सप्रेक

चेन्नई के 99 वर्षीय बुज़ुर्ग हिमालय पर अपनी 30 चढ़ाई के लिए तैयार

तर्कसंगत

Image Credits: News18

December 31, 2018

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आपके मन में ऐसा कितना बार हुआ है कि आप किसी रोमांचक यात्रा करने की सोचते हैं लेकिन कुछ कारणों से उसे स्थगित कर देते हैं. चिंता न करें कि आप अकेले नहीं हैं, हम में से सभी ऐसा ही करते हैं. हालांकि द हिंदू के रिपोर्ट के अनुसार, पी चित्रन नंबूदरीपाद के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता है, जो 99 वर्ष के हैं और इस महीने की शुरुआत में 29 वीं बार हिमालय पर ट्रेकिंग की है.

पी. चित्तरंजन नंबूदरीपाद, जो केरल शिक्षा विभाग के पूर्व अतिरिक्त निदेशक हैं, हिमालय के साथ एक विशेष सम्बन्ध रखते हैं. उनकी महत्वाकांक्षा 30 वीं बार अपने 100 वें जन्मदिन पर अगले साल हिमालय ट्रेक करने की है. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिक्षाविद् ने इस साल दिसंबर के पहले सप्ताह में बद्रीनाथ और केदारनाथ को कवर किया. उन्होंने तिरुवनंतपुरम से 118 सदस्यीय समूह के साथ यात्रा की थी.

 

हिमालय की कहानियों ने रुचि जगाई

श्री नंबूदरीपाद ने याद किया कि काशी नामीबेशन नाम के एक बूढ़े व्यक्ति थे, जो मलप्पुरम जिले के मुक्कुटला गाँव में अपने पकरवुर मन घर के पास रहा करते थे. वह दस बार काशी गए थे. एक बार वे हिमालय भी गए थे. उनकी हिमालय की यात्रा की कहानी ने नंबूदरीपाद को हिमालय की तीर्थयात्रा करने के लिए मजबूर किया. उन्होंने कहा कि हिमालय की शांति किसी को भी आकर्षित कर सकती है.

 

पहली यात्रा की असफलता ने उन्हें और प्रेरणा दी

नंबूदरीपाद ने 1952 में हिमालय की अपनी पहली यात्रा की, जब वह नौकरी में थे और तीस साल के थे. हालाँकि, यह यात्रा असफल रही क्योंकि वह और उनके दोस्त रुद्रप्रयाग से आगे नहीं जा सके क्योंकि वे फूड प्वाइजनिंग से पीड़ित थे. 1956 में हुई उनकी अगली यात्रा सफल रही. उन्होंने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि उन दिनों हिमालय की यात्रा करना कठिन था, क्योंकि सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे नहीं थे. उन्हें रुद्रप्रयाग से बद्रीनाथ पहुँचने के दौरान जंगलों से होकर 90 किमी से अधिक पैदल चलना पड़ता था.

 

योग, सैर और उचित आहार उनका रहस्य है

फिटनेस और तेज याददाश्त के लिए उनका रहस्य यह है कि वे एक उचित शाकाहारी भोजन का पालन करते हैं. वह टहलने और योग करने भी जाते हैं.

श्री नंबूदरीपाद ने 1947 में पचायप्पा कॉलेज, चेन्नई से पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद 1947 में मुक्कुटला में एक हाई स्कूल की स्थापना की. बाद में, उन्होंने 1 रूपये की टोकन राशि पर केरल सरकार को स्कूल सौंप दिया. यह उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण क्षण था.

तर्कसंगत उनके इस साहस का सम्मान करता है और उनके इस उत्साह की सराहना करता है और चाहता है कि वह अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर सकें.

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