ख़बरें

लातूर के वॉटर मैन, जिन्होनें लातूर को कम बारिश में भी आत्मनिर्भर बना रखा है

तर्कसंगत

December 26, 2018

SHARES

महाराष्ट्र का लातूर जिला कुछ वर्षों से सुर्खियों में है, क्योंकि इस क्षेत्र में भयंकर सूखे की वजह से कई किसानों की आजीविका और जान खतरे में पड़ गई थी. जब अधिकांश किसान असहाय होकर बैठे थे, किसान महादेव गोमरे ने इस मुसीबत से लड़ने के लिए उपाय सोचा.

 

जल जागृति अभियान

2013 के बाद से, गोमरे ने लातूर के कई हिस्सों तक पानी पहुँचाने का प्रयास किया और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की, कि वे अपनी पानी की माँगों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर बनें.

लोगों को साथ लेकर गोमरे द्वारा शुरू की गयी इस जागरूकता अभियान को धीरे-धीरे आगे चल कर ‘जल जागृति अभियान’ का नाम मिला जो कि एक बड़े आंदोलन में परिवर्तित हुआ.

गोमरे ने 2013 के बाद से लातूर शहर के लगभग 3,000 घरों और बंगलों को जल संचयन (वॉटर हार्वेस्टिंग) के लिए संपर्क किया.

 

तर्कसंगत से बात करते हुए महादेव गोमरे ने बताया “पहले जब हमने दो तीन गाँवों को हमारे साथ जुड़ने के लिए कहा तो उन्होनें मना कर दिया, उनका कहना था कि वो इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी अपने कंधे पर नहीं उठा सकते, ये सरकार का काम है और उनको ही करना चाहिए.”

“मुझे उन्हें समझाने में कुछ समय लगा कि अगर हम सभी एक साथ काम करें तो यह इतना मुश्किल नहीं होगा. सूखे ने हमारे जीवन को इतना मुश्किल बना दिया कि यह ज़रूरी था कि हम सभी अपने हिस्से का काम करें ताकि सब के लिए काम आसान बन जाये” उन्होंने कहा.

 

सूखे से निपटने का तरीका

2013 के बाद से, गोमरे और उनकी टीम ने लातूर के कई घाटी में काम किया है, उन्होनें पानी के बहाव को भी बढ़ाने की कोशिश की है, उन्होंने एग्रोफोरेस्ट्री, सोशल फॉरेस्ट्री, और ग्राउंड वाटर टेबल को बढ़ाने के लिए भी अन्य तरीकों का मदद लिया है, जिसमें कम पानी की खपत से ज़्यादा फसल पैदा करना, कम्पार्टमेंट बन्डिंग, रिचार्ज वेल्स और इंडक्शन वेल्स का उपयोग करना शामिल है.

उन्होंने कहा, “शुरुआती दिक्कतों को छोड़ दें तो हमें लोगों से काफी मदद मिली है. बहुत से लोगों ने अपने हिस्से के काम को अच्छे से किया है और हमारी सहायता करने के लिए अपनी पूरी कोशिश की है. हम जो काम करते हैं, वह बहुत सारा पैसा खर्च किए बिना किया जा सकता है. यह हमारी जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) को भी जीवित रखता है, कुछ गाँवों से शुरू हो कर हमने 100 गाँवों में काम किया है. यह हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है.”

गोमरे के नेतृत्व में टीम ने नदी के किनारों को गहरा और चौड़ा करके कई वर्षों से मृत हो चुके जल निकायों को पुनर्जीवित करने का काम किया है. लोगों को यह एहसास दिलाया है कि उनके द्वारा पानी को बचाना और बढ़ाना कितना ज़रूरी है, जागरूकता अभियान और सामुदायिक सशक्तिकरण कार्यशालाएँ आयोजित की गई हैं. लोगों ने आंदोलन का समर्थन किया है और 15 करोड़ रुपये का योगदान भी दिया है.

 

 

“हम किसानों के लिए हमारे ज़मीन और फसल ही हमारे ज़िन्दगी का आधार है, पानी हमारे लिए कितना ज़रूरी है यह हमारे लिए बताना मुश्किल है. हमारी पहल से किसानों को कम लागत पर काम करने में मदद मिल रही है और फिर भी बहुत उपज मिल रही है. हालांकि विभिन्न कारणों से, देश भर में कई किसान ने आत्महत्याएं की हैं. फसलों की पैदावार में असफलता इसका एक प्रमुख कारण है क्योंकि फसल नहीं तो किसान का जीवन नहीं.” गोमरे जो आर्ट ऑफ़ लिविंग, महाराष्ट के प्रोजेक्ट्स डायरेक्टर भी हैं कहते हैं कि “इन वर्षों के दौरान मैंने जिन खेतों में काम किया है, वहाँ कोई आत्महत्या नहीं हुई है.”

गोमरे की पहल से, लातूर के सैकड़ों छोटे किसान प्राकृतिक खेती, वनीकरण, कृषि और नदी के कायाकल्प में रूचि ले रहे हैं और 2016 में, लातूर एक प्रमुख खाद्यान्न बाजार बन गया है. सात नदियों और सहायक नदियों का कायाकल्प किया जा रहा है. कम वर्षा के बावजूद, लातूर आत्मनिर्भर बना हुआ है.

“हम अक्सर अपनी कठिनाइयों के बारे में चिंता करते हैं और रोते हैं और उन्हें हल करने के लिए अन्य लोगों पर छोड़ देते हैं. अगर हम इसे स्वयं कर सकते हैं, तो हमें प्रयास करना चाहिए.

तर्कसंगत महादेव गोमरे को उनके दृढ़  प्रयास और सफलता के लिए बधाई देता है.

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...