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पुणे: यह एनजीओ पुराने कपड़े को रीसायकल कर जनजातीय महिलाओं को मुफ्त कपड़े के पैड प्रदान करता है

तर्कसंगत

December 20, 2018

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भारतीय महिलाओं के लिए मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता, हमारे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में फिल्मों के द्वारा, टीवी चैनल पर प्रचार के द्वार्रा, और कई माध्यम से चर्चा का विषय बनी हुई है। शहरी परिवेश में तो महिलाओं को स्वच्छता के विषय में कोई दिक्कत नहीं आती, परन्तु ग्रामीण परिवेश में यह अभी भी परेशानी का सबब बनी हुई है।

 

महिलाओं की समस्या को समझना

सौभाग्य से पुणे, महाराष्ट्र से 26 वर्षीय लॉ के छात्र, सचिन आशा सुभाष, ने ग्रामीण महिलाओं द्वारा झेले जा रहे मासिक धर्म से सम्बंधित इस दिक्कत को समझा। पुराने कपड़े रीसायकल करके, “समाजबंध” नाम की गैर-लाभकारी संगठन का उद्देश्य ग्रामीण आदिवासी महिलाओं को लागत मुक्त स्वच्छ नैपकिन प्रदान करना है, जो महंगे सैनिटरी नैपकिन का उपयोग नहीं कर सकतीं हैं।

 

 

सचिन ने अपनी अनूठी पहल के बारे में तर्कसंगत से बात की।  उन्होनें बताया कि 2016 में, भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में काम करने का विचार उनको सामाजिक सेवा में सक्रिय रूप से भाग लेने के बाद आया, जब वह वंचित लोगों के बीच पुराने कपड़े बाँटा करते थे। अपने मासिक धर्म के दौरान उचित देखभाल न करने के कारण से उनकी माँ के गर्भाशय को सर्जरी द्वारा हटाना पड़ा, इसके बाद से उनके अंदर पैड बनाने का ईरादा और मजबूत हो गया।

उन्होंने कहा, “दो साल पहले, हम में से कुछ ने ग्रामीण महिलाओं द्वारा सामना किये जाने वाली समस्याओं को समझने के लिए एक छोटा सा शोध किया।” उनके शोध के दौरान, सचिन को एहसास हुआ कि भले ही सैनिटरी नैपकिन सस्ती कीमतों पर बेचे जाते हैं, फिर भी महिलाएं संकोच करेंगी और मासिक धर्म से जुड़ी घृणा के कारण इसे नहीं खरीदेंगी।

 

एक पर्यावरण अनुकूल विकल्प

सचिन समस्या के लिए एक आसान लेकिन पर्यावरण अनुकूल समाधान ढूँढना चाहते थे। कॉलेज के अपने दूसरे वर्ष में ही, उन्होंने अध्ययन करने के लिए आमतौर पर पाए जाने वाले सैनिटरी नैपकिन और पैड में इस्तेमाल कपड़े का नमूना मंगवाया और फिर सर्वोत्तम संभव विकल्प तैयार किया। उन्होंने कहा, “पुन: इस्तेमाल में लाने वाले कपड़ों के पैड को तैयार करने में लगभग सात महीने लग गए।”

तब से, सचिन ने वापस मुड़ कर नहीं देखा। साल 2017 तक एक छात्र सामाजिक उद्यमी के रूप में बदल गया था। “हम शहर से प्रयुक्त कपड़े इकट्ठा करते हैं और फिर इन कपड़ों का उपयोग कपड़े के पैड की सिलाई करने के लिए करते हैं जिन्हें पुणे के पास आदिवासी महिलाओं को मुफ्त में वितरित किया जाता है।” सचिन ने बताया| उनके संगठन, जिसमें महिला स्वास्थ्य डॉक्टरों सहित स्वयंसेवकों का विस्तृत नेटवर्क है, पुणे में प्रसंस्करण इकाई में तीन महिलाओं को रोजगार देता है। प्रत्येक कपड़े के पैड को बनाने में लगभग आधा मीटर कपड़ा लगता है और हर छह महीने में उसे हटा देना होता है।

 

 

“कपड़े पैड रिसाव के खिलाफ अच्छी सुरक्षा प्रदान करने के लिए तकरीबन 20-परत मजबूत होते हैं और खुले होने पर रूमाल की तरह दिखते हैं ताकि महिलाओं को उन्हें सूखाते वक़्त शर्मिंदगी महसूस न हो।”  संगठन सिलाई मशीनों का उपयोग करके एक महीने में लगभग 4000 कपड़े के पैड बनाती है, और पिछले दो वर्षों में, सचिन और उनके संगठन ने 2000 से अधिक जनजातीय महिलाओं तक पहुंचने में सक्षम रहे हैं।

इतना ही नहीं, सचिन, ग्रामीण महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता के महत्व, हानिकारक डिस्पोजेबल पैड के बजाय कपड़े के पैड को अपनाने और प्रयुक्त नैपकिन के निपटारे के बारे में भी शिक्षित करते हैं। जबकि पैड मुफ्त हैं, सचिन अपने कर्मचारियों के लिए स्क्रैप कपड़ों से बने कपड़े के बैग बेचकर वेतन देते हैं।

आगे चल कर , सचिन गांवों में महिलाओं की स्वयंसेवी समूह बनाने की इच्छा रखते हैं। उन्होंने कहा, “ये महिलाएं पैड बनाएंगी, और उन्हें बेचकर आजीविका भी कमाएंगी और यहां तक कि अधिक से अधिक ग्रामीण महिलाओं तक इस इको-फ्रेंडली कपड़े के पैड को पहुँचाएंगी।”

तर्कसंगत पर्यावरण अनुकूल विकल्प प्रदान करने और स्वच्छता पर ग्रामीण महिलाओं को शिक्षित करने के लिए सचिन के प्रयासों की सराहना करता है।

 

 

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