मेरी कहानी

मेरी कहानीः मैंने 24 साल की उम्र में अपने पैसों से बीएमडब्ल्यू कार ख़रीदी

Poonam

March 18, 2018

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मेरे पिता एक डॉक्टर हैं, इसलिए मैं बचपन से ही इस बात को लेकर निश्चिंत था कि मुझे भी मेडिसिन के क्षेत्र में ही जाना है.

मेरा उद्देश्य डॉक्टर बनना था लेकिन मेरे अंदर कई चीज़ों को लेकर जुनून भी था.

मैं राष्ट्रीय स्तर का धावक था, मैंने अपने आप पियानो बजाना सीख लिया था और जब मैं 9वीं कक्षा में था तब ही से अंतर-स्कूली प्रतियोगितायों में नाटक आदि के लिए संगीत बना रहा था.

उस समय मुझे सीडी बर्न करना अच्छा लगता था. मैंने अपने जीवन में डीजे कंसोल पहली बार अपने सीनियर्स के फ़ेयरवेल पर देखा था.

उस दिन मैं डीजे के बिलकुल बगल में खड़ा था. बार-बार उसे बता रहा था कि कौन से गाने बजाने हैं. उस समय मुझे बस यही पता था कि संगीत को कैसे पॉज़ करना है और कैसे प्ले करना है. इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता था. इसलिए दसवीं पास करने के बाद मैंने एक अकादमी में दाख़िला ले लिया और डीजे के बारे में सामान्य ज्ञान हासिल किया.

उसी समय स्पोर्ट्स कोटा के ज़रिए मुझे विज्ञान वर्ग में दाख़िला मिल गया और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने के लिए मैंने ट्यूशन लेनी शुरू कर दी. फिर मुझे अहसास हुआ कि मैं इसके लिए नहीं बना हूं. मेरा सारा समय पढ़ाई में चला जाता और मैं अपनी पसंद की बाक़ी गतिविधियां नहीं कर पाता.

“My father’s a doctor, so all my life I was sure that I wanted to get into medicine. Even though that was my goal, I…

Posted by Humans of Bombay on Friday, 16 March 2018

मैंने विज्ञान वर्ग छोड़कर कॉमर्स में दाख़िला ले लिया. मेरे परिवार को डीजे के बारे में मेरी रूची का पता चल गया था और वो सब उसके ख़िलाफ़ थे. कुछ कारणों से वो डीजे को शराब, ड्रग्स और स्कैंडल आदी से जोड़कर देखते थे.

लेकिन मुझे बहुत पहले ही पता चल गया था कि मेरा दिल इसी में लगता है. मैं जब पंद्रह साल का था तब मैंने अपने पहले प्राइवेट इंवेट में संगीत बजाया. मैंने उस इवेंट आग्रेनाइज़ किया था और मेरे परिजनों ने भी उसमें शामिल होने पर ज़ोर दिया.

मैंने डीजे का अपना शौक़ जारी रखा. मुझे कभी भी अपना कंसोल ख़रीदने के लिए पैसे नहीं मिले. मैं दीवाली पर मिले पैसों से कंसोल किराए पर लेता था क्योंकि मुझे इसे बजाना अच्छा लगता था.

मैंने इस सबके साथ-साथ अपनी पहली दो परीक्षाएं पास कर लीं थीं लेकिन अंततः फ़ैसला ले ही लिया के ये पढ़ाई मेरे लिए नहीं है. मैं रोज़ाना पंद्रह घंटे किताबों में घुसे रहने की कल्पना नहीं कर पा रहा था. मैंने किसी तरह बीएमएस की पढ़ाई पूरी की और इस दौरान में इवेंट भी आयोजित करता रहा.

जब मैं 17 साल का था तब मैंने अपना पहला कॉमर्शियल इवेंट आयोजित किया. मेरे बारे में लोग जानने लगे और जल्द ही मुझे प्राइवेट पार्टियों, समारोह और शादियों में संगीत बजाने के प्रस्ताव मिलने लगे.

और फिर मेरे नाम को डीजेएजे की पहचान मिल गई. मुझे इतना काम और पहचान मिलने लगी कि मेरे परिजन भी मेरे काम से ख़ुश रहने लगे. आज जब लोग मेरे पिता को मेरे नाम से जानते हैं तो मुझे अच्छा लगता है. कोई उनसे कहता है कि आप एजे के पिता हैं तो मुझे अहसास होता है कि मैं कामयाब हो गया.

मैं भले एक डॉक्टर नहीं बन पाया लेकिन मैंने अपने अभिभावकों को गर्व करने का अवसर दिया है.

मेरे जीवन का सबसे बड़ा पल वो था जब मैंने 24 साल की उम्र में अपनी कमाई से बीएमडब्ल्यू कार ख़रीदी. वो दिन हमेशा मुझे याद रहेगा.

मैंने 18 साल की उम्र में पेशेवर काम शुरु किया था और सबसे पहले ट्रिस्ट में संगीत बजाया था.  तब से अब तक शादियों और आयोजनों में डीजे बजाने के लिए 150 से ज़्यादा उड़ाने ले चुका हूं. इस दौरान मेरे जीवन में बस एक ही बात सबसे अहम रही. मैंने अपने जुनून को बरकरार रखा और उसी पर चलता रहा.

मैं आज भी ट्रस्ट में डीजे बजाने का कोई पैसा नहीं लेता क्योंकि ये वो काम है जो मैं पसंद करता हूं.

हाल ही में मैंने विराट और अनुष्का की शादी में डीजे बजाया था. मैं नहीं जानता कि मैं यहां तक कैसे पहुंचा. लेकिन इसका जबाव बहुत सरल भी हैं.

मैंने अपने दिल की बात सुनी. वो बात जिसे हम अक्सर डिग्री या प्रोमोशन हासिल करने की दौड़ में अनसुना कर देते हैं.

सभी दांव अपने आप पर लगाना, ख़तरे उठाना और कभी भी हार न मानना. यही तो जीवन है.

(जैसा डीजीएजे यानी डीजे अर्जुन शाह ने ह्मूमन ऑफ़ बांबे को बताया)


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