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इंदौर: ‘ओपन जेल’ की पहल क़ैदियों के लिए वरदान, रोज़गार के नए अवसर भी खोलेगी

Kumar Vibhanshu

September 16, 2018

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कैदियों को जीवन में एक नया मौका देते हुए मध्य प्रदेश, इंदौर के डिस्ट्रिक्ट जेल ने कैदियों के जीवन से अंधेरे और निराशा की भावनाओं को दूर करने का फैसला किया है। कैदियों के कारागृह के दरवाजे अब उनके परिवारों के लिए भी खोल दिये जाएंगे। सालों से चली आ रही परंपरा को तोड़कर, देवी अहिल्याबाई ओपन कॉलोनी नामक ओपन जेल में प्रत्येक कैदी के लिए दो कमरे का घर आवंटित किया गया है, जहां वह अपने परिवार के साथ रह सकते हैं और दिन के दौरान काम के लिए परिसर के बाहर भी जा सकते हैं। र्तकसंगत के साथ बात करते हुए इंदौर जेल के सहायक जेल अधीक्षक श्री ब्रजेश माखवान कहते हैं, “वर्तमान में, इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए 10 जेल कैदियों का चयन किया गया है, जिसे आधिकारिक तौर पर 3 सितंबर को लॉन्च किया गया था।”

संयोग से, इंदौर जेल हाल ही में मध्य प्रदेश में शुरू हुई चार खुली जेलों में से एक है। यह निर्णय मध्य प्रदेश जेल विभाग की आजीवन  कारावास की सज़ा भुगत रहे क़ैदियों के पुनर्वास कार्यक्रम का हिस्सा है, इंदौर का यह ओपन जेल इसी कार्यक्रम के अंतर्गत पाँच ओपन जेल में से एक है| आजीवन कारावास की सज़ा मिल चुकेे कैदियों के पुनर्वास अवसरों में सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के बाद यह पहल शुरू की गई थी।



इस निर्णय का क़ैदियों ने उत्साह के साथ स्वागत किया है

1996 में, भूपेंद्र सिंह को क्रोध में आकर एक शख्स की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अगले दो दशकों में, उन्होंने अपनी आजीवन कारावास की सज़ा कई सारे जेलों में काटी है, अब तक उन्हें इंदौर जेल में भेजा गया है, जहां अब उन्हें स्वतंत्रता का आनंद लेने के लिए लाभार्थियों में से एक के रूप में चुना गया है।

  सिंह ने पीटीआई-भाषा के साथ अपनी खुशी साझा करते हुए बताया कि “मुझे अभी भी जेल में कुछ और वक्त बिताना है। लेकिन चूंकि मैं इस खुली जेल में आया हूं, मुझे लगता है कि मुझे रिहा कर दिया गया है। मुझे खेद है कि मैंने जो किया और अब मैं सामान्य जीवन जीना चाहता हूं|”। सिंह अपनी पत्नी, सीमा और उनके दो बच्चों के साथ अब देवी अहिल्याबाई ओपन कॉलोनी के क्वार्टर में रहते हैं। द हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में, जेल अधिकारियों की सहायता से बच्चे जल्द ही एक स्थानीय स्कूल में जाने लगेंगे, जबकि सिंह चाय और स्नैक कि दुकान चलाने की योजना बना रहे हैं।

भोपाल जेल मुख्यालय में सावधानीपूर्वक जांच प्रक्रिया के बाद इस कार्यक्रम के लिए इंदौर जेल में से 9 और कैदियों को इस कार्यक्रम के लिए चुना गया है। श्री माखवान बताते हैं कि “जिन जेल कैदियों ने जेल की अवधि में एक स्वच्छ अनुशासनात्मक रिकॉर्ड बनाए रखा है और जिनकी सजा के केवल एक या दो साल शेष हैं इस योजना में उन्हें ही लिया गया है, वे पेरोल रिलीज के हकदार भी हैं।” आगे बताते हैं कि “अब तक, 8 जेल कैदी पहले से ही अपने परिवारों के साथ चले आए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि दूसरे दो अन्य दस दिनों के भीतर शामिल हो जाएंगे।”

 

जेल अभियुक्तों के लिए रोजगार भी सुरक्षित करता है

“जब कैदियों को अंततः रिहा कर दिया जाता है, तो उन्हें सभ्य आजीविका को सुरक्षित करने के लिए कई परेशानी का सामना करना पड़ता है, मुख्य रूप रोज़गार उनमें से है क्योंकि समाज उन्हें खुली बाहों से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश सरकार ने 2010 में होशंगाबाद जेल से शुरू होने वाली ओपन जेलों की इस अनूठे पहल को आगे बढ़ाया है, इसके बाद सतना, इंदौर और सागर जेल हैं। “इंदौर में, हमने दस 1 बीएचके घरों का निर्माण किया है, बिजली, उचित रसोई, गैस सिलेंडरों और अन्य सुविधाओं के साथ पूरा किया है, जहां कैदी अपने परिवार के साथ खुशी से रह सकते हैं जब तक उनकी सजा समाप्त नहीं हो जाती है, “श्री ब्रजेश माखवान ने बताया।

कैदियों के आमदनी के स्रोत के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि “एनजीओ की मदद से, हम इन कैदियों को मुख्यधारा के समाज में अपने व्यक्तिगत कौशल के अनुसार सुरक्षित रोजगार पाने में भी मदद करते हैं। इससे उन्हें परिवार चलाने के लिए कमाई मिलती है। एक ट्रैवल एजेंसी में दो जेल कैदियों को ड्राइवर के रूप में नियुक्त किया गया है और हमने मजदूरों के रूप में दो अन्य भर्ती के लिए कारखाने से संपर्क किया है। कैदियों में से एक ने जेल परिसर में और उसके आस-पास चाय, स्नैक्स और जलेबी बेचने के लिए छोटी सी दुकान शुरू करने की योजना बनाई है।

 

तर्कसंगत का पक्ष 

हम सभी अपने आस पास काफी सारी घटनाएं देखते हैं, जिसके फलस्वरूप दोषी को जेल जाना पड़ता है| कई बार जुर्म आवेश में आकर, गुस्से में सही गलत का तर्क किये बगैर किया जाता है और उसके बाद केवल पछतावा ही हाथ लगता है, यह सत्य है की समाज ऐसे लोगों को स्वीकार नहीं करता, इंदौर के यह जेल हमारे समाज के लिए भी एक सीख है कि अगर एक मौका मिले तो शायद हर क़ैदी नहीं मगर कुछ तो ज़रूर अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जीना चाहेंगे तो हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि हम उन्हें दोबारा से एक मौका और दें| तर्कसंगत इंदौर के डिस्ट्रिक्ट जेल की इस पहल का स्वागत और सराहना करता है, साथ ही यह उम्मीद भी करता है की देश के हर राज्य में इस तरह के पहल पर अमल किया जाये, ताकि हम भटके लोगों को दोबारा सही रास्ते पर ला सकें|

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