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पाकिस्तान की तरफ बह कर जाने वाले अत्यधिक पानी को रोकने के लिए, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राबी नदी पर बाँध को मंजूरी दे दी

तर्कसंगत

December 10, 2018

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राबी नदी के ऊपर शाहपुरुकंदी बाँध परियोजना के कार्यान्वयन के लिए मंजूरी दे दी है, जो वर्तमान में पाकिस्तान में बहने वाले अतिरिक्त पानी की बर्बादी को रोकने के काम आएगा और बदले में वह पानी पंजाब और जम्मू-कश्मीर को दिया जायेगा|

द हिन्दू  के खबर के अनुसार एक अनुमान के मुताबिक़ यह बाँध 2022 तक बन जाएगी, जिसके बाद यहाँ से पानी पंजाब और जम्मू-कश्मीर के किसानों को दी जाएगी। समिति द्वारा एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि 2018-19 से 2022-23 तक पाँच साल तक के लिए केंद्र सिंचाई के लिए 5485.38 करोड़ की वित्तीय सहायता प्रदान करेगी।

बयान में कहा गया है, “इस परियोजना के कार्यान्वयन से रवि नदी का कुछ पानी जो माधोपुर के रास्ते पाकिस्तान जा कर बर्बाद हो जाता है उसे काम में लाया जा सकेगा।”

सिंचाई क्षमता
यह परियोजना पिछले 17 वर्षों से पाइपलाइन में रही है। उस समय, राजकोष की लागत 2,285 करोड़ रुपये की गणना की गई थी और परियोजना की निधि की कमी के कारण परियोजना रोक दी गई थी।

इस परियोजना को फिर से शुरू करने का निर्णय केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सिंधु संधि पर ध्यान रखते हुए लिया। 1960 में संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके अनुसार भारत को तीन नदियों, अर्थात् रवि, बियास और सतलज के पानी के उपयोग करने का पूर्ण अधिकार दिया गया था।

एक बार परियोजना पूरी होने के बाद, पंजाब में 5,000 हेक्टेयर और जम्मू-कश्मीर में 32,173 हेक्टेयर क्षेत्र पानी से सींचा जा सकेगा। बयान में कहा गया है कि पंजाब 206 मेगावाट की हाइड्रो-पावर भी उत्पन्न कर पाएगा।

“जनवरी 1979 में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के बीच एक द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। समझौते के अनुसार, पंजाब सरकार द्वारा रंजीत सागर बाँध (थीन बांध) और शाहपुरुकंदी बांध का निर्माण किया जाना था और बाँध अगस्त 2000 में शुरू किया गया था “बयान में कहा।

 

सिंधु जल संधि 1960

तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और फिर पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान, ने 1960 के सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किये थे, जिसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी, और तय हुआ था कि सिंधु और इसकी सहायक नदियों को दोनों देशों द्वारा कैसे इस्तेमाल किया जाएगा। संधि के अनुसार, रवि, बियास और सतलज को भारत द्वारा उपयोग किया जायेगा, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब को पाकिस्तान द्वारा रखा जायेगा। जबकि सिंधु  की ज्यादातर भाग भारत में है, हमारा देश हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर जनरेशन और सिंचाई उद्देश्यों के लिए सिंधु के पानी का 20% ही उपयोग कर सकता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में मौजूद किसी अन्य नदियों का उपयोग नहीं कर सकता है। भारत पानी का 20% उपयोग कर सकता है, लेकिन केवल गैर-उपभोग्य उद्देश्यों के लिए, अर्थात हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर जनरेशन और सिंचाई उद्देश्यों के लिए ही। भारत ने अभी तक इसका उपयोग नहीं किया है। छः नदी को मिलकर बानी सिंधु जल प्रणाली से पाकिस्तान को 80% पानी दिया गया है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यद्यपि सिंधु तिब्बत से बहती है, चीन को संधि के हिस्से के रूप में शामिल नहीं किया गया है। तिब्बती पठार की पिघलने के साथ, नदी का मार्ग भविष्य में बदल जाएगा। अगर चीन हस्तक्षेप करने का फैसला करता है, तो यह भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए पानी को रोक सकता है।

संधि की वैधता अदालतों में की गई है क्योंकि संधि पर देश के प्रधान मंत्री द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे, न कि राष्ट्रपति। भारत का राष्ट्रपति राज्य का आधिकारिक प्रमुख होता है।

 

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