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बाबरी मस्ज़िद विध्वंस में उस समय के सरकार और विपक्ष के नेताओं की क्या भूमिका थी ?

तर्कसंगत

Image Credits: Times of India, NDTV,Economic Times

December 7, 2018

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वह 1992 के ठण्ड के मौसम की शुरुआत थी, भारतीय इतिहास में यह दिन कभी न भुलाये जाने वाले घटनाओं में से एक बन जायेगा यह किसी ने नहीं सोचा था, और यह कोई वैसी घटना भी नहीं जिस पर हम गर्व कर के आने वाली पीढ़ी को विरासत स्वरुप दे सकें| ख़ैर उस दिन के पहले से ही कई कारसेवक (स्वयंसेवकों) बाबरी मस्जिद में इकट्ठा होना शुरू कर चुके थे, और विध्वंस के दिन, दो लाख से अधिक कारसेवक अयोध्या में उस विवादित स्थान पर इकठ्ठा हो चुके थे। 6 दिसंबर 1992 को, भारी नारेबाज़ी के बीच, 16 वीं शताब्दी के पुराने बाबरी मस्जिद को विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के आदेश पर हजारों करासेवकों ने ज़मींदोज़ कर दिया।

 

जब भीड़ उस जगह पर खड़ी थी और गुज़रते समय के साथ लगातार संख्या बल में बढ़ रही थी, कई लोग, छड़, कुदाल, जैसे चीज़ों से लैस मस्जिद के गुंबदों के शीर्ष पर पहुँच गए और उसे तोड़ गिराया। उस दिन बाबरी मस्ज़िद के गिरने से अयोध्या और देश भर में सम्प्रदायिकता की जो धुल उड़ी वह आज भी हमारी आँखों में गड़ रही है, मगर हम राजनीतिज्ञों द्वारा फैलाये इस धुल को साफ़ भी नहीं कर रहे हैं, और इससे आज तक जूझ रहे हैं। उस दिन होने वाले विनाशकारी घटना में अतीत के हुए कुछ घटनाओं का भी प्रबल प्रभाव था| 

भले ही बाबरी मस्जिद का विध्वंस अज्ञात कारसेवकों के माथे मढ़ दिया गया, फिर भी उस समय के कई प्रमुख नेताओं ने इसका समर्थन किया और परोक्ष रूप से उसमें भाग लिया| 

 

रथ यात्रा

प्रस्तुत हैं उस समय के कुछ गद्दावर नेता जिनकी उस समय की महत्वपूर्ण भूमिका ने आज के अयोध्या की तस्वीर ही बदल कर रख दी|

सूची में सबसे पहले आते हैं लालकृष्ण आडवाणी, इन्होनें 1990 में बीजेपी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए रथ यात्रा शुरू की थी। उस समय भाजपा एक राजनीतिक दल के रूप में देश में पहचान हासिल करने की जद्दोज़ेहद में लगी थी और उस रथ यात्रा को दो सबसे प्रमुख चीजों के लिए सीधे जिम्मेदार माना जाता है – विवादित ढाँचे का विध्वंस और देश में भाजपा की पकड़ मज़बूत करने का प्रमुख कारण।  यात्रा के मुख्य नेता, आडवाणी ने राम मिन्दर के निर्माण के लिए हुंकार भरते हुए अपनी यात्रा गुजरात के सोमनाथ से शुरू की। अयोध्या में समाप्त होने वाली यात्रा बिहार में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव द्वारा रोके जाने के बाद अपने अंतिम गंतव्य तक पहुंचने में नाकाम रही। मुख्यमंत्री ने सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के आरोप में आडवाणी के गिरफ्तारी का आदेश दिया था।

मस्जिद के विध्वंस के दिन, आडवाणी साइट पर उपस्थित थे, जिन्होंने कथित तौर पर भीड़ को भड़काने का काम किया था। उन पर आरोप है, की उन्होनें वहाँ मौज़ूद कारसेवकों को मस्ज़िद पर हमला करने के लिए भड़काया।

द वायर के मुताबिक, कारसेवक में से एक, संतोष दुबे, जो केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के आरोपपत्र में नामित सबसे कम उम्र के आरोपी थे, ने बताया कि, “हम एल.के.आडवाणी, एम.एम.जोशी, उमा भारती एवं विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेताओं आदेश पर इकट्ठा हुए थे। उन्होंने कहा, “उनका कहना था कि हमें 500 साल की दासता के संकेत को मिटाना है। उन्होंने हमें बताया कि हमें बाबरी मस्जिद को गिराना है और हमने सफलतापूर्वक ऐसा किया है।”

 

“कोई भी ताक़त राम मंदिर के निर्माण को रोक नहीं सकती”

सूची में आडवाणी के बाद उनसे बड़े नेता उनसे पहले के भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी थे , जो 1991 में बीजेपी अध्यक्ष बने। जोशी भी  6 दिसंबर को बाबरी की जगह पर मौज़ूद थे।

इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्ट के अनुसार, मंच से, वह उत्तेजक नारे चिल्ला रहे थे और मस्जिद के विध्वंस के लिए कारसेवक को भी प्रोत्साहित कर रहे थे। बाबरी विध्वंस मामले के दौरान दायर की गई चार्जशीट के अनुसार, 1 दिसंबर 1992 को मनोहर ने कहा कि कोई भी बल राम मंदिर के निर्माण को रोक नहीं सकता है। इस मामले में उन पर आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया था।

 

वह नेता जिसे ढाँचा गिराने के लिए बुलाया गया 

इसके बाद भाजपा नेता और मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती सूची में तीसरे स्थान पर होंगी। भारती ने अपनी लोकप्रियता का श्रेय राम जन्मभूमि प्रकरण को दिया है। वह भी और नेताओं के साथ उस दिन बाबरी मस्ज़िद के नज़दीक मौज़ूद थीं।

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा रिपोर्ट में बताया गया है की आरोपपत्र की एक कॉपी के अनुसार, विध्वंस के समय, वह भड़काऊ नारे दे रही थी, “एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो”, “मस्जिद गिराओ, मंदिर बनाओ”, “बाबर के औलाद को पाकिस्तान भगाओ” और “जिन्ना बोले जय श्री राम” आदि|

लिब्राहन आयोग, जो इस घटना के मामले की जांच के लिए बनाई गई समिति है उसने भीड़ को उत्तेजित करने का आरोप उमा भारती पर लगाया है। भाजपा पार्टी की नेत्री उमा भारती ने घटना के लिए नैतिक जिम्मेदारी ली। हालाँकि, उन्होनें दावा किया कि ढाँचे के विनाश में उनका हाथ नहीं था।

 

नेता जो घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे

शिवसेना संस्थापक, बाल ठाकरे 6  दिसंबर 1992 को साइट पर मौजूद नहीं थे, लेकिन उनका दावा है कि उनके संगठन के लोगों ने मस्जिद को गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

फ्रंटलाइन के मुताबिक, विध्वंस से सिर्फ 10 दिन पहले, सिविल कपड़ों में एक पुलिस अधिकारी ने नोट किया कि उपनगरीय मुंबई के खार रेलवे स्टेशन पर एक पोस्टर पर लिखा था कि “ठाकरे, हज़ारों शिव सैनिकों के साथ अयोध्या जाएंगे, “यह भी कहा लिखा गया था कि” मंदिर का निर्माण,रोकना नामुमकिन है।

6 दिसंबर की घटनाओं में एक अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति भी थे जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के तत्कालीन प्रमुख अशोक सिंघल| उन्हें वीएचपी का प्रमुख प्रचारक कहा जाता है, जो बाबरी मस्जिद को गिराकर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की मांग कर रहे थे क्योंकि उनका मानना ​​था कि यह भगवान राम का जन्मस्थान है। पार्टी अध्यक्ष सिंघल को राम मंदिर आंदोलन का  वास्तुकार (आर्किटेक्ट) कहा जाता है। वह संघ परिवार (राइट विंग) के  संगठन के सबसे महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक थे। लाइव मिंट के मुताबिक, वह आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों के करीबी सहयोगी भी थे। वह उस दिन, स्थान पर भी मौजूद थे। 1984 में, उन्होंने तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी से बाबरी मस्जिद के द्वारों को फिर से खोलने की मांग के लिए ‘राम जानकी रथ’ यात्रा शुरू की थी। वह भी बाबरी मस्ज़िद को तोड़ने के मामले में आरोपी थे। 2015 में उनकी मृत्यु हो गई।

कई लोग तत्कालीन प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव को भी विध्वंस मामले में उनकी निष्क्रियता के लिए दोषी ठहराते हैं।। हालांकि, लिब्राहन आयोग ने उन्हें दोषी नहीं बनाया। आयोग ने कहा, “1992 में, केंद्र सरकार राज्य में अपने इकाई की निष्क्रियता और विकलांगता से ग्रसित थी, पूरे विश्वास के साथ सुप्रीम कोर्ट ने ‘संघ परिवार’ के घोषणाओं को सम्मिलित किया’। इंडियन एक्सप्रेस के द्वारा आयोग ने यह भी कहा कि राव के पास उस समय उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने का विकल्प था। हालांकि, सरकार ने ऐसा नहीं किया।

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