मेरी कहानी

मेरी कहानी: माँ की आशाओं को विफल कर के हम बाहर की दुनिया नहीं जीत सकते

Kumar Vibhanshu

September 4, 2018

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मेरी माँ 83 साल की है। हालांकि वह अधिकतर बीमार रहती है फिर भी, वह 60 वर्षीय के रूप में सक्रिय है। मैं और मेरी पत्नी यह सुनिश्चित करते है कि वह हमेशा घर मे अपनी ज़रूरत महसूस करती रहे और वास्तव में हम उसे काम का बोझ भी देते हैं ताकि वह सक्रिय हो और महत्वपूर्ण महसूस करें। वह हमारे घर की आत्मा है।

मैं आम तौर पर खाने की मेज पर या दफ्तर जाते वक्त उसके साथ बात करने में समय बिताता हूं। जब तक कि यह बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं है, वह शायद ही कभी मुझे उसके किसी भी काम से परेशान करती है। वह 17 साल के मेरेे ड्राइवर से बाजार, मंदिर जाने या अपनी कान के मशीन के बैटरी बदलवाने का काम करवा लेती है।
माँ भी मेरेे प्रति बेहद संवेदनशील है और मुझ पर नजर रखती है। पिछले महीने से  मैं बहुत यात्रा कर रहा हूं और बेहद तनावग्रस्त हूं। उसने इस बात पर गौर किया था हालांकि मैंने कभी उसके साथ चर्चा नहीं की। मेरी पत्नी, भी मेरे रुटीन को देखकर चिंतित थी।

कल मैंने माँ के कमरे से टीवी की तेज़ आवाज़ सुनी, जब मैंने अंदर जा कर देखा तो पाया कि उनके कान की मशीन ख़राब हो चुकी थी, मैंने अगले ही दिन उसे बदल कर नयी मशीन ला कर दी, और जब उन्होंने उसे पहना तो उनके चेहरे की मुस्कान और ख़ुशी देख कर मुझे लगा की काश मैं उस पल उस ख़ुशी को क़ैद करके रख सकता, उनके चेहरे पर सुकून दिख रही थी। पिछले दिनों से वह अपने दोस्तों के साथ गप्पें, और टीवी के प्रोग्राम को काफी मिस कर रही थी, उसे ठीक से सुनाई नहीं दे रहा था मगर सर हिलाकर वह हर किसी को यह समझाना चाहती थी कि  उसे सब सुनाई दे रहा है जबकि मशीन ख़राब थी, मैं समझ गया कि वो मुझे मशरूफ देख कर अपनी तकलीफ ज़ाहिर नहीं कर रही थी, मगर अब उनकी गप्पें, गॉसिप्स, सब दुबारा से चालू और वह आनंद ले रही हैं।

माँ ऐसी ही होती है, मेरी, आपकी, हम सबकी वो आपको अपनी दुःख, तकलीफ नहीं बताएंगी यह सोच कर की आपका बोझ बढ़ेगा, मगर यह हम पर है की हम उनसे बात करें, उनका धयान रखें, उन्को समझेँ ठीक  जैसे बचपन में वो हमारी हर बात बिन बोले समझ जाया करती थी। हम कितने भी मशरूफ रहें मगर उनके लिए समय निकलना चाहिए। हम अगर अपनी माँ को निराश करते हैं तो बाहर हम दुनिया नहीं जीत सकते।

 

कहानी : पेरी महेश्वर


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