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1000 रूपये के उधार ने इस परिवार को सालों के लिए ग़ुलाम बना दिया

तर्कसंगत

December 10, 2018

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गहरा धुआँ चारो तरफ फ़ैल चूका था, दोनों बच्चों – सुंदरवल्ली और अंबु – को जागकर उनके दादा दादी और बच्चे चारों, अपने झोपड़ी के बाहर भागे। कुछ ही मिनटों में, उनके झोपड़ी और सामान आग में जल कर राख हो गए।

गहरी पीड़ा और झटके में, दादी अपनी बेटे और बहु के काम करने वाले जगह तक भाग कर गईं ताकि उन्हें यह बता सके कि क्या हुआ?

उस घटना के बारे में मुथू याद करती हैं और बताती हैं कि “इसके बारे में सुनना काफ़ी दुखद था।” “जब मेरी सास हमारे पास आई, तो वह डरी हुई थी। उसके आँसू और हताशा देखते हुए, मैंने भी रोना शुरू कर दिया … सबकुछ खत्म हो गया था। यह एक निराशाजनक स्थिति थी।”

बाद में, मुथु ने अन्य ग्रामीणों से सुना कि उसके मालिक, जो लकड़ी के काटने और कुछ खेत के टुकड़ों का मालिक भी है, वही दुर्घटना का कारण था। जब दुर्घटना हुई तो उसके शब्दों का असली मतलब समझ में आया।

उसने कहा था, “तुम हमेशा काम छोड़ना चाहती थी क्योंकि तुम्हारे पास वह घर है। यही कारण है कि किसी ने उसे जला दिया। अब वहाँ जाने का कोई मतलब नहीं वहाँ कुछ भी नहीं बचा।”

दुखी दिल से, मुथू ने कहा कि उसे सबकुछ समझने में कुछ समय लगा। उसने उन सभी घटनाओं को याद किया जिसके कारण उसे यह देखना पड़ रहा था।

भयावह अतीत

कुछ साल पहले, मालिक रु 1000 लेकर मुथु और सुंदरम से मिलने आया साथ ही उसने लकड़ी काटने और खेत में रहने और काम करने का निमंत्रण भी दिया। मजदूरी अच्छी थी और मुथू और सुंदरम का मानना था कि यह वह समय था जिसकी वे प्रतीक्षा कर रहे थे। वह एक ऐसे गाँव से आते थे जहाँ उनके पास घर नहीं था और नौकरी के भी अवसर न के बराबर थे, उन्होंने मालिक की बात मान ली। डरे लेकिन आशापूर्ण भाव के साथ, उन्होंने अपने बच्चों को सुंदरम के माता-पिता की देखभाल में छोड़ दिया और अलविदा कहा।

उन्हें पता ही नहीं था कि जो हजार रुपये उन्होंने स्वीकार किए हैं वह उन्हें वर्षों के बंधन में बाँध देंगे और उन्हें अपने मूल मानव अधिकारों और आजादी से भी दूर कर देंगे|

स्वतंत्रता का हनन

प्रस्ताव स्वीकार करने के बाद से ही, मुथु और सुंदरम की जीवनशैली पूरी तरह से बदल गई। उन्हें मालिक के हर चीज का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ा – कब खाएँ और कब तक काम करें, कहाँ जाना है, कहाँ रहना है और कब सोना है।

शारीरिक थकावट

यह दोनों हर दिन लंबे समय तक, सप्ताह में सातों दिन, पेड़ों को काटने, काँटे को साफ़ करने, लकड़ी को लोड करने, फसलों की खेती आदि का काम किया करते थे। शारीरिक श्रम से उनका शरीर दुखता था हाथों पर छाले पड़ गए थे। उनके दर्द और स्वास्थ्य के देखभाल में उनके मालिक की रुचि नहीं थी। वे गन्दी गाली और तानों से बचने के लिए पूरे दिन काम किया करते थे।

कमाई की चिंता

मुथु और सुंदरम ने यह सब केवल कमाई करने के लिए सहन किया, 200-300 प्रति सप्ताह, जो प्रति दिन 14-21 प्रति व्यक्ति के हिसाब से मिलता था, इसके साथ, यह दोनों कभी भी अपने ऋण चुकाने का सपना नहीं देख सकते थे, और साथ में ब्याज भी| यह पैसा उनकी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भी अपर्याप्त था। “अगर हम उसे अधिक पैसे के लिए कहते, तो वह चिल्लाता और कहता कि हमारे कर्ज को जल्दी ख़त्म करने के लिए पैसे काट रहा था “मुथु ने बताया।

खतरनाक परिवेश में बेघर

मुथु और सुंदरम चेन्नई में हवाई अड्डे के पीछे एक सड़क के किनारे रहते थे। उन्होंने एक तम्बू लगाया था जो चार फीट ऊंचा था, छड़ें और टैरपॉलिन शीट का उपयोग करके – उनके सिर पर एकमात्र छत वही थी। वे साँप , बिच्छुओं, और कीड़ों के लगातार डर में रहते थे। उस ख़ाली जगह में उनके पास कोई बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थी- कोई रोशनी नहीं, पानी नहीं, कोई उचित भोजन नहीं, कोई घर नहीं था।

कोई दीवार नहीं, लेकिन फंसे हुए

वह दोनों वर्कसाइट पर काम करने के लिए बाध्य थे। ऐसा नहीं था कि उनके चारों तरफ दीवारें थीं जो उनके भागने के रास्ते में खड़ी थीं, मालिक ने उनके दिमाग में इस क़दर डर बैठा दिया था कि वह उसी के लिए काम करने को मजबूर थे।

उन्हें किसी भी रूप में अपने गाँव में किसी भी चीज़ के लिए वापस जाने की इजाजत नहीं थी – चाहे वह त्यौहार हो, डॉक्टर से मिलने जाना हो या यहाँ तक कि अपने प्रियजन को अपने अंतिम बार देखने जाना हो। अगर वह व्यक्ति जो समय पर वापस नहीं आया, तो मालिक उसे वापस लाने के लिए आदमी भेजता और लौटने पर गंभीर दंड भी दिया जाता था ताकि आगे से ऐसी गलती न हो।

बच्चे पीड़ित थे

मुथु और सुंदरम स्वतंत्रता के लिए उत्सुक थे, लेकिन उनकी स्थिति केवल बदतर हो गई। मुथु कहती हैं- एक दिन, मालिक उनके बच्चों, सुंदरवल्ली और अंबू के साथ उनके पास आया और कहा कि, “जिन लोगों के पास वह अपने बच्चों का ख़्याल रखने के लिए छोड़ आये थे, वे उनकी देखभाल ठीक से नहीं कर रहे हैं। तो, मैंने उन्हें 20,000 रूपये दिए और बच्चों को यहाँ ले आया। “मुथु और सुंदरम चौंक गए। “मुझे यकीन था कि उसने हमसे झूठ बोला था। वह चाहता था कि हम वहाँ रहें और उसके लिए काम करते रहे।”

“मेरे बच्चों के काम को देखना हमारे लिए बहुत दर्दनाक था। उन्हें शिक्षा देने का बड़ा सपना था। काम शुरू करने के बाद भी, हमें अभी भी वह सपना था-आज किसी दिन इस जगह से बाहर निकलें और हमारे बच्चों के लिए शिक्षा प्रदान करें, लेकिन यह असंभव लग रहा था।”

मुथु का चेहरे उस दिन को याद करके के चमक उठता है, वह बताती है “जब हम पेड़ काट रहे थे, हमने देखा कि कुछ लोग पैंट और शर्ट पहने हुए हैं, जो हमारे तरफ चले आ रहे हैं।”

“उन्होंने हमें एक रिलीज सर्टिफिकेट दिया और कहा कि हमें अब और काम नहीं करना पड़ेगा,” मुथु मुस्कुराई। (रिलीज सर्टिफिकेट्स किसी भी बकाया ऋण को रद्द कर देते हैं, उन्हें किसी भी बंधन को मुक्त करने या अनजाने में हस्ताक्षर करने के लिए सहमत हो सकता है। बंधुआ श्रम के अधिकांश पीड़ितों के लिए, यह उनका पहला पहचान पत्र है।) “आरडीओ महोदया ने कहा कि हम घर वापस जा सकते हैं और समझाया कि हम कभी भी आगे से किसी से पैसे एडवांस में न लें या उधार न लें।”

कांचीपुरम के रेवेन्यू डिविज़नल अफसर (आरडीओ) डॉ डी. फ़रीदा बानो ने 21 सितंबर 2015 को मुथु, सुंदरम, सुंदरवल्ली, अंबू और सबसे छोटे बच्चे सुब्रमणी को छोड़ दिया। चार वर्षों में पहली बार, परिवार स्वतंत्र था!

आज़ादी का जीवन 
बंधन के बाद जीवन के साथ मुकाबला करना आसान नहीं है। वर्षों से दबे रहने के कारण शारीरिक रूप से, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से व्यक्ति प्रभावित हो जाता है। पीड़ितों को उस ट्रॉमा से निकलने के लिए देखभाल और नियमित हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है जो समाज में फिर से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं और उन्हें प्रेरित करती हैं। नियमित मीटिंग और काउंसलिंग क्लासेज के बाद पीड़ित ज़िन्दगी जीने योग्य बनते हैं और आजादी से आगे बढ़ते हैं। मुथु और सुंदरम के मामले में भी यही सच्चाई थी। तीन साल बाद, मुथु और सुंदरम देश के स्वतंत्र नागरिकों के रूप में आराम से रह रहे हैं। उनके पास पहचान दस्तावेज, राशन कार्ड, जॉब कार्ड और एक नया घर है।

स्वतंत्रता से सक्षम

स्वतंत्रता से मिलने वाली विकास और बदलाव की सीमा स्पष्ट है – मुथु और सुंदरम अब रिलीज़ किए गए बोंडेड लेबर एसोसिएशन (आरबीएलए) के सदस्य हैं, जो अपने जिलों में बंधुआ मजदूरी से जूझ रहे लोगों को निकालने का प्रयास करते हैं। वे लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने में मदद करते हैं, सरकार के साथ बचाव का नेतृत्व करते हैं और अन्य कमजोर लोगों को सरकारी कल्याण के उपायों तक पहुँचाने में मदद करते हैं।

मुथु विशेष रूप से याद करती है कि उसने कैसे एक बुजुर्ग, कमजोर आदमी को बंधुआ श्रम प्रणाली से निकलने में मदद की। “मैंने उसे उधार लेने के खिलाफ चेतावनी दी और उसे बताया कि बंधुआ श्रम कैसे काम करता है|”

सुंदरम कहते हैं, “वहाँ से बाहर आना जेल से बाहर आने जैसा था।” “हम नहीं चाहते थे कि वह भी पीड़ित हो।”

“अब, हमारी ज़िन्दगी … हमारे बच्चे … सभी खुश है,” मुथु बताती हैं “अब हम जब चाहते हैं हम काम कर सकते हैं। हम अपने घर में रहते हैं। हमें अपने हाथों को फैलाना नहीं पड़ता और हमें अब किसी और के लिए काम करने की ज़रूरत नहीं है। हम स्वतंत्र हैं!”

लेखक परिचय : जेरुशा वेंकटरामम अंतर्राष्ट्रीय न्याय मिशन, एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) के साथ काम करते हैं, जो बंधुआ श्रम और नाबालिगों के यौन उत्पीड़न के खिलाफ काम करता है।

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