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असम : माँ की नागरिकता साबित करने में विफल दिहाड़ी मज़दूर ने आत्महत्या की

Kumar Vibhanshu

September 14, 2018

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असम के बक्सा जिले से एक दिहाड़ी मजदूर, जिसकी माँ वर्तमान में अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए एक मामले से लड़ रही है, 9 सितंबर को आत्महत्या कर अपने जीवन को समाप्त कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, 37 वर्षीय बिनॉयचंद, अपनी मां शांतिचंद के फौरन ट्रिब्यूनल में चल रहे केस से उत्पन्न पैसों की कमी के दबाव में आत्महत्या कर ली।

 

उसने आत्महत्या क्यों की?

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, बिनॉय का शरीर गुवाहाटी से करीब 85 किलोमीटर दूर डिमलपर गांव में अपने घर के पेड़ से लटका पाया गया था। बिनॉय, चार भाइयों में से सबसे छोटे थे और अपनी मां शांती के साथ रहते थे, शांति और उनके जैसे कई लोगों को असम के चुनावी रोल में “संदेहजनक” या “डी-वोटर” कहा जाता था। सीमित साधन वाले व्यक्ति, बिनॉय ने अपनी माँ को इस “डी-वोटर” टैग से मुक्त करने के लिए अपनी कमाई के पैसे र्खच कर दिये थे।

एनडीटीवी के मुताबिक, उनकी मां ट्रिब्यूनल में केस हार गई थीं। हालांकि, अपनी मां की मदद करने के लिए, बिनॉय उच्च न्यायालय में मामला ले जाना चाहते थे। पैसे की कमी ने मानसिक रूप से परेशान कर दिया था। वह सिर्फ 20 दिन पहले पिता बने थे , अन्य भाई भी र्खचे में सहयोग देते थे, मगर यह बिनॉय थे जिसने अपनी मां की लड़ाई में सबसे ज्यादा योगदान दिया था।

रिपोर्ट के अनुसार, असम में 100 एफटी हैं। ये अर्ध-न्यायिक निकाय हैं जो “1946 के विदेशी अधिनियम” के तहत यह तय करते हैं कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं। इस बीच, “डी मतदाता” की प्रक्रिया 1997 में चुनाव आयोग के निर्देशों पर शुरू हुई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, राज्य में अनुमानित 1.25 लाख “डी” मतदाता हैं, जिन्हें असम के मसौदे के अंतिम राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) से भी बाहर रखा गया है जब तक कि एफटी उनके नाम साफ़ नहीं कर देते।

पुलिस ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि शांतिचंद का मामला पहली बार 2009 में नलबारी जिले में एफटी में पंजीकृत था लेकिन 2016 में बक्का में एक एफटी में स्थानांतरित कर दिया गया था। मार्च 2018 में, उसे एफटी से एक उपस्थिति के लिए नोटिस मिला। रिपोर्ट के अनुसार, वह 1964 से “शरणार्थी पंजीकरण प्रमाण पत्र” रखती है और जब मामले पर बहस जारी हैै, तो अभी तक फैसला नहीं आया है। इसके अलावा, पूरे परिवार को एनआरसी ड्राफ्ट के बाहर रखा गया है। बक्का के एसपी बिनॉय कलिता ने कहा कि 20 दिनों पहले अपने बच्चे की डिलीवरी से बढ़ी हुई अत्यधिक वित्तीय बाधाओं ने बिनोय को इतना चरम कदम उठाने को मजबूर किया होगा।

 

एनआरसी क्या है?

नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की अंतिम सूची 30 जुलाई को जारी की गई थी। अंतिम मसौदे में सूची से 3.29 करोड़ राज्य आबादी का लगभग 40 लाख हिस्सा शामिल है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पहला मसौदा 31 दिसंबर, 2017 को जारी किया गया था, जिसमें 1.39 करोड़ लोग शामिल थे।

31 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार उन 40 लाख लोगों के खिलाफ कोई जबरन कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती है, जिन्हें सूची से बाहर रखा गया है। जस्टिस रंजन गोगोई और रोहिंटन नरीमन के नेतृत्व में बेंच ने कहा कि एनआरसी का मसौदा प्राधिकरणों से किसी भी कार्रवाई का आधार नहीं है।

 

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