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आईएमए से पास 46 अफगानी कैडेट तालिबान से लड़ने के लिए तैयार

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Image Credits: The Times Of India

December 11, 2018

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भारतीय सैन्य अकादमी से बाहर आये अफगान कैडेटों की संख्या इस साल काफी अधिक है। द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में 147 कैडेटों में से 46 कैडेट अफगानिस्तान से थे, जो अब तक पास हुए जूनियर कैडेट अधिकारियों की संख्या के मुकाबले सबसे ज़्यादा है।

भारतीय सैन्य अकादमी में इन अफगान कैडेट को प्रशिक्षण देने कि वजह यह है कि यह कैडेट अफगानिस्तान में जाकर तालिबान के खिलाफ लड़ने के लिए अफगान सेना में शामिल हो सकें। 2001 से अफगानिस्तान में तालिबान हमलों की एक झड़ी लगी हुई है, इस प्रक्रिया में कई नागरिक और अफगान सैनिकों की हत्या कर दी गई है। अपने देश में शांति और सद्भाव लाने के लिए, यह अफगान कैडेट रक्षा बलों में शामिल हो रहे हैं।

 

आईएमए में शामिल अफगान कैडेट

आईएमए में शामिल होने वाला एक ऐसा ही अफगान कैडेट जलालाबाद से 16 वर्षीय रोमाल वाहिजादा है। इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, उसके आईएमए में शामिल होने का मुख्य कारण जलालाबाद में एक विद्रोही तालिबान हमला था, जहाँ अन्य नागरिकों के साथ उसने अपने रिश्तेदारों को खो दिया था।

वाहिजादा बताते हैं कि “वह हमला उन्होनें अपना बलप्रदर्शन करने के लिए किया था” यह सब बताते हुए उसके अभी रोंगटे खड़े हो रहे थे ” मैंने कई दिनों तक किसी से बात नहीं की थी, अपनों का खून बहते देख कर मैंने निर्णय लिया कि मैं आर्म्ड फोर्सेज ज्वाइन करूँगा|”

वह चाहता है कि और भी जवान लोग आर्म्ड फाॅर्स ज्वाइन करें ताकि तालिबान को पूरी तरह से ख़त्म किया जा सके, मगर उसके घर वाले उसके आर्मी ज्वाइन करने के फैसले से खुश नहीं थे, क्यूँकि वह मुठभेड़ वाले इलाके में रहते थे|

महिलाओं और बच्चों की चीख ने अफगान लड़के को तालिबान सेनाओं के खिलाफ सेना और युद्ध में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया, जो अंततः अफगान राष्ट्रीय सेना को ज्वाइन करने के लिए तैयार है। राहेब रशीद एक अन्य 24 वर्षीय अफगान कैडेट है, जो अफगान नेशनल आर्मी में शामिल होने का इच्छुक है, और देश के लिए लड़ने की अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की इच्छा रखता है।

 

अफगान कैडेट तालिबान से लड़ना चाहते हैं

हिंदुस्तान टाइम्स  के अनुसार, राहेब रशीद बचपन से अपने पिता की युद्ध कहानियों को सुनकर बड़े हुए हैं और युद्ध के मैदान पर उसी जुनून को महसूस करना चाहते हैं। “मैं युद्ध की कहानियों से हमेशा प्रभावित था जिसे वह बचपन में हमेशा सुनाते थे। मुझे याद है, सोवियत संघ बलों के खिलाफ लड़ने की कहानियों का वर्णन करते हुए वह हमारे अफगानिस्तान के बारे में कैसे भावुक  हो जाते थे? वह चाहते थे कि मैं सेना में शामिल हो जाऊँ क्योंकि वह देश की संप्रभुता के महत्व को जानते थे।”

राहेब के पिता जरीफ रशीद ने 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण के दौरान सोवियत सेनाओं के खिलाफ मुजाहिदीन कमांडर के रूप में लड़ाई की थी। सेना में शामिल होने से, वह आतंकवादियों के खिलाफ अपने देश की रक्षा करना चाहते हैं, इस्लाम के नाम पर निर्दोष लोगों की हत्या करना वालों के खिलाफ आखिरी सांस तक उनके खिलाफ लड़ाई करना चाहते हैं।

रोमाल और राहेब की तरह, कई अन्य अफगान कैडेट हैं, जो आईएमए से बाहर आकर अफगानिस्तान में शांति और भाईचारे को स्थापित  करना चाहते हैं। तदनुसार, आईएमए से बाहर निकले अन्य विदेशी कैडेट भूटान (15), मालदीव (6) और कज़ाखस्तान (5) से हैं।

 

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