मेरी कहानी

मेरी कहानी: ट्रेन हादसे में हाथ गंवाने का बाद भी मैंने आर्किटेक्ट बनकर दिखाया

तर्कसंगत

December 18, 2018

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2010 में, कोलकाता में एक शादी के बाद, मैं एक ट्रेन से वापस बॉम्बे आ रही थी, जहाँ मैं वास्तुकला (आर्किटेक्चर) की पढ़ाई कर रही थी। मैं जल्दी से ऊपरी बर्थ में चढ़ी और थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें बंद कर ली। लेकिन अचानक मैं अपने बर्थ से नीचे गिर गयी। हमारी बोगी पूरी तरह से ट्रैक से उतर चुकी थी!

जब मैंने अपनी आँखें खोलीं तो मैं मलबे में पड़ी हुई थी| दुर्घटना में मेरा दाहिना हाथ कट चुका था| मुझे बताया गया कि यह नक्सलियों के कारण हुआ था- एक और ट्रेन ने हमारी बोगी को मारा था, यह सब जब हुआ मैं बेहोश थी, मुझे दर्द महसूस नहीं हो सका … मैं बस सुस्त थी। मुझे क्या हुआ था यह नहीं समझ सकी, मुझे कुछ नहीं पता था की क्या हुआ था, एक झटके में मेरी ज़िन्दगी बदल गयी|

मेरा 15 वर्षीय भाई मदद के लिए चारों ओर दौड़ रहा था। नक्सलियों के खिलाफ ख़ुद के भय के कारण स्थानीय लोग भी हमारी मदद नहीं कर रहे थे। लेकिन जल्द ही, मेरे भाई को एक सेना अधिकारी मिला जो बुनियादी फर्स्ट ऐड जानता था। मैं मलबे के नीचे घंटों पड़ी रही और मुझे लगभग, मृत घोषित कर दिया गया रहता, लेकिन किसी शक्ति ने मुझे वापस ले आया। जब मेरी माँ ने मुझे देखा वह सदमे में चली गयी।

मुझे ठीक करने के लिए सर्जरी के बाद सर्जरी की जा रही थी|  मुझे तक़रीबन ठीक होने में एक महीने लगे, उसके बाद मैं अपनी कॉलेज गयी, लेकिन आर्किटेक्चर की विद्यार्थी बिना हाथों के क्या कर सकती थी? मुझे लोगों ने कुछ और करने के लिए कहा|  यह मेरा सपना था, अगर मैं उस भयावह दुर्घटना से बच कर निकली थी तो इसके पीछे भी कुछ कारण रहा होगा, मुझे कुछ बेहतर करना था|

मैं हार नहीं मानने वाली थी, मैंने बाएं हाथ से लिखना सीखा, अपने पैरों से मैंने ड्रा करना सीखा और उसी तरह से मैंने अपनी थेसिस पूरी की, यह मुश्किल था मगर मैंने दिखा दिया कि मैं कितने लगन से यह करना चाहती थी, हर किसी ने मेरा काफी साथ दिया|  मेरे दोस्तों ने कृत्रिम हाथ खरीदने के लिए पैसे भी इकट्ठा किये, मेरी ज़िन्दगी उलटी दिशा में घूम चुकी थी मगर मैं रुकी नहीं|

सबसे अजीब चीज मेरे साथ तब हुई जब इस घटना के बारे में एक फिल्म बनाई गई, जिसका शीर्षक मराठी में ‘ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस’ था। मुझे इस बात का कोई कोई सुराग नहीं था तब तक, जब तक कि मुझे सीधे प्रीमियर में आमंत्रित नहीं किया गया था! जाहिर है, मीडिया का ध्यान मुझ पर केंद्रित हुआ। जब मैं प्रीमियर देखने गयी, तो मेरी कहानी एक बड़ी स्क्रीन पर दिखाई जा रही थी। कुछ दृश्य इतने बेतुके थे कि मुझे हंसी आ रही थी!

जिस दिन यह घटना घटी उस दिन पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं था, उस दिन से मेरी ज़िन्दगी बदल गयी, उस स्थिति को स्वीकार करने के अलावे मेरे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था| मगर यह मुझ पर था कि मैं इस घटने को अपने ऊपर हावी होने देती हूँ या नहीं ? आज मैं कई उभरते आर्किटेक्ट्स को पढ़ाती हूँ, कई वर्कशॉप में हिस्सा लेती हूँ, और वह सब करती हूँ जो लोग यह सोचते हैं कि मैं करने की हिम्मत भी नहीं कर सकती| मुझे अपने में कोई कमी नहीं दिखती जो दूसरों को दिखती है| मैं खुद पर नर्भर हूँ मेरा भाग्य मेरे बाएं हाथ में बिलकुल सुरक्षित है|

 

“In 2010, after a wedding in Kolkata, I boarded a train back to Bombay, where I was studying architecture. I got in and…

Posted by Humans of Bombay on Sunday, 16 December 2018

 

 

 

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