मेरी कहानी

मेरी कहानी: हमारी शादी ओड़िया हस्तकरघा और परंपरा की एक मिसाल थी

तर्कसंगत

December 24, 2018

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भारत जैसे देश में, जहाँ एक बड़ी खर्चदार शादी सिर्फ दो परिवारों के एक साथ होने का उत्सव नहीं है, बल्कि एक स्टेटस सिंबल भी है, कुछ जोड़े सही मायने में शादी की इस शैली से हटकर अपनी पहचान बना रहे हैं.

जहाँ दिल्ली के एक दंपत्ति ने # SevaSeShaadi  की शुरुआत करके एक खर्चे वाली शादी करने की मजबूरी की सीमाओं को तोड़ दिया, वहीं ओडिशा के भुवनेश्वर के इस जोड़े ने भारतीय हथकरघा बुनकरों की दुर्दशा को उजागर करने के लिए अपने शादी का उपयोग किया.

हम दोनों भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के अधिकारी हैं, वर्तमान में नई दिल्ली में तैनात हैं, हमने पिछले साल शादी की. हमने अपनी शादी के विषय के रूप में इसे चुनकर भारतीय हथकरघा और बुनकरों पर जोर देना ज़्यादा उचित समझा. हम दोनों भुवनेश्वर से हैं, और हम दोनों दुनिया को यह बताना चाहते थे कि एक पारम्परिक ओड़िया शादी क्या होती है.

उस समय, हमने अपने सोशल मीडिया अभियान #OurOdiaWedding से शुरुआत की और अपने मेहमानों को एक विशिष्ट ओडिया विवाह के बारे में शिक्षित करने लगे. हमने ओडिशा के हथकरघों को एक भारतीय शादी के रूप में चुना क्यूँकि भारतीय शादी में पहनावे पर काफी ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है. इसलिए, यदि हमने हथकरघा को उजागर करने के लिए चुना है, तो इससे बहुत सारे लोगों को भारतीय हथकरघों के बारे में पता चलेगा, वह इसके बारे में बातें करेंगे और इसकी खरीदारी भी बढ़ेगी.

इसलिए, ओडिशा बुनाई और हथकरघा हमारे शादी का मुख्या आकर्षण थे. लेकिन बाद में हमने इसमें भारत के सभी कोनों से भारतीय हथकरघा को भी शामिल किया , क्यूँकि हमारे अतिथि भी पूरे भारत से आ रह थे.

एक ऐसे समय में, जब निकटतम ‘मान्यवर’ स्टोर या बुटीक पर जाना एक आम बात है, हमने स्थानीय कारीगरों से अपने कपड़े, साड़ी और अन्य सामान एकत्र किये. हमने स्थानीय डिजाइनरों के साथ काम किया और एक कस्टम मेड और सिग्नेचर वेडिंग वेयर अनुभव बनाया. अपने मेहमानों के लिए एक समग्र अनुभव रखने के लिए, हमने अपनी शादी के माध्यम से स्थानीय शादी की परंपराओं, चित्रों, और साथ ही व्यंजनों को उजागर करने का काम किया.

हम इसे दुनिया के साथ साझा करना चाहते हैं, क्योंकि जितना अधिक हम अपने काम को शब्द द्वारा फैलाते हैं, उतना ही हम उस चीज को उजागर करते हैं और अपने मकसद को पाना सुनिश्चित करते हैं, यानी हमारे भारतीय बुनकरों और हथकरघा को प्रोत्साहित करने की जरूरत हैं. हमारे वस्त्र हमारी राष्ट्रीय विरासत और परंपरा के मूल हैं.

 

 

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