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नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का दावा है, “वित्त वर्ष 2017-18 में 70 लाख नौकरियां बनाई गईं।”

तर्कसंगत

December 5, 2018

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नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने हाल ही में कहा कि एनडीए शासन के वित्तीय वर्ष 2017-18 में 70 लाख नौकरियां पैदा की गई हैं। उन्होंने कर्मचारियों के भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के आंकड़ों के आधार पर अपना बयान दिया है।

उनका बयान पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस टिप्पणी के बाद आया जिसमें उन्होनें मोदी सरकार के दो करोड़ से ज़्यादा रोज़गार दिए जाने के वादे को केवल एक झांसा बताया|

 

70 लाख नौकरियां उपलब्ध कराई गयी

फर्स्टपोस्ट के रिपोर्ट के अनुसार कुमार ने वर्तमान सरकार के शासन के विरोध में रोज़गार रहित विकास वाले आलोचना को “नकली” बताया। उन्होंने आगे कहा कि परिवहन वाहनों की बिक्री में वृद्धि, मुद्रा ऋण और ईपीएफओ डेटा का व्यापक वितरण यह बताता है कि पिछले चार वर्षों में रोजगार और स्व-रोज़गार दोनों के लिए कितने महान अवसर पैदा हुए हैं।

मनमोहन सिंह के बयान पर टिप्पणी करते हुए कुमार ने कहा, “उनके प्रति पूरे सम्मान के साथ मैं कहना चाहूंगा कि, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रोजगार उत्पादन पर आंकड़ों का ज़िक्र नहीं किया है, मुझे लगता है कि यह एक नकली आरोप है और मुझे लगता है कि बहस इस बात पर होनी चाहिए नौकरियों की गुणवत्ता में सुधार कैसे लायी जाए,?” जैसा कि पीटीआई द्वारा सूचित किया गया है।

कुमार ने नौकरी निर्माण के संबंध में एनडीए सरकार के खिलाफ आलोचना के आधार पर सवाल उठाये हैं। उन्होंने कहा कि अगर बेरोजगारी वास्तव में बढ़ रही थी, तो शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी भत्तों में कमी आनी चाहिए थी, हालांकि,ऐसा नहीं है|

द हिंदू के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले किसानों के विरोधों के बारे में उन्होंने दावा किया कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था “अच्छे स्थिती” में है, जैसे कि किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी- मिनीमम सपोर्ट प्राइस) जबरदस्त मात्रा में बढ़ाया गया है। उन्होंने कहा, “ग्रामीण अर्थव्यवस्था अच्छी हाल में है, किसानों की आय बढ़ रही है।”

 

रोज़गार में वृद्धि ?

यह पहली बार नहीं है कि एनडीए शासन के तहत बढ़ी हुई नौकरी निर्माण का दावा किया गया है। अगस्त में, पीएम मोदी ने कहा कि पिछले साल (2017) फॉर्मल क्षेत्र  में 70 लाख नौकरियां पैदा हुई थीं। यहां तक कि उनके द्वारा किया जाने वाला दावा भी ईपीएफओ के आंकड़ों पर आधारित था।

यह ध्यान देने वाली बात है कि, सितंबर में द वायर द्वारा रिपोर्ट किया गया था जिसमें यह बताया गया था कि ईपीएफओ ने एक आंकड़ा जारी किया जिसमें दिखाया गया है कि फॉर्मल क्षेत्र में पेरोल का लगभग एक-चौथाई हिस्सा नौकरी बदल रहे लोगों का है  इसका मतलब है कि ईपीएफओ ने पिछली नौकरी छोड़ कर नए नौकरी में आये लोगों को भी नयी नौकरी के आँकड़े में मिला लिया।

तर्कसंगत ने अर्थशास्त्री आकाश जिंदल से बात की, जिन्होंने कहा, “मैं इस नंबर (70 लाख) पर आने वाली पद्धति पर टिप्पणी नहीं कर सकता। हालांकि, यह सच है कि नौकरियों का निर्माण समय की आवश्यकता से कम है।”

इसके अलावा, फरवरी में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि तब तक लगभग 31 मिलियन बेरोजगार लोग नौकरियों की तलाश में थे। रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि जुलाई 2017 में, बेरोजगारी की दर 3.4% कम हो गई, हालांकि, यह तब से लगातार बढ़ती रही। फरवरी 2018 में, यह संख्या 7.1% तक बढ़ी।

 

न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनिमम सपोर्ट प्राइस)

कुमार ने यह भी कहा कि बड़ी मात्रा में एमएसपी में वृद्धि के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था अच्छे स्थिति में है।

जुलाई 2018-19 में खरीफ फसलों के बिक्री सम्बन्धित एमएसपी में वृद्धि को मंजूरी दी गयी। अक्टूबर में, 2018-19 के लिए सभी राबी फसलों के लिए एमएसपी बढ़ाने का निर्णय किया गया था।

एक बहस यह भी है कि एमएसपी दरों में वृद्धि स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों के अनुसार नहीं है। दूसरा, एमएसपी दरों में वृद्धि विभिन्न फसलों में समान नहीं है। साथ ही, भारत में खाद्य फसल के पुनर्गठन पर सरकार द्वारा नियुक्त समिति द्वारा प्रस्तुत एक जुलाई की रिपोर्ट में कहा गया है कि किसानों की कुल संख्या में से केवल 6% एमएसपी पर अपनी फसलें बेच सकते हैं।

हाल ही में, नई दिल्ली में आयोजित प्रमुख किसानों के विरोधों में से एक बेहतर एमएसपी दरों की मुख्य मांग थी।

 

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