ख़बरें

कर्नाटक की मिनाक्षी ने नोटबंदी में गँवाई अपनी 15 साल की मेहनत की कमाई

Kumar Vibhanshu

September 6, 2018

SHARES

हाल ही में, भारतीय सेंट्रल बैंक, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) केे एक रिपोर्ट में पाया गया कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के 2016 के नोटबंदी के 22 महीने बाद, अमान्य घोषित की गई मुद्रा का 99.3% वापस कर दिया गया है। एक सवाल यहाँ ये खड़ा होता है कि क्या केवल 0.7% ही काला धन है? और इसी के लिए, इतने पैसे र्खच किये गए? लोग दिन दिन भर लाइनों मे खड़े रहे और तकरीबन 150 लोगों ने अपनी जान गँवाई, अब आरबीआई की यह रिपोर्ट उन लोगों के ज़ख्मों को कूरेदने के बराबर है जिन्होंने देशहित का काम समझ कर चुपचाप सरकार की अफरातफरी मे लिए गये फैसले को झेलते गयी। कर्नाटक की मीनाक्षी, ऐसी ही एक अपने ज़ख्म को साझा करती हैं। मीनाक्षी मूकबधिर हैं न सुन सकती हैं न बोल सकती हैं।

द हिंदू के मुताबिक, 41 वर्षीय मीनाक्षी ने 1.39 लाख रुपये के प्रतिबंधित मुद्रा नोटों को हेमवती नदी मे बहा दिया। मीनाक्षी “डोमेस्टिक हेल्प”  का काम करती है, यानि आम भाषा में काम वाली बाई या दाई जो कह लिजिए, यह पैसे मीनाक्षी 15 साल से जमा किए जा रही थीं कि अपना छोटा सा एक घर बनवा सकें।
द हिंदू अखबार से बात करते हुए 70 वर्षीय मां लक्ष्मीदेवी ने कहा, कि मीनाक्षी कई  हफ़्तों तक परेशान थी, खाना भी ढंग से नहीं खा रही थी, उसे यह बात समझ मे आ गई कि उसके जमा किये गए पैसों का कोई मोल नहीं रहा पड़ोसी और दोस्तों की बात में आकर कि इन पैसों से परेशानी बढ़ेगी, उसने सारा पैसा नदी में बहा दिया।
एम.एस. मीनाक्षी डोमेस्टिक हेल्प के रूप में काम करके 1,500 प्रति माह कमाती है और पेंशन के रूप में 1,200 प्राप्त करती है। इस पैसे के साथ, वह अपनी मां और भाई के साथ एक किराए के घर में रहतीं हैं, भाई भी बोल, सुन नहीं सकता।


एक घर का सपना चकनाचूर हुआ


8 नवंबर को जब प्रधान मंत्री मोदी ने नोटबंदी का एलान किया, तो मीनाक्षी के रिश्तेदारों ने पूछा कि क्या मीनाक्षी के पास कोई भी अमान्य मुद्रा है। उसने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया, क्योंकि वह डर रही थी कि वह अपना पैसा रिश्तेदारों के हाथों खो सकती है। उसके के रिश्तेदार ने बताया कि  “वह उस समय समझ नहीं पायी कि उसका पैसा बेकार हो जायेगा। अब जाकर उसे समझ आया जब उसके किसी एक मालिक ने उसे नोटबंदी के बारे में समझाया ।”

मीनाक्षी, जिनके पास बैंक खाता भी नहीं है जब तक की नोटबंदी के परिणामों को समझ सकती, बैंक में अमान्य नोट जमा करने की अंतिम तारीख  31 मार्च 2017 गुज़र चुकी थी ।

जब मीनाक्षी के पास रखा पैसा परिवार को मिला तब इसे बदलने के संबंध में कई अधिकारियों से मुलाकात की गयी। माँ और बेटी ने हासन जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की और दोनों ने हासन में कई बैंकों से संपर्क किया और पूर्व प्रधान मंत्री एच.डी. देवेगौडा से भी मुलाकात की, लेकिन उनके प्रयास व्यर्थ निकले।

उसकी मां ने कहा “मैं एक अधिकारी से मिलने के लिए बेंगलुरू गयी थी। अंत में, हमने नोटों को नदी में फेंक दिया, डरते हुए कि पुलिस इन प्रतिबंधित नोटों को रखने के जुर्म में हमारे खिलाफ कार्रवाई कर सकती है”।

 

नोटबंदी

रिपोर्ट के मुताबिक, 15.41 लाख करोड़ रुपये के 500 और 1,000 के नोट नोटबंदी  से पहले बाजार में थे , लगभग 15.31 लाख करोड़ रुपये के नोट लौटा दिए गए हैं। जिसका मतलब है, सिर्फ रु10,720 करोड़ रुपये की प्रतिबंधित मुद्रा बैंकिंग प्रणाली में वापस नहीं आई।

अरुण जेटली नोटबंदी को सफल मानते हैं 

इसके बाद, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया कि पीएम मोदी की विवादास्पद नोटबंदी के चलते मजबूत आर्थिक विकास और उच्च कर राजस्व हुआ है। विपक्ष के दावों के जवाब में कि नोटबंदी ने अपने उद्देश्यों में पूरी से असफल रहा, उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट में कहा कि नोटबंदी का उद्देश्य पराजित नहीं हुआ क्योंकि यह भारत को अधिक कर जमा करने के लिए किया गया था।

 

Was the invalidation of the Non-deposited currency the only object of demonetisation? Certainly Not. The larger purpose…

Geplaatst door Arun Jaitley op Donderdag 30 augustus 2018

 

तर्कसंगत का पक्ष

हालाँकि नोटबंदी को सही और कारगर बताने के पीछे सरकार अपनी एड़ी चोटी एक कर रही है, मगर यह सच्चाई कहीं से भी नकारा नहीं जा सकता कि यह बिना किसी सुनियोजित ढंग से लिया गया फैसला था, देश पर नोटबंदी थोपने के बाद से ही, हर दिन नयी नियमावली या आसान शब्दों में कहें तो रूल्स बनते थे, लोग दिन दिन भर एटीएम के बहार खड़े रहते थे, सैंकड़ो ने अपनी जान गंवाई, देश को सम्बोधित करते समय इसका  उद्देश्य काले धन और आतंकवाद से लड़ना बताया गया, और धीरे धीरे इसको “कैशलेस इंडिया” और अन्य उद्देश्य का चेहरा पहनाया जाने लगा, अधिक कर का जमा होना महज़ भारतीय अर्थव्यवस्था पर छाये काले बदल में “सिल्वर लाइनिंग” की तरह देखा जा सकता है।

हम उम्मीद करेंगे की नोटबंदी से अगर राजस्व कर में इज़ाफ़ा हुआ है तो उसका उपयोग जनता के लिए हो तथा साथ ही सरकार इस तरह के बड़े फैसले लेने से पहले जनता को विश्वास में ले।

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...