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बीएसएनएल ने 24 साल से इस 71 वर्ष की महिला को उनका वेतन, और अन्य लाभ नहीं दिया, मगर उनसे काम पूरा लिया

तर्कसंगत

December 17, 2018

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अपने अधिकारों से वंचित, कमजोर और असहाय, एक बुजुर्ग महिला सालों से भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रही है। उत्तर प्रदेश में कानपुर के निवासी 71 वर्षीय चिन्मयी मोइत्रा का दावा है कि उन्हें बीएसएनएल द्वारा उनका बाकया वेतन और पेंशन नहीं दिया गया है। चार बच्चों की विधवा माँ पिछले 24 सालों से अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं, सिर्फ इसी आशा से कि बीएसएनएल उनके जीतेजी उनके बकायों का भुगतान कर देगा।

 

छह साल के लिए कम वेतन

बहुत ही कम उम्र में, चिन्मयी मोइत्रा ने बीएसएनएल के लिए काम करना शुरू किया, 1971 में उसे दूरसंचार विभाग के नाम से जाना जाता था। 1977 तक अस्थायी टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में काम करने के बाद, उन्हें स्थायी नौकरी दी गई और उन्हें आशुलिपिक (स्टेनोग्राफर) के रूप में नियुक्त किया गया, जो की ग्रेड थ्री रैंक के अंतर्गत आता है। लगभग उसी समय उनकी शादी भी हुई। युवा, तेज़ दिमाग और मेहनती चिन्मयी कामकाजी महिलाओं की तरह अपने कामकाजी जीवन और उनकी निजी जिंदगी को सराहनीय रूप से संतुलित कर रही थीं। और जल्द ही कार्यालय में उनके अच्छे काम के कारण, उन्हें ग्रेड टू अधिकारी के रूप में उच्च पद पर काम करने के लिए कहा गया था। हालांकि, इसके बाद भी उन्हें वेतन ग्रेड थ्री रैंक के वेतनमान के हिसाब से ही दी जा रही थी।

छह साल बीत गए, और उन्होंने अपने उच्च अधिकारियों को कई पत्र और आवेदन लिखे, शिकायत की, कि उन्हें वर्षों से कम वेतन दिया जा रहा है। उन्होनें अधिकारियों से अनुरोध किया कि वह उनका वेतन बढ़ाए क्योंकि उनके पति का स्वास्थ्य अच्छा नहीं चल रह था और इलाज के और बच्चों के खर्च बढ़ रहे थे।

1993 में, बीएसएनएल प्राधिकरण ने उनकी याचिका का जवाब दिया, जिसने चिन्मयी को सकते में डाल दिया, जवाब में वेतन बढ़ने के जगह पर उन्हें वापस से ग्रेड थ्री रैंक पर डिमोट करने की बात लिखी थी। उन्हें यह भी बताया गया कि उन्हें उनके 11 साल जूनियर सहयोगी आर के श्रीवास्तव से प्रतिस्थापित किया जाएगा।

तर्कसंगत से बात करते हुए उनके छोटे बेटे मलय मोइत्रा ने कहा “छह साल के लिए बीएसएनएल ने उन्हें उच्च पद पर काम करने के लिए कहा, उनसे अधिक काम निकाला और उन्हें उस अनुपात में सही वेतन भी नहीं दिया। जब उन्होनें अन्याय का विरोध करने का फैसला किया, तो उन्हें उनके जूनियर द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया। यह किस तरह का न्याय है?”  छह साल तक काम वेतन मिलने के बाद, चिन्मयी ने तब खुद के लिए खड़े होने का फैसला किया, और अपने साथ हो रही नाइंसाफ़ी का विरोध किया। उन्होनें यह मामला उच्च अधिकारीयों तक भी पहुँचाया, मगर किसी ने कोई मदद नहीं की। जब वो बीएसएनएल के अधिकारियों से निराश हो गयीं, तो उन्होंने कानूनी लड़ाई का सहारा लिया।

न्याय की तलाश करते हुए, उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल इलाहाबाद (सीएटी, इलाहाबाद) में एक मामला दायर किया और नवंबर 1993 में, ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, मलय ने बताया। उन्होंने कहा कि यह लगभग उनकी माँ की पहली जीत थी, क्योंकि ट्रिब्यूनल ने कहा था, “… जूनियर को पदोन्नति देने से पहले, उनके मामले को पहले देखा जाना चाहिए था। इसलिए, इस प्रकार दूरसंचार विभाग को तीन महीने के भीतर पदोन्नति के लिए उनके प्रतिनिधित्व का निपटारा करने का निर्देश दिया गया। इस बीच, वह आदेश जिसमें उन्हें कम ग्रेड में स्थानांतरित किया जा रहा था, उस पर भी रोक लगाया जानी चाहिए|” मलय ने तर्कसंगत को बताया।

चिन्मयी ने सोचा कि उनकी पीड़ा खत्म हो गई है। उम्मीद थी कि उनका बकाया वेतन और उन्हें उनका सही ओहदा मिलेगा, ऐसा सोचकर वह ऑर्डर कॉपी के साथ अपने कार्यालय पहुँची। हालांकि, तब के बीएसएनएल  नियंत्रण अधिकारी श्री ए एन राय ने उनके लिए एक अलग योजना बना राखी थी। न सिर्फ उन्होंने उनका बकाया वेतन का भुगतान करने से इंकार कर दिया साथ ही उन्हें कार्यालय आने से भी मना कर दिया। उन्होंने उनसे कहा कि कार्यालय के अधिकारियों द्वारा आदेश भेजे जाने की प्रतीक्षा करें।

 

परेशानी बढ़ती गयी 

कुछ महीने बीत गए, लेकिन चिन्मयी को कार्यालय के तरफ से नौकरी पर वापस आने का कोई आदेश नहीं मिला। उनके आवेदनों का भी उत्तर नहीं दिया जा रहा था फरवरी 1994 में, ट्रिब्यूनल अदालत के आदेश के कुछ महीने बाद, बीएसएनएल ने ग्रेड वेतन के रूप में अचानक अपने वेतन को रोक दिया।

“उन्होंने कहा कि अब जब आपको अदालत का आदेश मिला है तो हम आपको वापस नहीं ले जाएंगे। अधिकारियों ने उन्हें बताया कि अदालत ने उनसे (स्थिति बीएसएनएल) को ‘स्थिति’ बनाए रखने के लिए कहा था, जो उनके अनुसार ग्रेड तीन पदों पर उन्हें स्थानांतरित करना था। वे (बीएसएनएल) ने कहा कि मामला अब अधिकारी है, इसलिए आपको काम शुरू करने के लिए व्यवस्थापक के आदेश की प्रतीक्षा करनी होगी।”

मलय के मुताबिक, वेतन रोक देने के दो महीने बाद से परेशानियाँ  बढ़नी शुरू हो गयीं थी, चिन्मयी ने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने में कई कठिनाइयों का सामना किया। चार से दस वर्ष के चार बच्चों के लिए स्कूल फ़ीस जमा करना और उसके बाद अपने पति के मेडिकल बिलों के लिए जमा करना उनके लिए असहनीय हो रहा था।

“मैं बहुत छोटा था जब मेरी माँ को इन सभी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। मुझे याद है कि उस समय उनका पूरा दिन दूरसंचार के विभिन्न कार्यालयों के चक्कर काटते निकल जाता था, उन्होनें फिर बीएसएनएल ने वरिष्ठ अधिकारियों से अनुरोध किया कि वह उन्हें नौकरी पर आने दें और उन्हें उनका वेतन प्रदान करें। मलय ने कहा, और शाम को वह अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलकर उनसे परिवार चलाने के लिए कुछ पैसे उधार मांगती थीं।

उनके काम पर वापिस आने की अपीलों को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया, चार बच्चों की माँ,  चिन्मयी ने कुछ छोटे मोटे काम करने शुरू कर दिए जैसे सिलाई और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना। उनके बेटे ने बताया

 

बीएसएनएल ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया

 
बढ़ते हुए क़र्ज़ के बाद भी, चिन्मयी ने अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखी। परिवार ने फिर से अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। उनके चार बच्चों (दो बेटियों और दो बेटों) में से तीन को स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि उनकी माँ अब बढ़ते खर्च का बोझ नहीं उठा पा रहीं थीं|  स्थिर आय की कमी के साथ, बहुत ही कम उम्र में सभी तीन बच्चों ने छोटी मोटी नौकरियाँ कर के परिवार को सहारा देना चालू किया, केवल सबसे छोटा बेटा मलय, स्कूल जाने में सक्षम था।

मलय का दावा है कि 1999 में, उनकी माँ को बकाया भुगतान के बिना बीएसएनएल को अनिवार्य सेवानिवृत्ति फॉर्म दिया गया था। 24 साल से अधिक हो चुके हैं, और परिवार अभी भी चिन्मयी के लंबित वेतन और पेंशन के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। हाल ही में, उच्च न्यायालय में बीएसएनएल की समीक्षा याचिका को भी अदालत ने खारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि चिन्मयी को अपनी देनदारी मिलनी चाहिए, मलय ने बताया। उन्होंने हमें यह भी बताया कि बीएसएनएल ने उनकी माँ को निर्वाह भत्ता और यात्रा भत्ता भी नहीं दिया है, जो किसी भी अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बाद मिलता है।

कुछ साल पहले चिन्मयी ने अपने पति को खो दिया, वह 71 वर्षीय बूढ़ी महिला हैं। उनकी बड़ी बेटियां विवाहित हैं, और उनमें से एक ने अब स्नातक स्तर की पढ़ाई शुरू कर दी है। सबसे बड़े बेटे ने भी अपना अध्ययन फिर से शुरू कर दिया है, और सबसे छोटा बेटा मर्चेंट नेवी के रूप में काम कर रहा है। इतने वर्षों के बाद भी चिन्मयी, यह आशा करती हैं कि उन्हें न्याय मिलेगा। बेटे ने कहा, “मेरी माँ ने बहुत संघर्ष किया है, उन्होनें अपने सहकर्मियों द्वारा अपमान का सामना करना पड़ा है, उनके दर्द और पीड़ा को कम नहीं किया जा सकता है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि उनके मरने से पहले उन्हें न्याय मल जाये।”

तर्कसंगत  ने बीएसएनएल के अधिकारियों तक उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए पहुँचने की कोशिश की, हालांकि, लेख प्रकाशित करने के समय तक उनके द्वारा कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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