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केरल: 150 स्कूल के शिक्षक बच्चों को ‘फेक न्यूज़’ से निपटना सीखा रहे हैं

Kumar Vibhanshu

September 18, 2018

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“फ़ेक न्यूज़” पूरी तरह से झूठी सूचना, फोटो या वीडियो, को जानबूझकर निर्मित करना और फैलाना है, और यह  जनता को भ्रमित करने, सामूहिक आतंक फैलाने, हिंसा को उत्तेजित करने के उद्देश्य से किया जाता है। “यह एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन की स्लाइड में अमृता विद्यालय के छात्रों को बताया जा रहा है। अमृता विद्यालय केरल के कन्नूर जिले के 150 सरकारी स्कूलों में से एक है जो नकली खबरों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है। यह पहल “सत्यमेव जयते” के नाम से कन्नूर जिला कलेक्टर, मीर मोहम्मद अली की पहल है।

पिछले कुछ महीनों में, कई लोगों को बाल तस्करी के संदेह पर लोगों द्वारा मारा जा चुका है। लोगों के बीच यह संदेह और पागलपन नकली व्हाट्सएप मेसेज़ के द्वारा बनाया और फैलाया गया है। इसके अलावा, हाल के केरल बाढ़ से संबंधित कई नकली खबरों को भी प्रसारित किया जा रहा है। नकली खबरों के इस खतरे को रोकने के लिए ज्यादा प्रगति नहीं हुई है, मगर केरल के कन्नूर जिले ने इस दिशा में एक बहुत ही सराहनीय कदम उठाया है।

 

सत्यमेव जयते

कन्नूर के जिला कलेक्टर, मीर मोहम्मद अली ने “सत्यमेव जयते” (सत्य की सदा जीत होती है ) की एक अनूठी पहल शुरू की है। इस पहल का उद्देश्य स्कूल बच्चों को नकली खबरों के बारे में शिक्षित करना है, यह खतरनाक कैसे है ? और इसे रोकने के लिए क्या किया जा सकता है?

“यह मूल रूप से छात्रों में कुछ विशेषताओं को जगाने के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम है, ताकि उनमें कुछ मूल्य प्रदान किए जा सकें। श्री अली ने जुलाई में एक साक्षात्कार में र्तकसंगत को बताया, “हम इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के बारे में लोगों को अधिक संदेह करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं कि सत्य क्या है, क्या गलत है।”

कन्नूर कितनी गंभीरता से नकली खबर लेता है इस तथ्य से समझा  जा सकता है कि एक व्यक्ति को वास्तव में निपाह वायरस के बारे में नकली संदेश फैलाने के लिए गिरफ्तार किया गया था जब स्थानिक महामारी फैली थी।

श्री अली का मानना ​​है कि लोगों को सच को जानने में समय और अपनी सोच को निवेश करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “हमें यहां पक्ष लेना है या तटस्थ होना कोई एक विकल्प नहीं है जब आपके आस-पास के लोग नकली खबर फैला रहे हैं। यदि आप तटस्थ हैं, तो इसका मतलब है कि आप झूठी कथाओं के साथ स्वचालित रूप से पक्ष ले रहे हैं।”

पिछले साल से एक घटना को याद करते हुए अली ने बताया कि जब रूबेला टीकाकरण अभियान चल रहा था तब “फेक न्यूज़” के कारण माता-पिता ने अपने बच्चों को टीकाकरण दिलाने से इनकार कर दिया, उन्होंने कहा, “उस समय एक झूठी खबर ये फैलाई जा रही थी कि अगर बेटियों को टीका दिया जाता है तो भविष्य में वे माँ बनने से वंचित रह जाऐंगी, जबकि असल में अगर आप रूबेला का टीका नहीं लगवाते तो आगे चलकर मृत बच्चों के जन्म का खतरा या संख्या बढ़ सकती है।

कार्यक्रम 8 वीं -12 वीं कक्षा के छात्रों को केंद्रित करता है। “इसका उद्घाटन 13 जून को हुआ था। हमारे पास जिले के 150 सरकारी स्कूलों में से एक एक शिक्षक है। इन शिक्षकों को महीने भर के प्रशिक्षण से गुजरना होगा और फिर वे वापस जाएंगे और अपने छात्रों को भी यही सब बातें बताएँगे। वास्तव में, हमने शिक्षकों के लिए आधा दिन के प्रशिक्षण आयोजित किया है। “कार्यक्रम जुलाई के महीने में लागू किया गया था।

 

नकली खबरों की पहचान करने के महत्व

कार्यक्रम बच्चों को दो चीजें सिखाता है, “हम उन्हें फ़िल्टर बबल का मतलब समझाते हैं, उन्हें बताते हैं कि यदि आप इंटरनेट पर बहुत समय बिताते हैं, तो आप अपने विचारों का समर्थन करने वाली खबरों का सामना करना शुरू कर देंगे। उदाहरण के लिए, आप जिस व्यक्ति को पसंद करते हैं उसके बारे में सभी अच्छी चीजों पर विश्वास करते हैं और उस व्यक्ति के बारे में सभी झूठी खबरों पर विश्वास करते हैं जिन्हें आप पसंद नहीं करते हैं। हम बच्चों को यह सिखाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं कि लोग इसी भावना का लाभ उठाने का प्रयास कर सकते हैं। “

दूसरी बात जो प्रोग्राम संबोधित करने की कोशिश करता है वह क्लिकबेट है। “हम उन्हें सिखाते हैं कि क्लिकबेट क्या है और यह कैसे हानिकारक है।”

इन बिंदुओं को एक बहुत ही नये तरीके से रखा जाता है। श्री अली ने कहा, “हमारे पास कुछ अभ्यास हैं जैसे हम छात्रों को नकली खबरों के टुकड़े का उदाहरण देते हैं और उनसे पूछते हैं कि वे नकली खबर प्राप्त करने के बाद क्या करेंगे।”

कार्यक्रम मूल रूप से छात्रों के लिए यह देखने के लिए कुछ पॉइंटर्स बताता है कि उनके द्वारा प्राप्त की गई जानकारी झूठी या वास्तविक है या नहीं। “उन्हें जानकारी के स्रोत की जांच करने के लिए कहा जाता है। छात्रों को सूचना के स्रोत के लिए प्रेषक से विनम्रतापूर्वक पूछने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है। अगर प्रेषक इस जानकारी को प्रस्तुत करने में विफल रहता है, तो हम छात्रों से सही जानकारी खोजने और वहां पोस्ट करने के लिए कहते हैं। कम से कम उस जगह में हम नकली खबरों से निपटने में सक्षम हैं।”

श्री अली ने खबर की प्रामाणिकता की जांच किए बिना, नई या रोमांचक जानकारी भेजने के लिए लोगों की प्रवृत्ति के बारे में भी बात की। “एक बार एक चल रहे सत्र में से मैंने एक छात्र को बुलाया और उससे पूछा कि यदि कोई खबर है कि अगर कोई  छात्र कलेक्टर के साथ लड़ा है, तो आप क्या करेंगे? छात्रों ने जवाब दिया कि वे इस संदेश को आगे फारवर्ड करेंगे। तब मैंने उनसे पूछा कि यदि वे इसमें शामिल होते हैं तो वे वही करेंगे? उन्होंने कहा, नहीं, वे चाहते हैं कि लोग पहले जानकारी को परख कर ही एसा करें। मैंने उनसे पूछा, ऐसा पाखंड क्यों? “

भविष्य में, कार्यक्रम में और भी स्कूल शामिल होंगे। अधिकारियों ने भी माता-पिता को शिक्षित करने की योजना बनाई है। “हमने मलयालम में इस विषय पर निर्माण शुरू कर दिया है ताकि यह लोगों के व्यापक समूह तक पहुंच सके।”

 

तर्कसंगत का पक्ष 

र्तकसंगत  इस अद्भुत पहल पर श्री अली की सराहना करता है और उम्मीद करता हैं कि इस कार्यक्रम को व्यापक रूप से पेश किया जाएगा ताकि फेक न्यूज़ से होने वाले हादसों से बचा जा सके।

 


 

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