सचेत

सचेत : भारतीय संविधान में बहुओं को दिए गए अधिकार

तर्कसंगत

January 7, 2019

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भारत में बहुओं के लिए कोई विशेष कानून नहीं है, मगर ऐसे काफी अधिकार हैं जो उन्हें सशक्त बनाते हैं जो कि आम लोगों को मालूम नहीं हैं.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 (3) राज्यों को महिलाओं और बच्चों के लिए कोई विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है. कई पीढ़ियों से महिलाओं को सभी स्तरों पर भेदभाव का शिकार होना पड़ा है, हालांकि, यह अनुच्छेद अपने माध्यम से उन सारे भेदभाव को ख़त्म करने का प्रयास करता है.

 

बहुओं के लिए कुछ ज़रूरी अधिकार चाहे वह किसी भी धर्म की हो

 

1.सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीने का अधिकार
सम्मान के साथ और पति, ससुराल वालों के समान जीवन शैली मिलना एक बहु का अधिकार है, मानसिक और शारीरिक यातना से मुक्त होना भी उसका अधिकार है.

बहुत कम लोग जानते हैं कि घरेलू हिंसा को तलाक के लिए इस्तेमाल करने के अलावा, घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत एक विवाहित महिला अपने पति को “शांति बनाए रखने के लिए” या “अच्छे व्यवहार करने के लिए” बांड भरवा सकती है और साथ ही एक्सक्यूटिव मजिस्ट्रेट पति और ससुराल वालों को घरेलू हिंसा पर रोक लगाने का आदेश दे सकते हैं. पति को सिक्योरिटी के रूप में धन या संपत्ति जमा करने के लिए भी कहा जा सकता है, अगर वह दोबारा से हिंसक होगा तो उसे धन, सम्पति सरेंडर कर देना पड़ेगा.

2. रखरखाव का अधिकार
सभ्य जीवन स्तर और जीवन की बुनियादी सुविधाएं प्राथमिक अधिकार हैं जो एक पत्नी को अपने पति द्वारा दिए गए हैं. भले ही पति-पत्नी के रिश्ते में खटास आ जाए, लेकिन पति को अपनी पत्नी और बच्चों को भोजन, कपड़े, निवास, शिक्षा और चिकित्सा उपस्थिति / उपचार सहित बुनियादी रखरखाव प्रदान करने के अपने कर्तव्य से दूर नहीं किया जाता है, जैसा कि 125 आपराधिक प्रक्रिया कोड 1973 में लिखा है.

 

हिन्दू बहुओं के लिए अधिकार

 

 

1.स्त्रीधन का अधिकार

स्त्रीधन का मतलब उन उपहारों से है जो एक महिला को विवाह से पहले या विवाह समारोह के दौरान और प्रसव के दौरान प्राप्त करती है. इसमें कोई चल, अचल संपत्ति, उपहार, पैसा आदि शामिल हैं.

विवाहित महिला के लिए स्त्रीधन को उपहार देने के पीछे मूल विचार यह है कि उसे शादी के बाद वित्तीय संरक्षण मिले.

स्त्रीधन कैसे संरक्षित करता है?

घरेलु हिंसा: घरेलू विवाह अधिनियम, 2005 की धारा 3 के तहत यह एक विवाहित महिला को आर्थिक शोषण से बचाता है और इस तरह के मामले में पति और ससुराल वालों को दंडित किया जा सकता है.
क्रिमिनल ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट: जब पत्नी अपनी स्ट्रेंथन प्रॉपर्टी अपने पति या परिवार के किसी अन्य सदस्य को सौंपती है और पति या परिवार उसका कोई गलत इस्तेमाल करते हैं, तो वह धारा 405 भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत आपराधिक विश्वासघात का मामला बनता है.
हिंदू उत्तराधिकार: स्त्रीधन पर एक हिंदू महिला का अधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 के तहत संरक्षित है, जिससे वह स्त्रीधन की पूरी मालिक होती है. यहाँ तक ​​कि अगर यह धन उसके पति या उसके ससुराल वालों की संरक्षण में हैं, तो भी उसके मांगे जाने पर उन्हें स्त्रीधन उसे देना होगा वह केवल उस धन के ट्रस्टी माने जाते हैं.

2.एक वफादार रिश्ते का अधिकार  

एक शादी लंबे समय तक और मजबूत नहीं रह सकती जब तक कि दोनों भागीदारों में एक दूसरे के प्रति वफ़ादारी न हो. जब तक की कानूनी तलाक नहीं हो जाता है, एक विवाहित महिला को एक प्रतिबद्ध संबंध रखने का अधिकार है, जिसका अर्थ है कि उसके पति के किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध या अतिरिक्त-वैवाहिक संबंध नहीं हो सकते. हालांकि, अगर विवाह के अलावा कोई संबंध है कि पति किसी अन्य महिला के साथ रहता है, तो पत्नी अपने पति पर व्यभिचार का आरोप लगा सकती है, जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक के लिए भी एक आधार है.

3.ससुराल के घर का अधिकार 

कहावत है कि “एक बार शादी करने के बाद, एक महिला अपने ससुराल को छोड़ती है जब उसे अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाए”.

एक महिला जब अपने पति के साथ आ कर जिस घर में रहती है उसे ससुराल कहा जाता है. वह या तो उसके माता-पिता हो सकता है, किराए का हो सकता है या ऑफिस के द्वारा दिया घर हो सकता है. इस बात पर ध्यान दिए बिना कि वैवाहिक घर पैतृक है या संयुक्त परिवार का घर है, बहू को इसमें निवास करने का अधिकार है, चाहे वह इसकी मालिक हो या न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पति द्वारा उकसा जाने पर एक विवाहित महिला की आत्महत्या के फैसले में कहा है कि “बहू को एक परिवार के सदस्य के रूप में माना जाना चाहिए, नौकरानी के रूप में नहीं, और उसे अपने वैवाहिक घर से किसी भी समय बाहर नहीं निकाला जाना चाहिए”.

4.पैतृक संपत्ति का अधिकार 

समय बदलने के साथ कानून भी बदल गए हैं और अब बेटियां शादी के बाद भी अपने भाई-बहनों के बराबर हैं.

वंशानुक्रम: 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में पेश किए गए संशोधन, हर बेटी को, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, पिता की मृत्यु के बाद अपने पिता की संपत्ति को प्राप्त करने की अनुमति देती है. इतना ही नहीं बेटियों की माँ की संपत्ति में भी हिस्सेदारी है.
इसके अलावा, यदि पिता अपनी मृत्यु से पहले वसीयत नहीं छोड़ता है, तो बेटियों को भी बेटों की तरह पिता की संपत्ति में समान रूप से भाग लेने का अधिकार है. इसका मतलब है कि यदि आपके पिता जीवित हैं या 2005 के बाद उनकी मृत्यु हो गई है, तो आप अदालत के दरवाजे खटखटा सकते हैं और पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा पाने के लिए कानूनी मदद ले सकते हैं.

बेटियों के रूप में अधिकार 2005 में उत्तराधिकार कानूनों में संशोधन होने तक बेटियों को हमेशा इस चीज़ से बाहर रखा गया था, अब परिवार की महिलाएं भी जन्म से ही अविभाजित संपत्ति में समान रूप से हिस्सा पाने का अधिकार रखती हैं. उनके पास बेटे के समान अधिकार और दायित्व हैं.

 

मुस्लिम बहुओं के लिए अधिकार

 

 

1.मेहर का हक़

स्त्री धन के समान ही मुस्लिम कानून में, मेहर का रिवाज़ है जो निकाह के वक़्त ज़रूरी है. प्रत्येक मुस्लिम महिला को मेहर का हक़ है, जो उसके पति द्वारा शादी के वक़्त दिया जाता है. यह नकद, आभूषण, एक घर या कोई भी मूल्यवान संपत्ति हो सकती है, जो मुस्लिम महिला की पूर्ण संपत्ति बन जाती है, जिसका वह उपयोग अपने मन मुताबिक़ कर सकती है.

अगर मेहर का भुगतान नहीं किया जाता है तो क्या करें?

सेक्स से इंकार : शादी से पहले, जब तक मेहर का भुगतान नहीं किया जाता है, तब तक पत्नी को पति के साथ सहवास का विरोध करने का अधिकार है.

बकाया मेहर का भुगतान: पत्नी कानून की मदद से बकाया मेहर की राशि की मांग कर सकती है. पत्नी की मृत्यु के बाद भी, उसके वारिस इसकी मांग कर सकते हैं.

प्रतिधारण का अधिकार: यदि किसी पत्नी ने अपने बकाया मेहर की राशि के प्राप्त न करने पर अपनी पति की सहमति से उसकी संपत्तियों को प्राप्त किया है, तो उसके मृत्यु के बाद भी उस सम्पति पर पत्नी का हक़ होगा जब तक कि उसकी बकाया मेहर की राशि उसे नहीं मिल जाती.
रखरखाव: मेहर को आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत रखरखाव का हिस्सा भी माना जाता है, अदालतें पति की वित्तीय स्थिति, पत्नी की उम्र, रहने की लागत, पत्नी की संपत्ति लेकर विचार कर के मेहर की रक़म तय कर सकती है.
इसके अलावा, मेहर को मुस्लिम महिलाओं (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत तलाक़ के वक़्त भी माँगा जा सकता है.

2.संपत्ति का अधिकार

गैर-वसीयतनामा उत्तराधिकार के लिए, मुस्लिम पर्सनल (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 लागू है. मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार, दोनों पुरुषों और महिलाओं को समान संपत्ति के कानूनी उत्तराधिकारी बनने के लिए समान अधिकार हैं.

उत्तराधिकार का अधिकार बेटी को विरासत में मिली संपत्ति से भाई की तरह आधा हिस्सा पाने का हक है. मामले में, कोई भाई नहीं है, तो बेटी को निहित संपत्ति के आधे हिस्से की हकदार है.

पति की मृत्यु के बाद अधिकार मुस्लिम महिला के पति की मृत्यु की स्थिति में, यदि बच्चे हैं तो विधवा को संपत्ति का एक-आठवां हिस्सा मिलता है. यदि कोई बच्चा नहीं है, तो विधवा संपत्ति का एक चौथाई हिस्सा पाने की हकदार है.

तलाक के बाद का अधिकार 

अगर किसी विवाहित महिला का तलाक हो जाता है, तो मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अनुसार मासिक धर्म और गर्भधारण के अनुसार इद्दत की अवधि समाप्त होने तक रखरखाव शुल्क पति द्वारा पूरा किया जाना चाहिए.

इद्दत अवधि के बाद, यदि महिला फिर से शादी नहीं करती है और खुद का खर्च उठाने में असमर्थ है, तो वह मुस्लिम महिलाओं (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम की धारा 4 के अनुसार अपने माता-पिता या जिला वक्फ बोर्ड से रखरखाव की मांग करती है.

इसके अलावा, एक मुस्लिम विवाहित महिला भी वकील की मदद से मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के प्रावधानों के अधीन आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत रखरखाव की मांग कर सकती है.

 

 

 

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