मेरी कहानी

मेरी कहानी: “मैंने न चाहते हुए भी एक जोकर की भूमिका निभाई” ब्लाइंड IAS अधिकारी की एक प्रेरणादायक कहानी

तर्कसंगत

Image Credits: HUMANS OF LBSNAA

January 2, 2019

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“भारत में विकलांगों की कम से कम संख्या पूरी जनसँख्या की 2% से अधिक है. उनमें से ज्यादातर हर पल एक खामोश लड़ाई लड़ रहे हैं और हर दिन छोटी जीत हासिल कर रहे हैं.

इस समुदाय से संबंधित हो कर, मुझे खुशी होती है और पिछले कुछ महीनों में मुझे काफी हद तक पहचाने जाने और सराहे जाने का सौभाग्य मिला है. और एक ही समय में लुई ब्रेल, हेलेन केलर और कई अन्य लोगों के प्रति, मैं कृतज्ञ महसूस करता हूँ.

मैंने हमेशा माना है कि शब्द “हैंडीकैप” दो सकारात्मक शब्दों का एक संघ है एक जो हैंडी और दूसरा कैप है, दोनों ही सहायता की भावना को दर्शाते हैं. हैंडी का मतलब किसी के लिए उपयोगी होना है, और कैप जो आपको तेज धूप में छाया देती है और बारिश की बूंदों से ही बचाती है.

मैं कर्नाटक के तुमकुरु जिले के चौडानाकुप्पे नाम के एक गाँव में पैदा हुए था और कक्षा 4 तक मैं गाँव के स्कूल में ही पढ़ा था.

बहुत जल्दी, मुझे ब्लैकबोर्ड पढ़ने में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा लेकिन एक बच्चे के रूप में, मैं इसे (समस्या) समझ नहीं पाया. मेरे माता-पिता दोनों अनपढ़ थे, आजीविका जुगाड़ने में व्यस्त थे और मेरे भाई की बीमारी के साथ संघर्ष कर रहे थे जो अपने पैरों में गतिशीलता खोते जा रहा था.

इसलिए इसे भाग्य और उपेक्षा कहें, मैंने 9 साल की उम्र तक अपनी दृष्टि पूरी तरह से खो दी थी.

यह मेरे परिवार के लिए एक झटका था और उन्होंने मेरा इलाज कराने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. सौभाग्य से मेरे चाचा ने मुझे मैसूर में अंधों के एक स्कूल में भर्ती करा दिया और मैंने फिर से पढ़ाई शुरू की.

इस नए अंधेपन के साथ मुझे मेरे आस पास की चीज़ों से पहले अवगत होना था, ताकि मुझे अँधा कह कर यह समाज हतोत्साहित न कर दे और हारे हुओं की श्रेणी में न डाल दे. कई बार टॉयलेट का रास्ता न ढूंढ पाने की स्थिति में  स्कूल के गलियारे या कक्षा में ही मैं पेशाब कर दिया करता था और आस पास के लोगों में घृणा का कारण बनता था.  मैंने न चाहते हुए भी एक जोकर की भूमिका निभाई, जो अपने कपड़े कभी सीधे उलटे पहन लिया  करता था. लेकिन इसके साथ ही मैं कक्षा में अव्वल रहा, मुझे सम्मान मिला. मैंने मैसूर के उसी स्कूल में कक्षा 10 तक अपनी शिक्षा पूरी की; जब भी मैं वहां बिताए गए सभी वर्षों के बारे में सोचता हूं, तब मैं भावुक हो जाता हूँ.

मैंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की, जहाँ मुझे मेरी भावी पत्नी अचिंता से मुलाकात हुई, उससे मुझे हर चीज के लिए दृढ़ समर्थन मिला. मैं बाद में नौकरी खोजने लगा, लेकिन नौकरी पाने के बावजूद मेरे अंदर एक असंतोष पनपता गया और मैंने यूपीएससी की तैयारी करने का फैसला किया. मेरी पत्नी मेरी तैयारी के लिए प्रतिदिन 10 घंटे के करीब समर्पित रहती है, वह  नोट्स ज़ोर ज़ोर से पढ़कर मुझे सुनती, मेरे लिए ऑडियो नोट्स बनाती.

लोग कहते हैं मैं जीवन में बहुत आगे निकल गया हूँ, लेकिन किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह कहाँ से आया है. मेरे मन में, विकलांगता प्रमाण पत्र पाने के लिए कई यात्राएं करने वाली मेरी कमजोर माँ की मेहनत और उस पर 50 रुपये खर्च करना मुझे आज भी झकझोर देता है.

“लेकिन मैं इस कहानी को इसलिए बता रहा हूँ कि आप इससे कमज़ोर नहीं बनिए – मैं इसे इसलिए बता रहा हूँ कि आप कभी भी आकांक्षा करना बंद न करें और कभी हार न मानें.”

“A conservative estimate of disabled in India is over 2% of the population. Most of them are fighting silent battles…

Posted by Humans of Lbsnaa on Tuesday, 21 August 2018

 

कहानी – कम्पाहोनेय्या. IAS 2017 बैच. पश्चिम बंगाल कैडर

 

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