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ग्राउंड रिपोर्टः क्या हरियाणा के पलवल से पलायन कर गए हैं दलित?

Poonam

June 13, 2018

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पलवल के फुलवारी गांव से पूनम कौशल की रिपोर्ट

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से क़रीब साठ किलोमीटर दूर हरियाणा के पलवल ज़िले के फुलवारी गांव में तनावपूर्ण शांती हैं.

क़रीब साढ़े आठ हज़ार लोगों की आबादी वाला यह गांव दलितों और गुर्जरों के बीच संघर्ष को लेकर चर्चा में हैं.

बीते दो महीनों में यहां दलितों और गुर्जरों के बीच झगड़े की चार वारदातें हुईं हैं जिनके बाद गांव से दलित परिवारों के पलायन की ख़बरें आईं थीं. 

दिल्ली से मथुरा जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 19 से क़रीब डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित इस गुर्जर बहुल गांव में चौड़ी सड़कें और बड़े-बड़े मकान हैं जो गांव की अधिकतर आबादी के संपन्न होने का संकेत देते हैं.

लेकिन समूची आबादी आर्थिक और सामाजिक तौर से बराबर हैसियत नहीं रखती है. गुर्जरों के बड़े-बड़े मकानों से घिरा दलितों का मोहल्ला है जो गांव के बाकी हिस्सों से स्पष्ट रूप से पिछड़ा नज़र आता है.

कुछ दलित परिवारों ने हाल ही में नए मकान बनवाए हैं जो उनकी बदलती आर्थिक हालत का संकेत भी देते हैं.

एक दुमंजिले मकान में 67 वर्षीय दलित बुज़ुर्ग हरीचंद्र चारपाई पर लेटे हैं. उनके पैर और हाथ में चोट है. 04 जून को हुई हिंसा में गुर्जर समुदाय के लोगों ने उन्हें पीटा था. चंद्रभान को अफ़सोस है कि गांव के उन लोगों ने उन्हें पीटा जिन्हें वो बचपन से जानते हैं.

हरीचंद्र कहते हैं, ‘दूसरे समाज के लोग आय दिन हमारे समाज के बच्चों के साथ झगड़ा करते हैं. मारपीट होती रहती है लेकिन यहीं पर पंचायत बिठाकर समझौते करा दिए जाते हैं. हम भी मान लेते हैं क्योंकि कोर्ट-कचहरी जाने से पैसों की बर्बादी होगी. लेकिन अबकी बार हमने रिपोर्ट दर्ज करवा दी. हरिजन एक्ट में रिपोर्ट दर्रज करवाने के बावजूद पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया.’

इसी साल मार्च में दिए अपने एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दलित उत्पीड़न क़ानून के तहत दर्ज होने वाले मामलों में बिना जांच किए तुरंत गिरफ़्तारी नहीं की जानी चाहिए.  

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को देशभर के दलितों ने एससी-एसटी एक्ट पर हमला माना था और दो अप्रैल को देश भर में प्रदर्शन किए थे. इन प्रदर्शनों में कई जगह हिंसा भी हुई थी.

फुलवारी गांव के दलितों ने भी इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. हरीचंद्र कहते हैं कि दो अप्रैल को हुए प्रदर्शन के बाद से ही दलितों और गुर्जरों के बीच तनाव सा है. 

वो कहते हैं, ‘जब से दो अप्रैल का हंगामा हुआ है तब से गुर्जरों को लगता है कि दलितों का क़ानून ख़त्म हो गया है. वो दलितों के साथ गाली-गलौच करते हैं, उल्टा सीधा बोलते हैं और जातीसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. हमारे बच्चों को भी बहुत परेशान करते हैं.’

पलवल के सदर थाने के एसएचओ देवेंद्र सिंह के मुताबिक फुलवारी गांव में अब तक झगड़े की कुल चार वारदातें हुई हैं जिनके अलग-अलग मुक़दमें पलवल के सदर थाने, कैंप थाने और सिटी थाने में दर्ज हैं.

देवेंद्र सिंह के मुताबिक, ’21 अप्रैल 2018 को दलित युवक अजय का गांव के ही एक गुर्जर युवक के साथ झगड़ा हो गया था. अजय की मेडिकल रिपोर्ट में सामान्य चोटों की पुष्टि हुई थी जिसके आधार पर मुक़दमा दर्ज किया गया था.’

देवेंद्र सिंह के मुताबिक इसी बीच गांव में एक दलित युवक और गुर्जर युवकों के बीच एक और झगड़ा हो गया जिसका मुक़दमा भी सदर थाने में दर्ज है. 

झगड़ों के बीच दलितों और गुर्जरों में मामले के निपटारे के लिए पंचायतें होती रही हैं. 

ऐसी ही एक पंचायत 04 जून 2018 को कुसलीपुर गांव के मंदिर में हुई. इसी दिन अभियुक्तों को गिरफ़्तारी के लिए पुलिस के सामने पेश किया जाना था.

पुलिस का कहना है कि इस पंचायत में दलित समुदाय की ओर से गुर्जर समुदाय पर हमला किया गया जिसका मुक़दमा कैंप थाने में दर्ज है. 

इसी दिन गुर्जरों ने दलितों पर हमला किया जिसमें कुछ लोग घायल हुए. इसका मुक़दमा शहर के सिटी थाने में दर्ज है.

झगड़ों और पंचायतों के दौर के बीच पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की. दलितों का आरोप है कि पुलिस प्रभावशाली गुर्जर समुदाय का पक्ष ले रही है. 

फुलवारी गांव में अधिकतर ज़मीनें भी गुर्जर समुदाय के पास हैं और दलित समुदाय के लोग उन्हीं के खेतों में काम भी करते हैं. पशुओं के चारे के लिए दलित गुर्जरों के खेतों में ही घास काटने जाते हैं.

इसी बीच 04 जून को हुए झगड़े के बाद गुर्जरों की ओर से गांव में ये ऐलान करवा दिया गया कि यदि कोई दलित किसी गुर्जर के खेत के पास दिखा तो उसे पीटा जाएगा. ये ऐलान पूरे गांव में घूम-घूम कर करवाया गया. इसे मुनियादी कहते हैं.

एक दलित महिला बताती हैं, ‘मुनियादी करके कहा गया कि गुर्जर चमारों को मारेंगे. जंगल जाओगे तब मारेंगे, मेढ़ पर दिखे तब मारेंगे, चमारों को मारेंगे ज़रूर.’

गांव के प्रधान सूरज सिंह गुर्जर समुदाय से हैं. उनका कहना है कि किसी शरारती तत्व ने ऐसा ऐलान किया था जिसकी पहचान करने की कोशिश की जा रही है. 

सूरज सिंह कहते हैं, ‘मुनियादी कराने का अधिकार प्रधान का होता है. सब जानते हैं कि मैंने ऐसा कोई ऐलान नहीं कराया है. लेकिन गांव के दलित झूठ नहीं बोल रहे हैं, किसी शरारती तत्व ने इस तरह की हरकत की है जिसकी पहचान की जा रही है.’

इस ऐलान ने गांव में तनाव को और ज़्यादा बढ़ा दिया है और दलित सहमे हुए हैं. दलित महिला ममता के पति झगड़े के बाद से घर नहीं लौटे हैं.

वो कहती हैं, ‘पहली बार इतना डर लगा है. एक हफ्ते में इन लोगों ने ऐसे ऐसे सीन करके दिखा दिए हैं कि हम घर से नहीं निकल पा रहे है. हमारे घरों में पत्थर मारे जा रहे हैं. दरवाज़ों पर डंडे मार जाते हैं. घर में खाने का सामान ख़त्म हो रहा है लेकिन हम बाहर जाकर राशन तक नहीं ख़रीद पा रहे हैं. चटनी से काम चलाना पड़ रहा है.’

गांव में दलितों और गुर्जरों के बीच तनाव स्पष्ट नज़र आता है लेकिन दलितों के पलायन करने के सबूत नहीं मिलते. इस संवाददाता को एक भी दलित परिवार ऐसा नहीं मिला जिसके सभी सदस्य घर छोड़कर चले गए हैं. कुछ लोग ज़रूर गांव से बाहर हैं. 

ग्राम प्रधान सूरज सिंह पलायन की बात से पूरी तरह इनकार करते हुए कहते हैं, ‘ना कोई दलित गांव छोड़कर गया है और न ही किसी दलित को गांव छोड़कर जाने दिया जाएगा. उनके बिन हम अधूरे हैं और हमारे बिना वो अधूरे हैं.’

फुलवारी गांव के बुज़ुर्ग बताते हैं कि ये गांव क़रीब ढाई सौ साल पहले बसा था और तब से ही यहां गुर्जर और दलित साथ-साथ रहते आए हैं.  साढ़े आठ हज़ार की आबादी के इस गांव में क़रीब साढ़े छह सौ दलित भी हैं. लेकिन अब कुछ दलितों को लग रहा है कि यदि इसी तरह झगड़े होते रहे तो उन्हें गांव छोड़कर जाना पड़ सकता है.

एक दलित महिला कहती हैं, ‘झगड़ों की वजह से हमने अपने बच्चों को रिश्तेदारों के घर भेज दिया है. अपना गांव कोई नहीं छोड़ना चाहता. लेकिन यदि ऐसे ही पिटते रहे तो फिर हम क्या करेंगे?’

दूसरी ओर गुर्जर समुदाय के लोगों का कहना है कि दलित अनुसूचित जाती-जनजाती क़ानून का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं और इसके तहत मुक़दमे दर्ज करवाकर गुर्जरों को फंसा रहे हैं.

70 वर्षीय गुर्जर खिल्लीराम सेना से रिटायर हैं और उनका एक बेटा भी झगड़े में घायल हो गया था. 

खिल्लीराम कहते हैं, ‘पलायन की बात सरासर झूठ है. न कोई गांव से निकल रहा है और न ही कोई किसी को निकाल रहा है. वो तो हरिजन एक्ट से गुर्जरों को फंसा रहे हैं. गुर्जरों को बदनाम कर रहे हैं.  आज कोई गुर्जर किसी दलित से कुछ कह नहीं सकता. पुलिस भी उनकी ही सुनती है, कहती है कि सरकार का ऑर्डर है, अगर सरकार का ऑर्डर है तो गुर्जरों को फांसी लगा दो, गांव से निकाल दो.’

गांव में तनाव कम करने के लिए पंचायतों का दौर जारी है. ऐसी ही एक पंचायत दस जून को हुई जो बेनतीजा रही. 

इस संवाददाता के सामने ही गांव के प्रधान सूरज सिंह दलित बुजुर्ग हरीचंद्र को पंचायत के लिए मनाने के लिए पहुंचे. उनके साथ गांव के गई अन्य गुर्जर बुजुर्ग भी थे.

एक और बुज़ुर्ग जहां गांव में शांति लाने का प्रयास कर रहे हैं वहीं युवाओं में तनाव स्पष्ट नज़र आता है.

एक दलित युवा ने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘वो हमें बर्दाश्त ही नहीं करते हैं. मोटरसाइकल पर जाओ तो कहते हैं बड़ा तनकर बैठा है. रास्ते में रोककर जातीसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. हम कब तक सुनते रहेंगे.’

कैप्टन सुरजीत सिंह सेना से रिटायर हैं और अब गांव में पंचायत कराने में जुटे हैं. वो कहते हैं, ‘नई उम्र के लड़कों को पता नहीं क्या हो गया है. छोटी-छोटी बातों पर लड़ बैठते हैं. बच्चों का झगड़ा था जो अब इतना बढ़ गया है.’

वहीं गांव की एक दलित महिला का कहना था कि गुर्जर दलितों के आर्थिक उत्थान को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं.

वो कहती हैं, ‘हमारे पास न जड़ थी न ज़मीन. बच्चों ने मेहनत मज़दूरी करके कुछ घर बना लिए हैं तो वो कहते हैं कि क़िले बना रहे हैं. उन्हें हमारा उनके बराबर आना बर्दाश्त नहीं हो रहा है.’

तनाव के बीच पुलिस की गाड़ियां गांव के चक्कर लगा रही हैं. मामला सुलझाने के लिए 11 जून को भी एक पंचायत गांव में हुई. 

प्रधान सूरज सिंह का दावा है कि इस बार शांति के लिए समझौता हो गया है. वहीं पुलिस का कहना है कि झगड़े के अभियुक्तों को जल्द ही गिरफ़्तार कर लिया जाएगा.

इस सबके बीच दो अप्रैल को दलितों के प्रदर्शन के बाद गांव के दलितों और गुर्जरों के बीच जो रेखा खिंची है  वो स्पष्ट नज़र आती है.


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