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उत्तराखंड: सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए इस महिला की अनूठी पहल पहाड़ी राज्य से उनके पलायन को कम करने के उद्देश्य से लक्षित है

तर्कसंगत

Image Credits: Anand Vatika Green Gurukulam/ Facebook

December 6, 2018

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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से राज्य के दूसरे हिस्सों में आ कर बसने वाले लोगों के साथ साथ सरकारी स्कूल के बजाये प्राइवेट स्कूल की बढ़ती लोकप्रियता ने एक मुश्किल स्थिति को जन्म दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में 10 से कम छात्रों के 700 से अधिक सरकारी स्कूल बंद हो गए हैं।

दोनों क्षेत्र मिलाकर लगभग 2340 स्कूल, छात्रों की घटती संख्या के कारण बंद होने के कगार पर हैं। यह राज्य सरकार के लिए एक प्रमुख चिंता का कारण बन गया है| शिक्षाविद और कार्यकर्ता अनीता नौटियाल, अपने अनूठे पहल के साथ वहाँ के बच्चों के बेहतर शिक्षा औरऔर नेहतर जीवन के लिए कोशिश कर रही हैं।

तर्कसंगत ने अनीता नौटियाल से बात की जो राज्य के टिहरी गढ़वाल जिले में एक ‘आफ्टर स्कूल’ कार्यक्रम चला रही हैं। उनकी संस्था का नाम ‘आनंद वाटिका ग्रीन गुरुकुलम’ है जो ग्रामीण और शहरी बच्चों के बीच शैक्षणिक अंतर को काम करने के प्रयास में लगा है। नौटियाल ने कहा कि, 18 अगस्त, 2016 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में उन्होनें इस स्कूल की स्थापना की, वह इस स्कूल में प्रिंसिपल भी हैं।

 

स्कूल के बाद के स्कूल की अनूठी पहल

उन्होनें कहा, “मुझे पता चला कि उत्तराखंड और किसी भी दूसरे जगह के स्कूल के छात्रों के बीच एकमात्र अंतर शिक्षा की गुणवत्ता का है।”  इस समस्या से लड़ने के लिए, उन्होनें पहले अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय के स्थापना के बारे में सोचा। हालाँकि, यह विचार जल्द ही उन्होनें छोड़ दिया जब उन्हें यह पता चला कि राज्य सरकार भी यही सोच रही थी। तब वह स्कूल के बाद के स्कूल (स्कूल आफ़्टर स्कूल) जैसी एक परियोजना के साथ आईं जिसका उद्देश्य सरकारी स्कूल की शिक्षा का समर्थन करना है।

 

अनीता बताती हैं कि इन क्लासेज़ के बारे में कुछ भी पारंपरिक नहीं है। कक्षा 1 से कक्षा 8 के क्षात्र एक ही कमरे में साथ में बैठते हैं जहां एक स्वयंसेवी (वालंटियर) शिक्षक इंटरैक्टिव क्लासरूम टीचिंग मेथड का उपयोग करके विभिन्न विषयों को सिखाते है। ग्रीन गुरुकुलम एक सेट पाठ्यक्रम का पालन नहीं करता है बल्कि इसके बजाय “सिलेबस-अहेड-ऑफ-स्कूल-सिलेबस” जो उनके बीच शिक्षा की कमी को काम करता है| यह छात्रों के व्यक्तित्व में मौलिक सकारात्मक परिवर्तन भी लाता है।

इस संस्थान के शिक्षक भी स्वयंसेवक (वालंटियर) हैं जो कौशल (स्किल) आधारित ज्ञान प्रदान करते हैं। अनिता ने कहा कि उनके पास बड़ी संख्या में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शिक्षक हैं जो बच्चों को पढ़ाने के लिए साइन अप करते हैं। उनके केंद्र जिले के तीन स्थानों में उपलब्ध हैं और वे कुल 100 छात्रों को शाम के 4 बजे से शाम 7 बजे के दौरान पढ़ाती हैं और सर्दियों में उनकी कक्षा 4 बजे से शाम 5:30 बजे तक होती हैं। बच्चे ज्यादातर जिले में सरकार या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों से आते हैं।

एक कक्षा के बारे में बताते हुए, उन्होंने कहा, “एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने छात्रों को कंप्यूटर भाषा पढ़ाने के लिए वालंटियर किया, वह खेल खेल में बच्चों को कंप्यूटर की भाषा पढ़ाते हैं । इसके अतिरिक्त, छात्र अंतरराष्ट्रीय वालंटियर शिक्षक के आने के कारण से विभिन्न संस्कृतियों के संपर्क में आते हैं।

 

छात्रों का विकास 

“ज्यादातर स्थानीय हितधारकों और सरकारी स्कूल शिक्षकों के विरोध के कारण संस्थान की वृद्धि धीमी रही है, लेकिन फिर भी कक्षाओं में भाग लेने वालों के बीच विकास असाधारण रहा है” अनिता ने कहा। उन्होंने आगे  कहा, “मैं उन बच्चों के व्यक्तित्व और अंग्रेजी भाषा की शब्दावली में सुधार देख कर आश्चर्यचकित हूँ।”

उनकी  इस पहल को कई सारे स्कूलों के अधिकारियों और प्रिंसिपल से समर्थन प्राप्त हुआ है लेकिन पूर्ण रूप से अपने लक्ष्य को पाने में नाकाम रहे हैं। अनिता ने कहा कि ज्यादातर स्कूल शिक्षकों के साथ काम करने के बाद, उन्हें अक्सर आलोचना का सामना करना पड़ता है। संगठन के संस्थापक सदस्यों ने ‘ग्रीन गुरुकुलम’ के बैनर के तहत एक ट्रस्ट स्थापित किया है, स्कूलों के संचालन के लिए पैसे ज्यादातर दान से आते हैं।

यहां तक कि स्थानीय लोग इस पहल के लिए पैसे देने से कतराते हैं और अनीता को मौद्रिक सहायता के लिए दूसरों पर भरोसा करना पड़ता है। वह अब आने वाले महीनों में राज्य के अन्य जिलों में विस्तार करने की योजना बना रही है ताकि अधिक छात्रों की मदद मिल सके और उम्मीद है कि बढ़ते ड्रॉप-आउट दरों पर रोक लगायी जा सके।

हालाँकि यह सच है कि प्राइवेट-अंग्रेजी माध्यमिक विद्यालय की शिक्षा का अपना अलग ढंग है, अनिता नौटियाल का ‘आनंद वाटिका ग्रीन गुरुकुलम’ इसके बराबर हो यह नहीं कहा जा सकता है|  हालांकि, उनके प्रयासों के साथ, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के छात्रों को वो एक्सपोज़र मिल रहा है जो शायद उन्हें कहीं और नहीं मिलता। तर्कसंगत अनिता नौटियाल को तहरी गढ़वाल के छात्रों को अखिल दौर के शैक्षिक अनुभव लाने में उनकी अनूठी पहल के लिए सराहना की।

 

 

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