मेरी कहानी

मेरी कहानी: 26 नवंबर की घटना ने मुझे सिखाया “साहस और शान्ति यह दो गुण विपरीत परिस्थति में भी हमारे अंदर मौजूद रहती हैं|”

Kumar Vibhanshu

November 30, 2018

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“26 नवंबर 2008 की शुरुआत किसी दूसरे रोज़ की तरह ही थी। मैं ताज में बैंक्वेट मैनेजर थी, और हम अपने नए अध्यक्ष के लिए एक स्वागत पार्टी की मेजबानी कर रहे थे, हमें बहुत से मेहमानों के स्वागत का इंतज़ाम करना था| हम में से 65 लोग बैंक्वेट हॉल में इकट्ठे हुए थे – सब कुछ योजना के अनुरूप जा रहा था और तभी  हमने अचानक कुछ जोरदार शोर सुना। पहले मैं गलत थी मुझे लगा कि बाहर फटाके फोड़े जा रहे हैं।

लेकिन बहुत जल्द, हम सभी के फ़ोन पर मैसेज और कॉल आने शुरू हो गए और हमें बताया गया कि कुछ बंदूकधारियों ने ताज में प्रवेश किया है। हम तुरंत हरकत में आ गए – हमने सभी दरवाजे बंद कर दिए और रोशनी बंद कर दी। मेहमान घबरा गए वो सभी हमसे पूछने लगे कि हम उन्हें बाहर क्यों जाने नहीं दे रहे? हमने उन्हें जैसे ही स्थिति के बारे में बताया, अफ़रातफ़री चालु हो गई। मैंने उन्हें शांत करने और उन्हें शांत रखने की कोशिश की ताकि आतंकवादियों का ध्यान आकर्षित न किया जा सके।

हालांकि मैंने खुद को भी घबराने से रोकने की पूरी कोशिश की। अंदर से मुझे यह महसूस हुआ कि चीजें ठीक होने जा रही हैं – मुझे हमारी सशस्त्र बलों पर विश्वास था। मुझे पता था कि वे हमारे लिए आएंगे। मेरी मां, जो उस समय बॉम्बे में नहीं थीं, मुझे यह पूछने के लिए कॉल किया कि मैं कहाँ हूँ? मैंने उनसे झूठ बोला और उन्हें  बताया कि मैं घर पर सुरक्षित थी। मैं नहीं चाहती थी कि वह घबराए और किसी और चीज से ज्यादा मैं अलविदा कहना नहीं चाहता थी।

जब हम अगले दिन सुबह पांच बजे खिड़की के माध्यम से बच के निकले, तो हम में से बहुतों ने ताज के करीब रहने का फैसला किया – हमने ऐसा इसलिए किया क्योंकि हम उस जगह को छोड़ कर जाना नहीं चाहते थे। हम किसी भी तरह से मदद के काम आना चाहते थे। सबकुछ सामान्य होने के एक दिन बाद, हम साफ-सफाई के लिए होटल में वापस आ गए। वहाँ का मंज़र देख कर हम सब अंदर से हिल गए मगर अपने भावनाओं पर काबू रख कर हमनें जगह को सामान्य बनाने का प्रयास किया|

 

“26th November 2008 began like any other day. I was a Banquet Manager at Taj, and because we were hosting a welcome…

Posted by Humans of Bombay on Sunday, 25 November 2018

 

यह सब कुछ 29 नवंबर 2008 को ख़त्म हुआ, तब तक मैं घर आ चुकी थी, और न्यूज़ पर सब कुछ देख रही थी|  जब जब टेलीविज़न पर वह सारे तस्वीर दिखा रहे थे मैं रो पड़ती थी, मगर साथ ही इस घटना ने मुझे मज़बूत भी बनाया था|  जब मैं अपनी माँ से मिली तो उन्होनें मुझे सबसे मिलते ही थप्पड़ मारा और मुझे ज़ोर से गले लगा लिया, न केवल मेरे घर के परिवार ने बल्कि ताज परिवार ने भी मुझे उस हालात से जूझने में मदद की, हमनें उस जगह को एक एक ईंट जोड़ कर बनाया और उसकी पुरानी गरिमा और ख़ूबसूरती को वापस स्थापित किया|  ताज के दीवार की हर छुपी दरार हमें इस बात की याद कराती है कि “साहस और शान्ति यह दो गुण विपरीत परिस्थति में भी हमारे अंदर मौजूद रहती हैं|”

 

#SuperhumansOfBombay 

 

 

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