सप्रेक

रोहित पुजारी: फ़ौज की नौकरी छोड़ कर, निःस्वार्थ भावना से गाँव के भविष्य को सशक्त बना रहे हैं

तर्कसंगत

December 7, 2018

SHARES

कर्नाटक के बेल्गावी जिले में हीराकुंबी, एक ऐसा क़स्बा है जो विकास के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है, वहाँ की धुल भरी सड़क और झुग्गी झोपडी पीढ़ियों से मिली उपेक्षा की कहानी कहती है और जहाँ के लोग सार्वजनिक परिवहन और बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं से लगभग अनजान हैं। इस तरह के निराशा भरी तस्वीर के बीच, हम 45 वर्षीय पूर्व सैनिक, रमेश पुजारी से मिले, जिन्होंने अपना काम छोड़ दिया और अब सरकारी स्कूल में विभिन्न विषयों को पढ़ाते हैं और अपने बचाये हुए पैसे बच्चों के भविष्य के लिए खर्च करते हैं|

रमेश पुजारी झूठे वादों और बढ़ चढ़ कर दावों करने वालों में से नहीं हैं। वह इसी चीज़ से स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ स्थानीय सरकारी निकायों से किसी भी तरह की कोई प्रशासनिक मदद नहीं है, उन्होंने खुद उन सब चीज़ों  का भार अपने ऊपर ले लिया है जो इन बच्चों को उपलब्ध नहीं है – जैसे किताबें, सैन्य यूनिफार्म और फिजिकल ट्रेनिंग।

हाल ही में, पुजारी ने तर्कसंगत से बात करते हुए गर्व से बताया कि वह बच्चों को गणतंत्र दिवस के मार्च पास्ट की तैयारी करवा रहे हैं, वह हर साल गणतंत्र दिवस का आयोजन करते हैं। पुजारी ने तर्कसंगत को बताया, “मैंने इस साल 50 यूनिफार्म के लिए ऑर्डर दिया है, और बच्चे भी अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए परिश्रमपूर्वक अभ्यास कर रहे हैं।”

 

नौकरी छोड़ दी 

20 से अधिक वर्षों तक सेना में सेवा करने वाले किसी व्यक्ति के लिए नौकरी छोड़ कर वापस से सामान्य जीवन में लौटना आसान नहीं होता है, उसके बाद यह जानना और भी चौंकाने वाली बात थी कि उन्होंने वॉलन्टरी रिटायरमेंट केवल इस लिए लिया क्यूंकि वह कुछ मुट्ठी भर बच्चों को अशिक्षा से मुक्ति दिलाना चाहते थे, यह जानते हुए कि बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। “मेरे बचपन के दो सपने थे, पहला, भारतीय सेना में शामिल होने का और दूसरा शिक्षक बनना। पुजारी ने कहा, “इससे पहले कि मैं बहुत बूढ़ा हो जाऊँ और बच्चों के लिए कुछ कर न सकूँ मैंने अपना काम छोड़ दिया।”

उनके करीबी दोस्त सतीश राओकर ने हमें उनकी बेहद गरीब पृष्ठभूमि के बारे में बताया जहाँ से पुजारी आते हैं। पुजारी के बारे में उन्होनें बताया कि किस तरह से पैसे की कमी के कारण उनका जीवन संघर्षपूर्ण रहा, उन्होंने सब्जियां बेचीं,और अपनी शिक्षा को ज़ारी रखने के लिए हर तरह की नौकरी की और फिर सशस्त्र बलों की परीक्षा दे कर सैनिक बने।

सतीश राओकर आगे बताते हैं कि “शुरुआत में हमने सोचा कि सेना छोड़ कर गांव में बसने का यह निर्णय बहुत मूर्खतापूर्ण है, लेकिन अब जब हम इन बच्चों को सैन्य वर्दी पहने हुए देखते हैं, और स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर हर साल उन्हें सलाम करते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि हम गलत थे|

 

बचपन का सपना पूरा हुआ 

एक बच्चे के रूप में, श्री पुजारी सरहद से लौटकर घर आने वाले सैनिकों से मोहित थे। पुजारी इन लोगों को आदर्श मानते थे, और देश की सेवा कर के उन्होनें अपने सपने को पूरा किया। रमेश पुजारी कहते हैं “जब मैं छोटा लड़का था, तो मैं अपनी सीनियर की वर्दी पहनता था जो बॉर्डर से घर आते थे और एक बड़े सैन्य अधिकारी होने का नाटक करते थे। मैं हमेशा अपने देश की सेवा करना चाहता था”।

हालांकि, एक यथार्थवादी होने के नाते, वह यह भी जानते थे कि हर कोई भाग्यशाली नहीं हो सकता न ही उतने खर्च उठा सकता है| वह जानते थे कि नन्हे बच्चों के भविष्य निर्माण में शिक्षा और अनुशासन का कितना योगदान है।

 

स्कूल की खराब स्थिति लेकिन शिक्षण का अनोखा तरीका

170 छात्रों वाले स्कूल में एक दो कमरे की क्लास है जो कपड़े की चादर से विभाजित और एक जगह से दूसरे जगह शिफ्ट भी हो जाती है, यह छोटा संस्थान श्री पुजारी के जुनून का परिणाम है। न्यूनतम प्राथमिकता वाले दो प्राथमिक और केवल एक माध्यमिक विद्यालय वाले गांव में इन बच्चों को पाठ्यपुस्तकों से परे दुनिया से परिचित होने का थोड़ा मौका मिलता है, लेकिन इस विद्यालय में पढ़ाने का अनूठा तरीका है।

शिक्षकों में से एक कहते हैं “कभी-कभी एक ही कक्षा में दो अलग-अलग विषयों को पढ़ाने में दिक्कत आती है, इसलिए हम इन छात्रों को पौधो को पानी देने या पौधे लगाने के लिए बाहर भी ले जाते हैं। जब मैं यहां शामिल हुआ, तब स्कूल के बाहर का क्षेत्र बंजर था, लेकिन अब हमारे पास 70 से अधिक पेड़ हैं।”

 

एक उज्जवल भविष्य के लिए उम्मीद है

उनका उद्देश्य जमीनी स्तर पर सभी मूल्यों को लागू करना है, जबकि उनके युवा सदस्य अभी भी सिखाने योग्य हैं और अधिक सीखने के इच्छुक हैं, और भ्रमित नहीं हैं और पहले से ही अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। पुजारी कहते हैं, “ये बच्चे इस गांव का भविष्य हैं, स्वच्छता और स्वच्छता के महत्व के बारे में एक बच्चे को पढ़ाना पूरे परिवार को पढ़ाने के बराबर है।”

वह जानते हैं और साथ ही स्वीकार करते हैं  कि सफर लम्बा और कठिन है, और उनके लिए लगभग कोई मान्यता या प्रसिद्धि नहीं है। वह एक सेलिब्रिटी बनने की इच्छा नहीं करते हैं या ना सम्मानित होना चाहते हैं, वह इन बच्चों में अपनी जवानी के दिनों की छाया देखना चाहते हैं ।

 

तर्कसंगत का तर्क

पुजारी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो कुछ भी जादुई परिवर्तन की उम्मीद में नहीं करते हैं। उन्होंने अपने देश और अपने स्थानीय समुदाय की ओर अपनी ज़िम्मेदारी को पहचाना और स्वीकार कीया है, साथ ही अपने और स्कूल के लिए छोटे अवधि में प्राप्त करने योग्य सरल लक्ष्यों को निर्धारित किया है। बच्चों के लिए नई वर्दी प्राप्त करने से, उन वर्दी के द्वारा शारीरिक स्वास्थ्य और अनुशासन के महत्व को बढ़ावा देना साथ ही उनमें गर्व की भावना को बढ़ाना, और अंत में आधिकारिक सेना के गार्ड के सम्मान के लिए मार्च पास्ट सीखना उनमें से कुछ हैं।

एक तरफ जहाँ इस गाँव में सड़क की रोशनी और सार्वजनिक बसों की सेवा एक सपने की तरह है, वहीँ पर निःस्वार्थता भावना और व्यापक रुचि के साथ, समुदाय की एकता और प्रगति के आगे बढ़ने का जुनून दिलचस्प है।

 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...