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संसद हमले के 17 साल: राष्ट्र ने संसद की रक्षा में शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि दी

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Image Credits: Times Of India,NDTV

December 14, 2018

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13 दिसंबर, 2001 की सुबह, राष्ट्रीय राजधानी में रोज़मर्रा के सुबह के तरह ही थी। कई मुद्दों के बीच, संसद का शीतकालीन सत्र कारगिल ताबूत घोटाले पर चर्चा कर रहा था। सुबह 11 बजे, संसद सत्र खत्म हो गया। जब मंत्री संसद के बाहर जाने के लिए तैयारी कर रहे थे, तभी, “पटाखों जैसी आवाज ने सुबह की शांति को भंग कर दिया ” और कुछ ही मिनटों में भारत की संसद युद्धभूमि बन गई। एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को संसद के प्रांगण में बम से उड़ा दिया।

अधिकारियों को यह महसूस करने में ज्यादा समय नहीं लगा कि कुछ अज्ञात आतंकवादी समूह संसद पर हमला कर चुके थे। रिपोर्ट के अनुसार, हमलावरों ने पहले संसद के मुख्य द्वार से प्रवेश करने की कोशिश की, और वे गेट नंबर पाँच की तरफ बढ़ने लगे, इस बीच, दोनों तरफ से गोलीबारी जारी रही। पूरा देश अपने टीवी के माध्यम से संसद पर हो रहे गोलीबारी बंदूक के शोर को सुन रहा था।

संसद के एक सदस्य खरबला साईं ने गार्जियन को बताया, “मैंने प्रवेश द्वार के पास एक पटाखे की तरह की आवाज़ सुनी, फिर मैंने संसद के बाहर लोगों को अफ़रा तफरी में देखा।”

द गार्जियन ने बताया रिपोर्टों के मुताबिक हमले में 14 लोगों की मौत हुई, मृतकों में से पाँच दिल्ली पुलिसकर्मी, एक महिला केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की सैनिक, दो वॉचमैन, एक वार्ड स्टाफ और एक माली थे। सभी पाँच आतंकवादी मारे गए थे। असफल हमले के तुरंत बाद, संसद परिसर के परिसर में छुपे आतंकियों की खोजबीन की गयी थी; फंसे मंत्रियों, सांसदों, मीडिया लोगों को संसद से सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया। तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जो उस समय परिसर में उपस्थित नहीं थे, ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई अपने अंतिम चरण तक पहुँच गई है।

 

देश ने श्रद्धांजलि अर्पित की

आज, 17 साल बाद, देश हमले में मारे गए लोगों की मौत पर शोक व्यक्त करता है। राजनीतिक दलों के कई प्रमुख नेताओं ने गुरुवार, 13 दिसंबर, 2018 को राष्ट्रीय राजधानी में 2001 के संसद हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रमुख नेताओं में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कई अन्य राजनीतिक नेताओं के साथ यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गाँधी शामिल थे।

श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया

 

 

 

संसद हमले के बाद 

द फर्स्टपोस्ट के अनुसार तब हमले की ज़िम्मेदारी किसी भी आतंकवादी संगठन ने नहीं ली थी। हालांकि, सरकार ने शुरुआत में हमले में आतंकवादी समूहों लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और जैश-ए-मोहम्मद (जोफ) की भूमिका पर संदेह किया था। मगर दोनों संगठनों ने हमले में उनकी भागीदारी से इंकार कर दिया।

घटना के अगले दो दिनों में, दिल्ली पुलिस ने जम्मू-कश्मीर के अफजल गुरू, हमले के कथित मास्टरमाइंड को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आतंकवादियों की साजिश में शामिल होने और आश्रय देने का आरोप लगाया गया था। बाद में, अफजल तीन अन्य लोगों के साथ- एसएआर गिलानी, शौकत हुसैन गुरु और अफसान गुरु- दोषी पाए गए। न्यूज़ चैनल और समाचार पत्रों में इस बात को लेकर काफी बहस चली, परन्तु एक राष्ट्रीय सर्वसम्मति थी कि आरोपी अफजल गुरु को फांसी दी जानी चाहिए। बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अफजल की मौत की सजा को बरकरार रखा, जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी उसकी दया याचिका खारिज कर दी।

3 फरवरी, 2013 को अफजल को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी, उनके परिवार को उनकी मृत्यु से पहले उनके पास जाने की इजाजत नहीं थी| इस बीच, कई वामपंथी नेताओं और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि अफजल का कोर्ट ट्रायल “अनुचित” तरीके से किया गया था।

2004 में, अफजल ने अपने वकील सुशील कुमार और सुप्रीम कोर्ट में एक वरिष्ठ वकील को एक पत्र लिखा था, “मुझे वास्तविक कहानी बताने के लिए अदालत में कभी मौका नहीं दिया गया …। अब मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट मेरी असहायता और वास्तविकता पर विचार करेगा जिस परिस्थति से मैं गुज़रा हूँ। एसटीएफ ने मुझे इस आपराधिक कृत्य में मुझे बलि का बकरा बनाया जो एसटीएफ और अन्य लोगों द्वारा डिजाइन और निर्देशित किया गया था जिन्हें मैं नहीं जानता।”

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार प्रसिद्ध लेखक-कार्यकर्ता अरुंधती राय उनकी पुस्तक में; द स्ट्रेंज केस ऑफ़ अटैक ऑन द इंडियन पार्लियामेंट” का जिक्र किया जिसमें दिल्ली पुलिस ने तुच्छ तरीक़े से अफजल के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

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