मेरी कहानी

मेरी कहानी: उस रात भर के सफर में, मैं 4 बस स्टाफ के साथ अकेली सफर कर रही थी

तर्कसंगत

December 8, 2018

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मैं अदिति पांडे, राजस्थान के बनस्थली विद्यापिठ में पीजी की छात्रा हूँ। मुझे 7-8 अक्टूबर 2018 को लखनऊ में हो रहे भारतीय अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) में भाग लेने का अवसर मिला था।

8 अक्टूबर को जयपुर, से लौटते वक़्त मुझे न चाहते हुए भी रात 7:30 बजे की Scania AC बस में बैठाना पड़ा जो आलमबाग़ से चलती थी। मेरे साथ केवल एक यात्री और था। बस में चार कर्मचारी थे जिनकी आपस में अच्छी तालमेल थी, कि कब, कौन बस चलाएगा और कौन पीछे बैठेगा। वे सभी पुरुष थे और पूरे दृश्य को देखते हुए मुझे लगा कि मैं एक जोखिम उठा रही हूँ, लेकिन मुझे किसी भी कीमत पर जयपुर पहुँचना था। जब तक कि मैं यह उम्मीद कर रही थी कोई महिला यात्री चढ़े और मैं कुछ सुरक्षित महसूस करूँ, दो पुरुष यात्री और आ गए। बस के कर्मचारियों ने बड़े अच्छे स्वभाव से मुझसे से पुछा कि क्या करें बस आधी भी नहीं भरी है, आधे  घंटे के इंतजार के बाद भी बस आधी ख़ाली ही थी। बस फिर कम यात्री के साथ ही लगभग रात 8 बजे खुली, हम कुल 8 लोगों थे, मैं और अधेड़, मध्यम,युवा वर्ग के मिला के 7 पुरुष। थोड़ी देर के बाद कुछ महिला यात्री भी बस में सवार हुईं, लेकिन कानपुर बस स्टेशन पर उतर गई। मेरे पास अभी भी डर के साथ सफर करने के लिए पूरी रात पड़ी थी|

थोड़ी देर में प्रदीप नाम के कंडक्टर (उनके आपसे में बात करते समय मैंने उसका नाम सुना था ) ने हमें सलाह दी कि हम आराम से सिंगल सीट पर बैठ जाएँ। मैं उस समय दरवाजे के तरफ की दूसरी सीट पर बैठी थी। मैं थक गयी थी इसलिए मैं सो गयी। आधी रात को 12:30 बजे रात के खाने के लिए बस एक ढाबे पे रुकी ,मैंने अपना खाना खाया और जैसे ही बस के तरफ बढ़ रही थी तो बस के स्टाफ ने मुझे पीछे से आवाज़ लगाया और कहा कि मैं ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठ जाऊँ। उनके इस व्यवहार से मुझे लगा कि मैं बाकी के सफर में सुरक्षित हूँ।

मैं बस में वापस आ कर सो गयी, सुबह तक़रीबन 3.30 बजे बस आगरा पहुँची, जहाँ सारे यात्री उतर गए, अब बस के 4 स्टाफ के साथ मैं बस में अकेले सफर कर रही थी, मुझे बाक़ी यात्री के मंज़िल के बारे में नहीं मालुम था वर्ना मैं उनके साथ ही उतर जाती| मैंने उनमें से एक से पुछा की क्या मैं बस में अकेली हूँ ? जवाब था ‘हाँ ‘ और मुझे लगा कि “अब क्या होगा?”

बस के पंजाबी चालक श्री राजेंद्र गेला (मैं नाम लिखने में गलत हो सकती हूँ)  ने मुझसे पूछा कि क्या मैं बाथरूम जाना चाहती हूँ मेरे हाँ में जवाब देने पर वह मेरे साथ बस स्टैंड के शौचालय तक आये और बहार खड़े रहे। स्टाफ के दूसरे सदस्य ने 5 कप चाय लाई, चार खुद के लिए और एक मेरे लिए। उन्होनें मुझे भी दी मगर मैंने यह सोचकर कि उसमें कुछ मिलावट हो चाय नहीं पी। सब की चाय ख़त्म होने के बाद  सरदार जी ने बहुत ही विनम्र तरीके से मुझसे कहा  “पीलो बेटा पीलो”। मैं डर गयी थी, जो की मेरे चेहरे से साफ़ दिखाई दे रहा था, इसलिए वे वहां 10 मिनट की बजाय आधे घंटे तक रुके ताकि दूसरे यात्री आने पर में सहज हो जाऊँ। जब तक हम इंतजार कर रहे थे वे मुझसे बात कर रहे थे ताकि मैं डरूँ नहीं। वे मुझसे मेरे घर, मेरी पढ़ाई, लखनऊ आने के बारे में पूछ रहे थे। ईमानदारी से कहूँ तो उस समय मैं जैसी परिस्थिति में थी मुझे अच्छा लग रहा था। हालांकि हम आधे घंटे तक इंतजार करते रहे, कोई भी दूसरा यात्री बस पर नहीं आया और आखिर में, उन्होंने मुझसे पूछा “अब क्या किया जाए बेटा ?” मुझे पता था कि सुबह के 4 बज चुके थे और इसलिए मैंने उन्हें बस स्टार्ट कर आगे का सफर शुरू करने को कहा। जब बस शुरू हुई तो उन्होंने मुझसे एक मदद माँगा उन्होनें कहा कि, अगर पुलिस मुझे इस बस में अकेले सफर करने के बारे में पूछती है, तो मैं कहूँ कि मैं जयपुर परीक्षा देने जा रही हूँ।

आगरा के बाद बचे 3-4 घंटे के सफर में मैं बहुत खुश थी। मेरी पूरी धारणा बदल रही थी। वे मुझसे बात कर रहे थे, मेरे चारों ओर मजाकिया माहौल था, मुझे चुटकुले इत्यादि सुना रहे थे ताकि मैं असुरक्षित महसूस न करूँ।

मैं जयपुर पहुँच गयी और शायद मेरी ज़िन्दगी की सबसे यादगार सफर रही। उनके अच्छे, सरल व्यवहार के लिए, मैंने उनसे बस के आगे खड़े हो कर तस्वीर खिंचवाई, वही बस जिसमें बैठने में मुझे काफी डर लग रहा था।

 

कहानी: अदिति पांडे

 

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