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बिहार : दलित महिला को नंगा कर पीटने और परेड कराने के ज़ुर्म में अदालत ने 20 लोगों को जेल की सज़ा सुनाई

तर्कसंगत

December 3, 2018

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30 नवंबर को, बिहार की एक अदालत ने दलित महिला को नंगा करने और परेड कराने के जुर्म में 20 लोगों को जेल की सज़ा सुनाई। पांच अभियुक्तों को सात साल की जेल की सजा सुनाई गई है, और अन्य 15 को दो साल की जेल की सज़ा सुनाई गयी है| यह घटना बिहार के भोजपुर जिले में तीन महीने पहले हुई थी, और घटना के समय अभियुक्तों ने उस महिला पर हमला किया था| अभियुक्तों को यह संदेह था कि 19 वर्षीय व्यक्ति के मौत के पीछे उस महिला का हाथ है।

स्क्रॉल के अनुसार, अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश रमेश चंद्र द्विवेदी ने मामले में अभियुक्तों पर जुर्माना भी लगाया है। पांच लोगों को 10,000 रुपये जुर्माना लगाया गया है, और अन्य 15 को प्रत्येक को 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। बुधवार को, अदालत ने सभी आरपियों को अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार की रोकथाम के अधिनियम के अंतर्गत दोषी पाया।

न्यूज़ 18 के अनुसार फैसले के बाद, बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार ने कहा कि सजा “एनडीए सरकार द्वारा निर्धारित कानून के शासन के उच्च मानकता का एक नया उदाहरण है”। उन्होंने आगे कहा कि आरोपी को घटना के एक सौ दिनों के भीतर दंडित किया गया था।

 

घटनाक्रम 

20 नवंबर को इंटरनेट पर गुस्साई भीड़ द्वारा एक महिला को बेतरतीबी से पीटे जाने का परेशान करने वाला वीडियो वायरल हुआ, उसमें यह भी देखा गया कि उग्र भीड़ ने हत्या के संदेह में उस महिला को निर्वस्त्र कर के भोजपुर जिले में घुमाया| भीड़ इतना करने पर भी नहीं रुकी बल्कि रोड के किनारे के दुकानों, मकानों और सड़क पर खड़े मोटरसाइकिल को भी जला डाला|

डीएनए के रिपोर्ट के अनुसार यह घटना बिहार के आरा प्रान्त के बिहिया गाँव की है| जहाँ इस महिला को वैश्यावृत्ति के लिए जानने वाले इलाके से निकाल कर भीड़ ने निर्वस्त्र कर के पीटा, और नग्न अवस्था में परेड भी कराया गया और यह सब इसलिए क्यूंकि उसपर विमलेश कुमार  उर्फ़ छोटू साव की हत्या का संदेह था, मृत्यु से पहले अंतिम बार विमलेश उस महिला के साथ देखा गया था|

“एक पुलिस सूत्र ने डीएनए को बताया कि “लड़के का मृत शरीर रेलवे ट्रैक पर पाया गया था। जबकि स्थानीय पुलिस और आरपीएफ एक दूसरे पर दोष डालने में व्यस्त थे, कुछ परिवार के सदस्यों ने हत्या के लिए वैश्यावृत्ति वाले क्षेत्र के लोगों को दोषी ठहराया। उन्होंने स्थानीय लोगों को उकसाया कि वैश्यावृत्ति में रहने वाले लोगों द्वारा लड़के की हत्या हुई थी, जिसके बाद उग्र भीड़ ने कुछ घरों को जला दिया और इस महिला को नग्न करके घुमाया।

पुलिस ने बताया कि भीड़ ने महिला को उसके घर से खींच कर निकाला, उसके कपड़े फाड़े और उसे मारा पीटा भी। महिला की कई बार मिन्नतों के बाद भी भीड़ ने ज़रा सी भी दया नहीं दिखाई और उसे सरेआम पीटती और शर्मसार करती रही। बाद में महिला को अस्पताल ले जाया गया। घटना के समय, महिला की मदद करने के बजाय कई लोग अपने सेल फोन पर इस घटनाक्रम को फिल्माने में लगे थे।

 

तर्कसंगत का तर्क

यह दोनों ही घटनाएं अपनी अपनी जगह पर जघन्य अपराध हैं चाहे वह 19 साल के व्यक्ति की हत्या हो या महिला को निर्वस्त्र कर मारने पीटने की घटना हो| मगर एक बात जो यहाँ साफ़ है कि कानून व्यवस्था तो लचर रही ही मगर साथ ही साथ समाज के लोगों को भड़का कर या उन्हें गलत खबर देकर कुछ भी अपराध भीड़ के रूप में करवाया जा सकता है और वह ऐसा करने से पहले ज़रा सा सोचते भी नहीं कि उस खबर या अंदेशे की सत्यता कितनी है? यह सब शायद इसलिए भी क्यूंकि लोगों को कानून व्यवस्था पर भरोसा न रहा हो, समाज यह देख रहा है कि हत्या, बलात्कार जैसे कुकर्म कर के भी लोग क़ानून से बच जाते हैं तो फैसला अब वह स्वयं कर रहे हैं| तर्कसंगत इस घटना की निंदा करता है, साथ ही अपेक्षा करता है कि जिस तरह से पुलिस और कानून व्यवस्था ने अभियुक्तों को सज़ा दिलाई उसी तरह से आगे भी मुस्तैदी से अपने काम को करते रहे ताकि सामाजिक और पारिवारिक क्षति न हो|

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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