीब किसान पहुंच ही गए तब मीडिया चाहकर भी उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहा है क्योंकि पत्रकारों की भी सोशल फ़ीड किसानों की तस्वीरें से अटी पड़ी हैं. इस बार लग रहा है कि किसान अपनी बात ज़ोरदार तरीके से कहने में कामयाब हो जाएं. लेकिन क्या सरकार सुनेगी?

PC- Aajtak.indiatoday.in


Contributors

Edited by :

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...