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मेघालयः भ्रष्टाचार का खुलासा करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या

तर्कसंगत

March 21, 2018

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मेघालय में भ्रष्टाचार के मामले उगाने के लिए चर्चित एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) कार्यकर्ता की संदिग्ध मौत हो गई है.

38 वर्षीय पोइपिनहुन माजा मेघालय में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के मामले उजागर करने के लिए जाने जाते थे.

उनकी मौत मंगलवार को सर पर गंभीर चोट लगने से हो गई थी.

पुलिस अधीक्षक नज़ारियस लमारे ने द हिंदू अख़बार को बताया, “हमें उनके सर पर गंभीर चोट मिली है जो संभवतः लोहे से लगी हो. ये क़त्ल का मामला प्रतीत हो रहा है लेकिन हम फिलहाल पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतेज़ार कर रहे हैं. उसके बाद ही हत्या के कारणों और उसके पीछे के साज़िशकर्ताओं का पता चल सकेगा.”

पोइपिनहुन का शव इस्ट जैंतिया हिल्स ज़िले के ख्लेरिहाट इलाक़ें में बरामद किया गया था. बांग्लादेश सीमा के स्थित ये इलाक़ा राज्य का प्रमुख खनन क्षेत्र भी है. शव के पास ही एक पाना भी मिला है.

माना जा रहा है कि पोइपिनहुन की हत्या की वजह उनकी जांच से जुड़ी है. वो जैंतिया हिल्स ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के प्रमुखों और सीमेंट कंपनियों के बीच सांठगांठ का पर्दाफ़ाश करने जा रहे थे.

स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक सीमेंट कंपनियां बिना अनुमति के इस क्षेत्र में लाइमस्टोन (चूने) का खनन कर रही हैं और काउंसिल ने इस पर आंखें मूंद रखीं हैं.

ये पहला मामला नहीं है जिसका पर्दाफ़ाश पोइनपिनहुन माजा करने जा रहे थे. पिछले साल उन्होंने आरटीआई के ज़रिए जानकारी जुटाकर काउंसिल के सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का पर्दाफ़ाश किया था.

उन्होंने जानकारियां जुटाकर बताया था कि सीमेंट कंपनियां बिना अनुमति के लाइमस्टोन का खनन कर रही हैं जिससे सार्वजनिक धन का नुक़सान हो रहा है. ये संविधान के छठे अनुच्छेद का उल्लंघन भी था.

इस क्षेत्र में सीमेंट कंपनियों की गतिविधियों से पर्यावरण और स्थानीय वातावरण को भी नुक़सान पहुंच रहा है.

ग़ैर क़ानूनी ख़नन के चलते इस क्षेत्र के स्थानीय लोगों के अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है.

किसी आरटीआई कार्यकर्ता की हत्या का ये पहला मामला नहीं है. पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल में साल 2005 में लागू हुए सूचना का अधिकार क़ानून ने लोगों को जानकारियां मांगने का अधिकार दिया है.

इस अधिकार के तहत हासिल की जाने वाली जानकारियां कई बार बड़े घोटालों का पर्दाफ़ाश करती हैं. यही वजह है कि जानकारी जुटाने वाले कार्यकर्ता अक्सर अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के निशाने पर रहते हैं.

आरटीआई लागू होने के बाद से साल 2016 तक देशभर में 56 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी. इन हत्याओं की वजह भ्रष्टाचार का खुलासा किया जाना था.

आरटीआई कार्यकर्ताओं को आम तौर पर धमकियों का सामना करना पड़ता है. लेकिन कई बार वो ऐसी जानकारियां ले आते हैं जो न सिर्फ़ सत्ता बल्कि प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर देती हैं.

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में अहम हथियार होने के बावजूद इस दौर में आरटीआई को कमज़ोर ही किया जा रहा है.

आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं कि इस समय जानकरी मांगना और सार्वजनिक करना ऐसा जोख़िम है जो बिना किसी सुरक्षा के उठाना ही पड़ता है.


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