मेरी कहानी

मेरी कहानीः मैं न विधवा हूं न शादीशुदा, मैं एक अकेली मां हूं

तर्कसंगत

April 12, 2018

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मेरी दो साल के अंतराल में दो शादियां हुईं. 22 साल की उम्र में पहली शादी हुई थी लेकिन पति का देहांत हो गया. दूसरी शादी 24 साल की उम्र में हुई लेकिन वो भी नाकाम रही.

दूसरे पति के साथ बिगड़े रिश्ते के कारण मैं अवसाद में चली गई. हर रोज़ नशे की गोलियां खाने लगी. मेरे मन में आत्महत्या का विचार आता. एक दिन परेशान होकर मैंने अपनी जान देने का फ़ैसला ले ही लिया. मैंने नदी में छलांग लगाने का प्रयास किया. लेकिन वहां खड़े लोगों ने मुझे बचा लिया और पुलिस के हवाले कर दिया.  पुलिस ने मुझे नारी सुधार गृह भेज दिया.

मैं गोरखपुर के पास देवरिया की रहने वाली हूं. मैं एक ऐसी औरत हूं जिसे न ही आप विधवा कह सकते हैं और न ही शादीशुदा.

मेरे पिता काम की तलाश में असम में बस गए थे. मेरा जन्म वहीं हुआ. बचपन में ही मैंने अपनी मां को खो दिया.

मेरी पहली शादी असम में ही हुई थी. एक साल बाद ही मेरा एक बेटा भी हो गया लेकिन मेरे पति की अचानक मौत हो गई.

इसी बीच मेरे पिता देवरिया में हमारे पुश्तैनी मकान में रहने लगे. बहुत कम उम्र में विधवा होने के कारण पिता ने मुझे अपने साथ रहने के लिए बुला लिया.  वो मेरी दूसरी शादी कराना चाहते थे. ये मेरे पिता का एक सही फ़ैसला था.

लेकिन उनका ये सही फ़ैसला मेरे लिए बहुत ग़लत साबित हुआ. जिस सुखद वैवाहिक जीवन की तलाश में मैंने शादी की थी वो और दूभर हो गया.

मुझे अपने दूसरे पति से भी अलग होना पड़ा. आत्महत्या के प्रयास के बाद नारी सुधार गृह भेजे जाने से मेरे सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया.

मेरे पिता बूढ़े हो चले थे. अपना पेट पालने के लिए मैंने एक दुकान पर नौकरी कर ली.

मेरे सामने अपने बेटे का ख़र्च उठाने की चुनौती भी थी. वो असम में अपनी दादी के पास रह रहा था लेकिन बीच-बीच में मैं उसे अपने पास देवरिया भी ले आती.

बढ़े होते बेटे के खर्चे भी बढ़ रहे थे.  मेरी कमाई खर्च पूरा नहीं कर पा रही थी.

मैं आमदनी बढ़ाने के प्रयास करने लगी. मेरे एक परिचित भैया अख़बार बांटने का काम करते हैं. मैंने उनसे कहा कि मैं भी अख़बार बाटूंगी. ये ऐसा काम था जिसे पुरुष ही करते हैं.

उन भैया की मदद से मैं हॉकर बन गई.   काम के पहले दिन सुबह चार बजे साइकिल पर अख़बार की गड्डियां लेकर जब मैं निकली तो मन में अजीब सी झिझक थी. मैं उस काम पर निकली थी जिसे आमतौर पर पुरुष ही करते हैं.

शुरू में मुझे दिक्कतें आईं लेकिन मैं जानती थी कि ये काम बुरा नहीं है. कुछ लोगों ने मज़ाक बनाया तो कुछ ने हिम्मत बढ़ाई.

आज मैं सुबह चार बजे उठकर करीब ढाई सौ घरों में अख़बार पहुंचाती हूं. मुझे कई किलोमीटर साइकिल चलानी पड़ती है. इसके बाद पूरे दिन एक कपड़े की दुकान पर काम करती हूं.

इस तरह मैं सुबह चार बजे से रात आठ बजे तक काम करती हूं.

मैं रोज़ाना सौलह घंटे काम ख़ुशी-ख़ुशी करती हूं क्योंकि मैं एक मां हूं.

अख़बार बांटने से होने वाली अतिरिक्त कमाई से मैं अपने बेटे को पढ़ा लिखा रही हूं. मुझे विश्वास है एक दिन मेरा बेटा पढ़ लिखकर अच्छा जीवन जिएगा.

(अमर उजाला में प्रकाशित निशा तिवारी की कहानी)


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