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तमिलनाडु: मद्रास हाई कोर्ट ने आर्ट ऑफ़ लिविंग के समारोह पर रोक लगाया

तर्कसंगत

Image Credits: New Indian Express

December 9, 2018

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मद्रास उच्च न्यायालय के मदुरई खंडपीठ में एक जनहित याचिका दायर की गयी, जिसके जवाब में कोर्ट ने यह फ़ैसला सुनाया कि श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन (एओएल) यह सुनिश्चित करे कि उनके द्वारा आयोजित होने वाला कार्यक्रम तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर में न हो। इसके बाद यह कार्यक्रम तंजावुर मंदिर के पास एक कावेरी मंडपम नाम के निजी हॉल में स्थानांतरित कर दिया गया जहाँ समारोह में भाग लेने आये लोगों को शुल्क का भुगतान भी करना पड़ा|

न्यूज़ 18 की एक रिपोर्ट के अनुसार एक चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा दायर पीआईएल में, यह लिखा गया था “सम्मानपूर्वक सूचित किया जा रहा है कि श्री श्री रविशंकर जी ने 2016 में यमुना नदी के तट पर एक बैठक आयोजित की थी और माननीय राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने उसके बाद श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन (एओएल) पर 5 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया और अभी भी वह  मुकदमा अदालत के समक्ष लंबित है। “उन्होंने आगे तर्क दिया कि सदियों पुरानी संरचना को बचाना उनका कर्तव्य है क्योंकि यह प्राचीन काल से उस जगह पर है।

शुक्रवार, 7 दिसंबर को, यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साईट पर ‘तमिल देशीय पद्कप्पू याक्क्म’ के 30 से अधिक सदस्यों को वहाँ जमा होते देखा गया, जो श्री श्री रविशंकर की आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन (एओएल) द्वारा आयोजित एक निजी दो दिवसीय आयोजन के विरोध में इसके बाहर इकट्ठा हुए,यह सारे लोग समारोह के लिए मिले अनुमति के विरोध में एकत्रित हुए थे|

 

आयोजनस्थल पर विरोध प्रदर्शन

एओएल के दो दिवसीय ‘ध्यान शिविर’, को एचआर, सीई और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से अनुमति मिली थी, जो कि   शुक्रवार को शुरू होनी थी जिसमें ‘कश्मीरी शैववाद’ पर भाषण को सुनने 800 लोगों के आने की उम्मीद थी। पत्रकार ए आर मीयाम्मै ने मंदिर में एक अस्थायी पांडल देखा और सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें पोस्ट की, और इसके विरोध में प्रदर्शन गुरुवार को शुरू हुआ।

सूत्रों द्वारा न्यूज़ मिनट को बताया गया था कि एक पंडाल स्थापित करने से जो भक्त मंदिर में आते हैं, उनके आने जाने के रास्ते में बाधा आएगी, और यह एक तरह से अपमानजनक है। पीआईएल में यह भी तर्क दिया गया है कि अगर इस तरह की घटना को मंदिर की भूमि में आयोजित करने के की इज़ाज़त दी गयी तो मंदिर की पवित्रता प्रभावित होती है।

जिला पुलिस ने कहा कि उसने क्षेत्र में पर्याप्त सुरक्षा तैनात की है, जबकि मंदिरों के भूमि पर होने वाले इस आयोजन  के  विरोध में प्रदर्शनकारी सुबह 11 बजे से इकट्ठा होना शुरू हो चुके थे। हालांकि, एओएल फाउंडेशन ने आरोप लगाया है कि यह आंदोलन राजनीतिक रूप से प्रेरित हो सकता है।
एओएल  के तमिलनाडु की  मीडिया कोऑर्डिनेटर, राजि स्वामीनाथन कहती हैं कि “श्री श्री रविशंकर किसी भी राजनैतिक पार्टी से नहीं हैं लेकिन भाजपा से उनका नाम बेवजह जोड़ा जाता है। ये विरोध राजनीतिक दृष्टिकोण के साथ उन पर केंद्रित मालूम पड़ता है। “यह सिर्फ एक गलत धारणा का मुद्दा है।” उन्होंने आगे कहा कि मंदिर भूमि का इस्तेमाल पहले भी निजी इस्तेमाल के लिए किया गया है, और अब उनके पास समारोह के आयोजन के लिए पर्याप्त अनुमति है।

 

आर्ट ऑफ लिविंग और  यमुना के तट का मुद्दा

यह पहली बार नहीं है कि एओएल फाउंडेशन को इसके कार्यों के लिए निंदा की गई है। मार्च 2016 में, एओएल फाउंडेशन द्वारा दिल्ली के यमुना नदी के बाढ़ के मैदानों पर एक तीन दिवसीय विश्व संस्कृति समारोह आयोजित किया गया था।

द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार द्वारा स्थापित एक विशेषज्ञ समिति ने कहा था कि घटना के दौरान, नदी के किनारे सिर्फ क्षतिग्रस्त नहीं हुए  थे बल्कि “पूरी तरह नष्ट हो गए”।

यद्यपि फाउंडेशन को राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा अपने कार्यक्रम करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन इसके कारण हुए पर्यावरण के नुकसान के लिए 5 करोड़ रुपये का सरकारी मुआवज़ा भी भरने को कहा गया था ।

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