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लातूर भूकंप के 25 साल बाद, उस ‘मिरेकल बेबी’ से किस्मत ने वापिस मिलवाया

तर्कसंगत

December 19, 2018

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30 सितंबर 1993 को, सुबह के लगभग 4 बजे, रिक्टर स्केल पर 6 प्लस परिमाण के भूकंप ने लातूर और उस्मानाबाद जिलों के गांवों को ज़मींदोज़ कर दिया था। इसमें हजारों लोगों की जान गई और हजारों घायल हुए और बेघर हो गए। उस समय, तत्कालीन लेफ्टिनेंट सुमित बक्शी को भारतीय सेना में केवल आठ या नौ महीने पहले ही कमीशन किया गया था। वह बिहार रेजिमेंट 8 वें बटालियन में सेकंड लेफ्टिनेंट थे, उन्होनें भी राहत और बचाव अभियान में हिस्सा लिया था। बचाव और राहत कार्यों में सहायता प्रदान करने के लिए सेना के जवानों को किलारी गाँव, लातूर भेजा गया था। उनके सैनिकों को वहाँ पहुँचने में लगभग दो दिनों का समय लग गया।

वह एक दिल दहलाने वाला मंज़र था, कोई भी ईमारत खड़ी नहीं दिख रही थी, जो ज़िंदा थे वह निराश थे, रो रहे थे अपने परिजनों को तलाश रहे थे, कोई अपने सामान बटोरने में लगा था तो कोई मदद के लिए लोगों को पुकार रहा था|  कुछ लोग अपने परिवारवालों के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे, कुछ मवेशियों को दफनाने की जगह तलाश रहे थे, कुछ इस असमंजस में थे की मलबे के नीचे उनके परिवार के लोग ज़िंदा हैं भी या नहीं? गिद्ध , मक्खियां हर तरफ फैली हुई थीं, मृत इंसानों और मवेशियों की दुर्गन्ध हवा में घुल गयी थी|

लेफ्टिनेंट बक्शी की बटालियन अलग अलग बचाव टीमों में बँट गई और लगभग तीन दिनों तक राहत कार्य करते रही, जिसमें लगभग जानवरों और मनुष्यों के शरीर को मलबे से निकलना, फिर स्थानीय लोगों से उनके धर्म की जानकारी प्राप्त कर दफनाना या जलाना और यह सब कुछ दस्ताने और मास्क के बिना करने पर विवश थे, जब तक जिला अधिकारियों ने उसकी व्यवस्था नहीं की। बचाव दाल संक्रमण से सबसे अधिक प्रभावित हो सकता थी , लेकिन काम बंद नहीं किया जा सकता था। अधिकांश सैनिकों को मैगोट्स द्वारा काटा गया था, और लाशों की बदबू उनके नाखूनों तक से आ रही थी। उस गंध के कारण, वे दिनों तक खाना नहीं कहा पा रहे थे।

6 अक्टूबर, 1993 को, जब बचाव दाल दोपहर का खाना खाने बैठी, तो गाँव से एक पति पत्नी  हाथ जोड़े और आँखों में आँसू लिए उनके पास आये। “सर, कृपया हमारी बेटी के शरीर को खोजने में हमारी मदद कीजिये। हम सिर्फ उसका अंतिम संस्कारों करना चाहते हैं, “पति ने कहा, पत्नी अनियंत्रित रूप से रोये जा रही थी। पाँच टीमों ने पहले भी उस जगह का दौरा किया था लेकिन कुछ नहीं मिला। जोड़े का घर एक टीले के आधार पर था और वह सात घरों और एक मंदिर के मलबे के नीचे दबा हुआ था जो उनके घर पर आ गिरा था। पति पत्नी समय रहते बाहर निकलने में कामयाब रहे थे, मगर उनकी 18 महीने की बेटी ‘पिनी’ का कोई पता नहीं था। हालांकि लेफ्टिनेंट बक्शी के सहयोगियों ने जोर दिया कि वे अपना दोपहर का भोजन पूरा करें, लेकिन उन्होंने खाने के बजाये अपनी दिल की आवाज़ सुनी और आगे बढ़ने का फैसला किया। माता-पिता की आंखों में जो दृढ़ विश्वास उन्होनें देखा वह आज भी वर्णन नहीं कर सकते हैं। श्री जवाल्गे, जो कि उस बच्ची के पिता थे, उन्होनें अपने नष्ट घर और एक अंदाज़ से बिस्तर के बारे में बताया जहाँ वह सो रहे थे।    

 

“बच्ची जिंदा है!”

सेना का पहला कदम उस लोहे के पलंग को ढूंढना था जिस पर बच्ची सो रही थी। मलबे के नीचे, लोहे के पलंग की एक छोटी सी रेल दिख रही थी। उन्होंने मलबे को एक तरफ हटाया और एक छोटी सी छेद खोदने की कोशिश की। वे भारी बोल्डर और उसके चारों ओर मलबे से ज्यादा नहीं बढ़ सके। भूकंप के प्रभाव के कारण पलंग के चार पैरों में से एक टूट गया था, लेकिन शुक्र था कि एक पीतल का बर्तन, उस जगह पर फँस गया था जिसने पलंग को पूरी तरह गिरने से रोक रखा था। कम शब्दों में कहा जाये तो यह खतरनाक था, क्योंकि जैसे ही उसके अंदर छेद बनाने की कोशिश की तो मलबों ने ऊपर गिरना शुरू कर दिया था|

 

अंत में, सैनिकों ने एक छोटा सा एक छेद बनाया जिसके माध्यम से केवल एक सिर अंदर घुस सकता था। उन्होंने अंदर स्लाइड करने की कोशिश की, लेकिन पर्याप्त जगह नहीं थी। दुबले पतले शरीर के साथ लेफ्टिनेंट बक्शी उस समय लगभग 20 साल के थे, इसलिए उन्होंने खुद प्रयास किया। वह तब तक कोशिश करते रहे जब तक कि वह पूरे शरीर को अंदर नहीं कर सके। उसके बाद वह अंधेरे में पहुँच गए और चारों ओर चीजों का अनुभव करने की कोशिश कर रहे थे, तभी उनके हाथ ने ठंडे शरीर को छुआ। जब उन्होनें इसे खींचने की कोशिश की, तो एक कमजोर सी खांसी की आवाज़ आई। प्रारंभ में, वह डरे हुए थे क्योंकि माता-पिता और सभी लोग 108 घंटे के बाद बच्चे के बचने की उम्मीद नहीं कर रहे थे! उसने मौत को हराया था और वह अभी भी धीरे-धीरे सांस ले रही थी। लेफ्टिनेंट कर्नल बक्शी ने उसे अपनी छाती से लगा लिया और चिल्लाकर कहा   “बच्ची जिंदा है! बच्ची जिंदा है! कंपनी कमांडर साहिब से और सैनिक भेजने के लिए बोलो”।

 

भाग्य के साथ एक अविश्वसनीय प्रयास

यह खबर कि बच्ची ज़िंदा बच गयी, जंगल के आग की तरह फैल गयी थी। कंपनी कमांडर के स्पॉट तक पहुँचने से पहले, 700 ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठी हो गयी थी, जो मलबे के ऊपर खड़े थे और वहाँ लेफ्टिनेंट बक्शी और बच्चे दोनों फँस गए थे। जैसा कि उम्मीद थी, वहाँ एक भूस्खलन हो गया, और दुर्भाग्यवश, वे दो जवानों के साथ फिर से दफन हो गए। बटालियन और स्थानीय पुलिस भीड़ को नियंत्रित करने और बचावकर्ता को बचाने के लिए जगह पर पहुँची। एक घंटे चली बचाव कार्य में दो जवानो सहित बच्ची को बहार निकलने में कामयाब रहे। जब उन्होंने लेफ्टिनेंट बक्शी को खींचने की कोशिश की, तो उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें पिनी और उनके लिए पर्याप्त जगह बनाने के लिए आगे खोदना होगा। “एक चमत्कार ने उसे पाँच दिनों तक जीवित रखने में मदद की थी; मैं उसे अब मरने नहीं दे सकता था। और बचाव दाल ने हमें सुरक्षित रूप से बाहर खींच लिया, “लेफ्टिनेंट बक्शी ने  कहा| 

बाहर खींचने के बाद उन्होनें सबसे पहले बच्चे को रोते हुए माता-पिता को सौंपा। माता पिता ने न सिर्फ उन्हें धन्यवाद दिया और उनके पैरों को छू लिया। भावनाओं ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। “उन्हें रोते हुए देख हम सभी ने एक ही समय में खुशी और दु:ख की भावना साझा की। हम में से कोई भी कुछ क्षणों के लिए कुछ भी नहीं कह सकता था, समय ठहर सा गया था। ग्रामीणों को बहुत खुशी हुई और हमारी बटालियन के लिए नारे लगाना शुरू कर दिया। उनमें से कुछ ने मुझे पूरे गाँव में घुमाया और मेरे प्रयास की सराहना की। पूरा वातावरण दुख से खुशी में बदल गया था, यह वास्तव में भाग्य के साथ एक अविश्वसनीय प्रयास था, “वह कहते हैं।

 

जिस क्षण वो बाहर आए, तब बहुत सारे विदेशी-जोड़े थे जो की पिनी को अपनाना चाहते थे। यहाँ तक कि लेफ्टिनेंट बक्शी भी उसे गोद लेना चाहते थे। उसे ‘मिरेकल बेबी’ का नाम दिया गया था और वहीँ उसका नाम ‘प्रिया’ रखा गया था।

 

“30 मिनट के लिए हम तीनों बात नहीं कर सके, हम बस रोए”

समय के साथ लेफ्टिनेंट बक्शी कई स्थानों पर तबादला हुआ, प्रिया का परिवार केवल चार साल तक उनके संपर्क में था, जिसमें उन्होंने नियमित रूप से उन्हें पत्र और तस्वीरें भेजीं थी। 25 साल बाद, जहाँ भी वह गए, अपने सामान के साथ यादें भी संजोये हुए थे। वह जानते थे कि उसका परिवार पुनर्वास करने में व्यस्त था और इस तरफ उनका जीवन भी आगे बढ़ गया। उन्होनें विवाह किया और परिवार बनाया, और वे अपने पोस्टिंग के कारण हर दो साल में एक जगह से दूसरे जगह जा रहे थे। वह सोचते थे कि ‘पिनी’ कहाँ होगी और वह कैसी होगी।

 

भाग्य ने उन्हें 2016 में पुणे ले आया, अब वह लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत थे, उनकी पत्नी नीरा ने उनसे पूछा, “आपने जिस छोटी लड़की को बचाया था उसे ढूंढने की कोशिश क्यों नहीं करते?” उन्हें भी इस बात का ख्याल आया लेकिन काम की व्यस्तता में वह समय नहीं निकाल पाए। “मेरे सहयोगी के साथ एक बातचीत के दौरान किस्मत ने हमें मिलाने का फैसला कर लिया था  – एक क्लर्क, हवलदार दयानंद जाधव मेरे कार्यालय में था, उसने मुझे बताया कि वह लातूर में एक घर बना रहा था, इसलिए मैंने उससे पूछा कि किस जगह पर बना रहा है? जब उसने मंगरुल नाम लिया, मेरी आँखें चमक उठी और उससे पूछा कि क्या वह उस लड़की के बारे में जानता है जिसका नाम, प्रिया या पिनी जवलगे है जो भूकंप के बाद जीवित बची थी? उसने कहा, ‘सर, हर कोई उसे जानता है! आप उसे कैसे जानते हो, सर? “उसने कहा। जब लेफ्टिनेंट कर्नल बक्शी ने उन्हें बताया कि उन्होनें ही उसे बचाया था तो वह स्तब्ध रह गया। फिर उसने उन्हें बताया “सर, अगर आपने मुझसे कुछ महीने पहले पूछा होता, तो आप उसकी शादी में शिरकत कर सकते थे!”  उन्होंने उनसे प्रिया के बारे में पता करने के लिए कहा। हवलदार जाधव तुरंत फोन पर उसके संपर्क में आए और उससे कहा, “प्रिया, जिस आदमी को तुम खोज रही हो, दशकों से मेरे साहब हैं, और वह आपसे बात करना चाहते हैं।”

फोन पर, लेफ्टिनेंट कर्नल बक्शी और प्रिया थोड़ी देर के लिए बात नहीं कर सके वह पल उनके लिए भावनात्मक था। “मैं उस लड़की से बात कर रहा था जिसे 25 साल पहले अपने गोद में लेकर उसे बचाया था। मैं बस कुछ भी नहीं कह सका लेकिन मैं याद करता हूँ कि मैंने उसे बताया कि मैं आऊंगा और जल्द ही उससे मिलूंगा। उसने कहा कि वह मेरे लिए इंतजार कर रही है, “वह बताते हैं।

 

जब वे अंततः मिले, तो वे लगभग आधे घंटे तक बात नहीं कर सके। “प्रिया की माँ, प्रिया और मैं रोते रहे। यह मेरी पत्नी थी जिसने वह सिलसिला रोक कर हमें एक दूसरे के परिवार के बारे में बात करने को कहा। प्रिया ने हमें बताया कि उसके पिता कुछ महीने पहले गुज़र गए। लेकिन उसने हमें बताया कि वह अपने चाचा के स्कूल में एक टीचर बन गई थी। उसने 25 साल से मेरी तस्वीर रखी थी, अपने घर के मंदिर में राखी थी। उन्होंने कहा कि मलबे के नीचे की एक 18 महीने के बच्चे से आज एक बड़ी टीचर के रूप में मेरे सामने खड़ी, वह अभी भी मेरे लिए एक जीवित चमत्कार है।

 

 

“25 साल पहले आपदा ने दोनों को एक बंधन में जोड़ा जो कि आखिरी तक सांस रहेगा। “उसने मुझे अपना पिता कह कर बुलाया और वह वास्तव में हमेशा मेरी पहली बच्ची रहेगी।”

प्रिया अपने गाँव के लिए काम करना चाहती है, भगवान ने जो कुछ भी दिया है उसे वह उस गाँव को वापस देना चाहती है और लेफ्टिनेंट कर्नल बक्शी को उस महिला पर बहुत गर्व है। वह विवाहित है और काफी खुश है  उसका पति लगभग 400 किमी दूर काम करता है क्योंकि वह उसी गांव में रहकर अच्छे काम को जारी रखना चाहती है। लेफ्टिनेंट कर्नल बक्शी कहते हैं, “मुझे अक्सर लगता है कि वह अपने लोगों के प्रति सेवा में अपने घरेलू जीवन का त्याग कर रही है, वास्तव में यह वास्तव में प्रेरणादायक है – ‘वास्तव में एक अच्छा काम।’ भगवान भगवान उसे और उसके अच्छे काम को हमेशा आशीर्वाद दे।”

 

 

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