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झारखण्ड सरकार की नयी अधिसूचना: डॉक्टर्स अब से कैपिटल लेटर्स में प्रिस्क्रिप्शन लिखेंगे

Kumar Vibhanshu

September 25, 2018

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डॉक्टर के हैंडराइटिंग पर लिखे जाने वाले चुटकुले अब ज़्यादा दिन नहीं चलेंगे, क्यूंकि अब झारखंड सरकार ने यह अनिवार्य कर दिया है कि सारे निजी अस्पताल और नर्सिंग होम के डॉक्टर अब से प्रिस्क्रिप्शन या चालू भाषा में दवा की पुर्ज़ी अब बड़े अक्षरों यानि के कैपिटल लेटर्स में लिखेंगे| साथ ही यह भी सुनिश्चित करेंगे कि दवा के जेनेरिक नाम को भी कैपिटल लेटर्स में लिखा जाये,आईएमसी के निर्देशों के मुताबिक (प्रोफेशनल कंडक्ट ,एटिकेट एंड एथिक्स) रेगुलेशन्स 2002, यह सब इसलिए कि प्रिस्क्रिप्शन में लिखे दवा को पढ़ने में गलती न हो|

 

अधिसूचना क्या कहती है?

अधिसूचना 21 सितंबर को स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा और परिवार कल्याण विभाग के उप सचिव शशांक सिन्हा अखौरी ने जारी की थी।

यदि इन निर्देशों का उल्लंघन किया जाता है, तो पहली बार चेतावनी मिलेगी, दूसरी बार में कुछ समय के लिए निलंबित कर दिए जायेंगे और अगर तीसरी बार भी यही भूल हुई तो डॉकटर का रजिस्ट्रेशन यानि की पंजीकरण कैंसिल हो जायेगा| निर्देश वास्तव में 28 सितंबर, 2016 को जारी किया गया था, और उसमें कहा गया था कि, “वह (डॉक्टर) सुनिश्चित करेंगे कि केवल ज़रूरी पर्चे और दवाओं का उपयोग किया जा सके|”

19 सितम्बर को द हिन्दू  से बात करते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के डॉ के.के. अग्रवाल ने बताया कि “केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय जल्द ही इस प्रभाव के लिए राजपत्र अधिसूचना ला रहा है जिसके बाद नियम पूरे देश में लागू होगा।” उन्होंने यह भी कहा कि यह कदम डॉक्टरों को हालिया बदलाव के बारे में जानकारी देगा, जिससे इस कदम को प्रभावी रूप से अमल में लाया जा सकेगा और बदले में रोगियों का लाभ लंबे समय तक बढ़ जाएगा।

 

इस पहल का कुछ लोगों ने स्वागत किया  

डॉक्टरों ने इस पहल का स्वागत  किया है यह कहते हुए कि यदि ‘ थोड़े से अतिरिक्त कार्य’ से मरीज़ का भला होता है तो यह कार्य करने योग्य है|

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के डॉक्टर बंसल कहा कि इस नए नियम का पूरी तरह से पालन करने में हो सकता कि डॉक्टर्स को थोड़ा समय लगे क्यूंकि वह मरीज़ों से घिरे रहते हैं उन्होंने कहा, “हमने पहले से ही दवाओं के जेनेरिक नामों का उपयोग करना शुरू कर दिया है और इससे हमने मरीजों के कुल बिल को कम करने में योगदान दिया है क्योंकि वह जेनेरिक दवा कम दाम में मिलती है।”

इसके पहले स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने लोक सभा में अन्य सांसदों की चिंता से सहमति ज़ाहिर की थी कि प्रिस्क्रिप्शन में सही लिखावट में दवा का नाम न लिखे होने के कारण से इसके गंभीर परिणाम निकल सकते हैं, और मरीज़ के मरने का भी खतरा बना रहता है क्यूंकि केमिस्ट सही से लिखावट न पहचानने के कारन गलत दवा भी दे सकता है| जल्द ही सुधारात्मक उपाय लाए जाएंगे, उन्होंने ऐसा आश्वासन दिया था।

 

इस कदम का दूसरा पहलु 

हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए आईएमए राज्य अध्यक्ष डॉक्टर एके सिंह ने कहा कि यह नियम अप्रत्यक्ष रूप से मरीजों के लिए समस्याएं पैदा कर सकता है। उन्होंने कहा कि कैपिटल लेटर्स में प्रिस्क्रिप्शन लिखने में, कम से कम 10-15 मिनट लगेंगे, और अगर मरीजों की लंबी कतार है, तो उनमें से कई को प्रिस्क्रिप्शन  के बिना वापस जाना होगा।

झारखंड हेल्थ सर्विसेज एसोसिएशन (जेएचएसए) के महासचिव डॉ बिमलेश कुमार सिंह ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों, सदर अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में बड़ी संख्या में मरीज़ रोज़ाना इलाज के लिए आते हैं। उन्होंने कहा कि चिकित्सा अधिकारी दैनिक आधार पर कैपिटल लेटर्स में प्रिस्क्रिप्शन लिखने में सक्षम नहीं होंगे।

तर्कसंगत से बात करते हुए, कोलकाता अस्पताल की डॉक्टर अनासुया मुखर्जी ने कहा, “कैपिटल लेटर्स में दवाओं का नाम लिखना और दवाओं का जेनेरिक नाम भी प्रदान करना निश्चित रूप से मरीजों को लाभान्वित करेगा क्योंकि यह समय बचाएगा जो इसे समझने की कोशिश में बर्बाद हो जाता है| लेकिन दूसरी तरफ, यह कुछ दवा कंपनियों की व्यावसायिक संभावनाओं को प्रभावित कर सकती है जो वास्तव में बेहतर गुणवत्ता वाली दवाएं कुछ अन्य कंपनियों की तुलना में अधिक कीमत में बेचते हैं|”

 

तर्कसंगत का पक्ष

इस कदम पर अलग-अलग कदम उठाने के बावजूद, यह निश्चित रूप से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने जा रहा है। केमिस्ट और मरीज़ से अब दवा पहचानने में गलती नहीं होगी और ख़ास कर के वैसे मरीज़, जो लोग पढ़ नहीं सकते हैं, वे एक सुरक्षित जीवन जीएंगे। यह केमिस्ट और मरीजों के समय को बचाएगा।

एक जेनेरिक दवा खुराक के रूप में समान है, सुरक्षा, ताकत, गुणवत्ता, के रूप में भी वह एक ब्रांडेड दवा के समान काम करता है। दोनों एक ही लाभ प्रदान करते हैं। जेनेरिक नाम प्रदान करना भी यह सुनिश्चित करने जा रहा है कि रोगियों को उचित दवा दी जा रही है।

इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि निर्णय के कितने पक्ष हो सकते हैं, बेहतर कल की ओर एक प्रयास को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

 

 

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