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21 साल बाद असम को उसका बोगिबिल पुल मिला, जानिए की यह सेना के लिए ज़रूरी क्यों है ?

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Image Credits: The Times Of India

December 27, 2018

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25 दिसंबर को, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के सबसे लंबे रेलमार्ग पुल का उद्घाटन किया. 1997 में तत्कालीन प्रधान मंत्री एचडी देवेगौड़ा द्वारा इसका शिलान्यास किया गया था. 2002 में तत्कालीन प्रधान मंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के वक़्त 4.9 किमी के बेमिथेल बोगीबेल का काम शुरू हुआ था. इस पुल को बनने में पूरे 21 साल लग गए.

 

बोगीबिल ब्रिज कनेक्टिविटी को बेहतर बनाएगा

यह पुल, ब्रह्मपुत्र के बींचो बीच गुज़रती है, असम के डिब्रूगढ़ को सिलपाथर से जोड़ेगी जो अरुणाचल धेमाजी के बॉर्डर के पास है. लाइव मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, 5,900 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह एशिया का दूसरा सबसे लंबा रेल-रोड ब्रिज है, जो अनुमानित लागत से 85% की अधिक लागत से बना है.

पहले डिब्रूगढ़ से ईटानगर तक पाँच घंटे का सफर नाव द्वारा कर के 212 किमी की दूरी तय की जाती थी, अब सड़क मार्ग से यह तीन घंटे से भी कम समय में हो जायेगा. इसके अलावा, असम में तिनसुकिया और अरुणाचल के नाहरलागुन के बीच रेल यात्रा का समय भी 10 घण्टे कम हो जायेगा. यह पुल भारत का एकमात्र पूर्ण-वेल्डेड पुल भी है जिसके लिए यूरोपीय वेल्डिंग मानकों का पालन किया गया है और इसकी आयु 120 वर्ष बताई जा रही है.

 

मोदी ने तिनसुकिया-नाहरलागुन ट्रेन सेवा को हरी झंडी दिखाते हुए कहा कि केंद्र पूर्वोत्तर क्षेत्र में कनेक्टिविटी में सुधार करने के लिए प्रतिबद्ध है. एनडीए सरकार पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि 2004 में एनडीए सरकार सत्ता में थी, पुल को सात या आठ साल पहले पूरा किया जा सकता था, द टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया.

 

नाविकों को वैकल्पिक आजीविका ढूंढनी होगी

अरुणाचल प्रदेश और असम दोनों के मुख्यमंत्रियों ने पुल के उद्घाटन की सराहना करते हुए कहा कि इससे लोगों का जीवन आसान हो जाएगा. 40 से अधिक नाविकों का एक समूह, जो नदी के पार लोगों और सामानों को पहुँचाया करता था उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाएगी. ब्रह्मपुत्र के उत्तर और दक्षिण के किनारों से चलने वाली 40 नौकाओं में से दो सरकार द्वारा चलाई जाती हैं, जबकि बाकी सभी निजी हैं.

बोगीबील घाट पर एक निजी नौका ऑपरेटर ने पीटीआई के हवाले से कहा है, “12 सदस्यों के संयुक्त परिवार में, मैं और मेरा भाई बोगीबेल घाट से एक नाव चलाते हैं. प्रति वर्ष नाव के लिए 75,000 रूपये किराया और नाविकों के वेतन पर खर्च करने के बाद हम लगभग 30,000 रूपये प्रति माह कमा लेते थे. जबकि नावों पर नदी पार करने में लगभग 45 मिनट या दो घंटे तक का समय लगता था, नए पुल से इसे केवल 10 मिनट तक का समय लगेगा.”

राज्य अंतर्देशीय जल परिवहन विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, सरकारी नावों की तुलना में, निजी नाव अधिक शुल्क लिया करते थे और उन्हें अब अन्य घाटों पर स्थानांतरित कर दिया जाएगा.

 

सैनिकों के लिए महत्वपूर्ण

इस क्षेत्र में कनेक्टिविटी में सुधार के अलावा, पुल अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन बॉर्डर के पास सैनिकों के आवागमन के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी प्रणव ज्योति शर्मा ने कथित तौर पर कहा है कि यह पुल भारतीय सेना को सैन्य सहायता प्रदान करेगा.

पुल 1985 के असम समझौते में अपने निशान पाता है और क्षेत्र की प्रमुख अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में से एक के रूप में खड़ा है. पड़ोसी चीन द्वारा व्यापक ढांचागत विकास ने भारत को यह कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है.

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