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NEET टॉपर कल्पना की कहानी आपने पढ़ ली, अब प्रदीपा के बारे में जानिए

तर्कसंगत

June 7, 2018

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हर साल परिक्षाओं के नतीजे आते हैं और उनके साथ आती हैं कामयाबी की कहानियां.

टॉपर छात्रों के मुस्कुराते चेहरे अख़बारों के पहले पन्ने पर छपते हैं. उन्हीं अख़बारों में उन कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन भी जिन्होंने उन्हें टॉप करने के लिए तैयार किया होता है.

दो दिन पहले एनईईटी  नीटयानी नेशनल एलिजिबिलीटी कम एंट्रेंस टेस्ट के नतीजे आए. बिहार की कल्पना कुमारी ने टॉप किया. उन्होंने बिहार बोर्ड भी टॉप किया है.

कोचिंग संस्थान में रहकर पढ़ाई करने वाली कल्पना ने बिना स्कूल अटैंड किए बिहार बोर्ड भी टॉप कर लिया, 75 प्रतिशत अनिवार्य उपस्थिति के नियम को दरकिनार करके.

लेकिन हम आपको कल्पना कुमारी की कहानी नहीं बताना चाहते. वो तो आप जानते ही हैं.

हम बात करना चाहते हैं कि तमिलनाडु की दलित छात्रा एस प्रदीपा के बारे में.

पढ़ने में होशियार 17 साल की दलित लड़की.  जो दसवीं में तमिलनाडु बोर्ड की परीक्षा में 98 प्रतिशत नंबर लाई और बारहवीं में 93.75 प्रतिशत नंबर. और फिर उसने नीट की परीक्षा दी. दो बार. दूसरी बार नाकाम होने पर उसने आत्महत्या कर ली.

04 जून को नीट का रिज़ल्ट आया. प्रदीपा एक बार फिर नाकाम हुई. लेकिन इस बार वो अपनी नाकामी को बर्दाश्त नहीं कर पाई.

उसके भीतर की होशियार छात्रा नीट परीक्षा से हार गई. उसने अपने घर में रखी चूहे मारने की दवा पीकर आत्महत्या कर ली.

गरीब परिवार से संबंध रखने वाली प्रदीपा के पास अवसर बहुत ज़्यादा नहीं थे. लेकिन अपनी मेहनत के दम पर उसने सरकारी स्कूल से पढ़ाई करते हुए दसवीं में 98 प्रतिशत अंक हासिल किए. इसी आधार पर एक निजी स्कूल ने उन्हें स्कॉलरशिप और एडमिशन दे दिया.

प्रदीपा ने एक क्षेत्रीय बोर्ड से पढ़ाई की थी.  क्षेत्रीय बोर्डों के छात्र आरोप लगाते हैं कि नीट परीक्षा में सेंट्रल बोर्ड यानी सीबीएसई से पढ़ाई करने वाले छात्रों को फायदा मिलता है और इस प्रतियोगी परीक्षा में उनके सफल होने के मौके ज़्यादा होते हैं.

बीते साल तमिलनाडु की ही एक दलित छात्रा अनीता ने सुप्रीम कोर्ट में नीट के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी.  सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला नीट के समर्थन में दिया था.

नीट में नाकाम होने के बाद अनीता ने भी आत्महत्या कर ली थी. अनीता भी अपने बोर्ड के टॉपर छात्रों में शामिल थी.

नीट का विरोध करने वालों का आरोप है कि ये परीक्षा प्रणाली ग्रामीण, ग़रीब और पिछड़े परिवेश के छात्रों के साथ भेदभाव करता है.

यही नहीं नीट परीक्षा पास करने में कोचिंग की भी अहम भूमिका रहती है. अधिकतर छात्र जो नीट प्रवेश परीक्षा पास करते हैं वो कोचिंग संस्थानों से ही आते हैं.

ऐसे में जो छात्र कोचिंग की महंगी फीस का बोझ नहीं उठा सकते वो अपने सपनों को बोझ तले ही दब जाते हैं.

और दब जाती हैं उनके संघर्ष की कहानियां और ग़ैर बराबरी का प्रश्न भी.

आपको टॉपर कल्पना कुमारी का मुस्कुराता चेहरा याद रहेगा.

लेकिन शायद प्रदीपा आपके जहन में वो जगह न बना पाए. क्योंकि वो हारी हुई लड़की है. व्यवस्था से, अपने सपनों से.

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