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देहरादून का यह पुलिस स्टेशन स्लम के बच्चों के लिए मुफ्त में स्कूल चलाता है

तर्कसंगत

Image Credits: Times Of India

December 25, 2018

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हम में से अधिकतर लोग, जिस क्षण ’पुलिस स्टेशन’ शब्द सुनते हैं, तो या तो डर जाते हैं या घबरा जाते हैं. हालांकि, देहरादून में ‘नंदा की चौकी झुग्गी’ से 50 से अधिक बच्चों के लिए, पुलिस स्टेशन शब्द उनके चेहरे पर मुस्कान ले आता है. यह वह जगह है – जहाँ वे 2 + 2 और A से Apple  सीखते हैं, और वह भी अपने पुलिस अंकल और आंटी की सुरक्षा के साथ.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के रिपोर्ट के अनुसार प्रेम नगर पुलिस स्टेशन के परिसर में संचालित नि: शुल्क स्कूल, देहरादून में ही स्थित एनजीओ, स्ट्रीट स्मार्ट प्रोजेक्ट ऑफ़ आसरा ट्रस्ट  के तहत चलाया जाता है, जो अल्पपोषित बच्चों के लिए काम करता है. स्कूल में 4 से 12 वर्ष के बीच के सभी बच्चों को मिलाके 51 बच्चे हैं , जिन्हें हर दिन छह घंटे हिंदी, अंग्रेजी, अंकगणित, इतिहास और भूगोल का पाठ पढ़ाया जाता है.

 

पुलिस सुरक्षा ने अधिक बच्चों को आकर्षित करने में मदद की

“जब इस साल मार्च में स्कूल शुरू हुआ, तो आसरा के स्वयंसेवक व्यस्त सड़क के किनारे, फुटपाथ पर बच्चों को पढ़ाते थे. तब लगभग 10 बच्चे थे. छात्रों की सुरक्षा के बारे में सोचकर, हमने स्कूल को अपने परिसर में स्थानांतरित करने का फैसला किया.” प्रेम नगर पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर मुकेश त्यागी ने तर्कसंगत को बताया.

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस सुरक्षा के आश्वासन से कई अभिभावकों का ध्यान आकर्षित करने में मदद मिली और उन्होनें अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू किया. कुछ महीनों के भीतर, छात्र की संख्या 10 से 50 तक बढ़ गई. “हमने देखा कि कुछ छात्रों को स्कूल आने के लिए काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. चीजों को आसान बनाने के लिए, हमने बच्चों को लेने और छोड़ने के लिए एक वैन सेवा की व्यवस्था की. जल्द ही, लोगों में बात फैलने लगी और कई स्थानीय लोग उनके समर्थन में आगे आए. एक व्यक्ति ने सभी बच्चों को स्कूल बैग दान में दिया.” इंस्पेक्टर त्यागी ने बताया.

पुलिस स्टेशन के कर्मचारी नियमित योगदान के माध्यम से अपनी मदद जारी रखे हुए हैं, चाहे वह छात्रों के लिए भोजन की व्यवस्था करना हो या खाली समय में शिक्षक की भूमिका में उनको पढ़ाना हो.

 

कई सारी ज़िंदगियाँ बदली हैं

गायत्री 6 वर्ष की एक छोटी लड़की है, जिसका दिन फुटपाथ पर भीख मांगने या अपने पिता के साथ कचड़ा इकठ्ठा करने में गुज़रता था. अब वह आसरा स्कूल में अक्षर और संख्या सीखती है. कहानी 5 वर्षीय अर्चना के लिए भी वैसी ही है, जिसके पिता प्लास्टिक के सामान बेचते हैं. यह उसके स्कूल जाने का पहला अनुभव है और वह काफी खुश है.

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