मेरी कहानी

मेरी कहानी: मेरे कक्षा के बच्चों ने अपने पॉकेट मनी के पैसे मिलाकर अपने ग़रीब दोस्त के लिए नए कपड़े ख़रीदे

तर्कसंगत

December 3, 2018

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कल जब मैंने अपने क्लास VI बी के अंदर कदम रखा, तो सभी लड़के एकजुट होकर चिल्लाए, ‘सर, क्या आपने दुर्गा पूजा के लिए नए कपड़े खरीदे हैं?’ यह मेरे लिए एक असामान्य सवाल था, खासकर  तब जब बच्चे यह सवाल पूछ रहे थे। जवाब देने के बजाय, मैंने उनसे पूछा कि, ‘आप में से कितनों ने नए कपडे खरीदें हैं हाथ उठयें।’

दो बच्चों को छोड़ कर सभी ने अपने हाथ खड़े किये, मैं उन उदास चेहरों के पास गया और इसका कारण पूछा| पहले छात्र ने बताया कि उसके पिता बिजली ऑफिस में काम करते हैं और उन्हें रविवार के रोज़ भी काम करना पड़ता है इसलिए उन्हें अभी तक नए कपड़े खरीदने का समय नहीं मिला| दूसरे छात्र देब दुर्लभ ने बताया कि उसके पिता दिहाड़ी मजदूर का काम करते हैं, और उसकी माँ सड़कों पर घूम घूम कर दिन भर मछलियाँ बेचती है|

उस मासूम ने बड़े ही सादगी से कहा कि “पिछले साल बाबा ने नए कपड़े खरीद कर दिए थे, इस साल नए कपड़े मिलेंगे या नहीं मुझे नहीं मालूम” उसने आगे बताया कि “माँ पिछले दिनों बीमार थी, इस साल शायद उसे नये कपड़े नहीं मिलेंगे”|

अमूमन चहल पहल और शोर शराबे से भरे उस क्लास में सन्नाटा छा गया|

मेरे पास बोलने के लिए कुछ शब्द नहीं थे, की तभी एक लड़के ने कहा कि ‘सर, हम सभी पैसे मिलाकर देब के लिए नए कपड़े खरीदेंगे, इसके पहले कि मैं अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर पाता उसने आगे कहा ‘सर अगर पैसे घटे तो आपको भी पैसे मिलाने पड़ेंगे’|  मैं राज़ी था|

आज जब मैं अपनी क्लास में गया तो सभी बच्चे बेसब्री से मेरा इंतज़ार कर रहे थे, हम सब मध्यावली में स्कूल के पास के दूकान पर गए| देब को उसके ‘नए कपड़े’ मिल गए थे, बच्चों में उत्साह था, वह गर्व का अनुभव कर रहे थे उनके चेहरे पर ख़ुशी थी| उस पल को मैंने अपने स्मार्टफोन और दिल में हमेशा हमेशा के लिए क़ैद कर लिया|

 

 

कहानी: मानस रॉय

 

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