मेरी कहानी

मेरी कहानी: मैं सोशल मीडिया पर इस्लामोफोबिया के बारे में बात करता हूँ लेकिन सच्चाई यह है कि मैं भी पक्षपात करता हूँ

तर्कसंगत

December 5, 2018

SHARES

पिछले दिनों, एक वीकेंड को मैं घर पर बैठे-बैठे बोर हो रहा था| मेरे कुछ दोस्तों ने मुझे फोन किया और कहा कि वे एक फिल्म देखने के लिए जा रहे हैं। मुझे भी कुछ काम नहीं था तो मैंने तुरंत पूछा, “कौन सी फिल्म”? उन्होंने जवाब दिया “मुल्क“। मैंने थोड़ा सोचा और फिर फिल्म देखने उनके साथ चला गया। उस फिल्म में दिखाया गया है कि एक मुस्लिम नायक के पूरे परिवार को अत्यधिक अपमान और मानसिक पीड़ा से गुज़रने के लिए मज़बूर किया गया है, जब यह पता चला कि उसका बेटा एक बम विस्फोट में शामिल था।

जैसे ही मैंने इसे देखना शुरू किया, मुझे एहसास हुआ कि मैं उन लोगों के जैसा ही था जिन्होंने उस मुस्लिम पिता को कई तरीकों से परेशान किया था। मुझे पता है कि बहुत से लोग जानबूझकर नहीं, लेकिन वह भी ऐसा ही करते हैं।

हालाँकि फिल्म ख़त्म हुई और मैं घर आया, मगर मेरे ज़ेहन में फिल्म अभी भी घूम रही थी| मेरे दिमाग में कई सारे सवाल घूम रहे थे, मैंने फिल्म के कई भागों को अपनी सोच के साथ तुलना शुरू किया जहाँ मेरे सोच मेरे विवेक पर हावी हो जाते थे| मैं उस वक़्त क्या करता जब मुझे यह पता चलता कि मेरे पड़ोसी का बेटा बम धमाकों में शामिल है? क्या मैं लोगों के पहनावे और दाढ़ी के हिसाब से या उनके धार्मिक मान्यता के हिसाब से उनके प्रति व्यक्तिगत राय नहीं बनाता हूँ? या क्या मेरा व्यवहार यह जानकार लोगों के प्रति बदल नहीं जाता कि वह किसी अन्य जाती या धर्म को मानने वाले हाँ?

कुछ समय पहले मैं दिल्ली से भोपाल ट्रैन से सफर कर रहा था| बीच में एक मुस्लिम परिवार ट्रैन पर सवार हुई, वह सभी काफी ख़ुश नज़र आ रहे थे और किसी शादी में जा रहे थे| वह अपने साथ काफी सारा नॉन वेज खाना भी लाये जो कि मुझे काफी पसंद है, खाने के वक़्त तकरीबन रात के 8 बजे उन्होनें खाने की तैयारी शुरू की|  मुझे अकेला देखे के उन्होनें मुझे भी खाने के लिए पुछा, मैं हाँ कहना चाहता था मगर थोड़ी देर के लिए झिझक कर मैंने ना बोल दिया|  उन्होनें इसके बाद भी मुझसे खाने को कहा पर मैंने विनम्रता से मन करा दिया| मेरे मना करने का कारण यह नहीं कि मुझे भूख नहीं थी, बल्कि मुझे डर लगता था|

यह कोई पहला या एकमात्र वाक्या नहीं है जो मेरे साथ हुआ| कई और भी हैं, एक रोड ट्रिप के दौरान मैं और मेरे दोस्तों ने पाया की हमारी गाड़ी का हॉर्न ख़राब है, उसे ठीक कराने के लिए हम रास्ते पर एक ग़ैराज पर रुके, वहां पर एक मैकेनिक मुस्लिम वाली टोपी पहन कर बैठा था, मेरा एक दोस्त जो मेरा दूर का रिश्तेदार भी है उसे देख कर कुछ व्याकुल से होने लगा और वहाँ के मैनेजर से जा कर गैराज़ मालिक का नाम पुछा, उसने बता दिया| उसके बाद वह लौट कर आया और हमें दूसरे गैराज़ में जाने के लिए कहने लगा क्यूंकि मालिक एक मुसलमान था|  मैं झुंझला उठा, मैंने पुछा इससे हॉर्न के ठीक करने का क्या सम्बन्ध है? बजाये इसके कि हम कुछ और दूर बिना हॉर्न के गाड़ी चला कर ले जाएँ हमें इसे यहीं ठीक करवा लेना चाहिए| उसने कहा ” अगर तुम सच्चे हिन्दू हो तो तुम्हें मुस्लिमों के द्वारा बनाये गए सामान न इस्तेमाल में लाना चाहिए न ही खरीदना चाहिए|” मैंने उससे पुछा कि उसे यह सोच कहाँ और कैसे मिली उसने बताया कि कुछ दिन पहले उसे व्हाट्स ऍप पर ऐसा एक मैसेज आया था, जहां सच्चे हिन्दुओं को मुसलमानों का भरसक बहिष्कार करने के लिए कहा जा रह था| यह अविश्वशनीय था मगर हमने गाड़ी का हॉर्न आगे जा कर एक सरदार के गैराज़ पर ठीक कराई|

हम राजनेताओं को हमेशा समाज को बांटने के लिए दोषी ठहरा सकते हैं, मगर वह हमारे अंदर के पक्षपात और एक दूसरे के लिए नफ़रत के भाव का इस्तेमाल करते हैं| एक मुल्क़ केवल उसके झंडे या नक़्शे से नहीं बनता उसे हम नागरिक एक राष्ट्र बनाते हैं| यह महत्वपूर्ण है कि हम यह देखें कि हमारा व्यवहार इस बात के अनुरूप हो जैसा हमारे संस्थापक चाहते थे कि हम वैसे समाज बनाने की दिशा में काम करे जहां हर नागरिक अपनी जाति, पंथ और धर्म के कारण भेदभाव के डर के बिना रहता है। हमें वापस जानने और समझने की ज़रूरत है कि धर्मनिरपेक्ष वास्तव में होता क्या है, और खुद से पूछें कि क्या हमारे कार्य धर्मनिरपेक्षता के सार के खिलाफ जाते हैं।

मैंने मुल्क़ फिल्म संयोगवश देखी मगर उसने मेरे जीवन पर आजीवन प्रभाव छोड़ दिया। इस फलम ने मेरी आँखें खोल दीं और मुझे दिखाया कि खुले दिमाग का व्यक्ति होने के बावजूद, मैं अपने देशवासियों के प्रति पक्षपाती हूँ। मुझे उम्मीद है कि मुल्क जैसे अधिक फिल्में बनाई जाएँगी|

 

 

अगर आपके पास भी दुनिया को बताने के लिए एक प्रेरक कहानी है, तो हमें अपनी कहानी [email protected] पर भेजें

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...