मेरी कहानी

मेरी कहानी: जब हम मॉल्स में मोल भाव नहीं करते तो फेरीवालों से मोल भाव क्यों करना ?

तर्कसंगत

January 15, 2019

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दूसरों के प्रति उदार होने के लिए हमें अमीर पैदा होने की ज़रूरत नहीं है और न ही ऐसा करने से हम  गरीब होने वाले हैं. मैं आपको कुछ छोटे टिप्स देती हूँ, जो दूसरे के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकते हैं.

 

उन छुट्टे पैसों को जाने दीजिये

भारत जैसे देश में रह कर हम सभी रिक्शा, टैक्सी और स्ट्रीट फूड के निश्चित ग्राहक हैं, हमारे पास इस तरह के लोगों के प्रति उदार होने का एक बड़ा अवसर है. ऐसे लोग सड़कों पर पूरे दिन काम करते हैं लेकिन फिर भी ज़्यादा नहीं कमा पाते हैं.  मेरे कहने का मतलब है कि जब हम उनसे कोई भी चीज़ खरीदते हैं तो बदले में मिलने वाले छुट्टे पैसे उनसे न लें. अगर आप किसी पानीपुरी वाले को आपके कुल बिल 40 रुपये के लिए 50 रुपये का नोट देते हैं तो आप 10 रुपये का बैलेंस क्यों नहीं छोड़ देते? जब वह उन 10 रुपयों को देख कर मुस्कुराएगा तो आपको भी संतुष्टि मिलेगी. जब आपका रिक्शा मीटर 80 रुपये का होता है और आप 100 रुपये देते हैं, तो क्या वह 20 रुपये न लेने से यह आपके महीने के बजट को कितना बिगाड़ पायेगा, एक ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए कि हमारे देश में सभी लोग एक दूसरे के लिए दयावान बनें उदार बनें, छोटी छोटी रूप में ही सही मगर उनके लिए कुछ अच्छा करें.

 

बुज़ुर्ग और बच्चों के साथ कोई शाम बिताएं

आपको लोगों की सहायता करने के लिए अनाथालय या वृद्धाश्रम बनाने की ज़रूरत नहीं है. सौभाग्य से, अमीर लोग हैं, जो हमारे लिए पहले ही ऐसा कर चुके हैं. हमें बस इतना करना है कि हम अपनी इच्छा से उनके चेहरे पर मुस्कान ला सकें. किसी भी वीकेंड में ऐसे “हैप्पी प्लेस” पर जाएं और उन्हें पास के एक दूकान पर ले जाकर उनके मनपसंद की चीज़ उन्हें खरीद कर दें. उन्हें उनकी मनपसंद कैंडी या खिलौने से ज़्यादा और कुछ नहीं चाहिए, भले ही साल या तीन महीने में एक बार ही सही उन बच्चों को यह एहसास तो मिलेगा कि माता पिता का प्यार कैसा होता है? तो क्या ऐसा करने से आपको किसी को खुश करने की संतुष्टि की भावना नहीं मिलेगी? साथ ही साथ आपको यह सब कुछ करने में इतने पैसे भी खर्च नहीं करने होंगे कि आपके लिए कुछ बचे ही नहीं, कभी ऐसा करके देखिये अच्छा लगेगा.

 

फेरीवालों से मोलभाव न करें

हमारे पास लोगों की मदद करने के लिए सबसे आसान साधन है हमारी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने वाले लोग. जो हर सुबह हमें हममरे घर आ कर सब्जियां, फूल आदि बच जाते हैं. हम उन्हें यह महसूस क्यों नहीं कराते हैं कि मानवता अभी भी अस्तित्व में है जब आप उनसे एक रूपये के लिए मोल भाव नहीं करते मगर इसके बदले 50 या 100 रुपये अतिरिक्त भुगतान करते हैं, जिससे पता चलता है कि उनके जैसे लोगों के लिए यह कितना बड़ी बात हो सकती है. हमें शोरूम या मॉल में मोलभाव करने का कोई अवसर नहीं मिलता, लेकिन जब हमें वह स्वतंत्रता दी जाती है, तो हम इन फेरीवालों के साथ मोलभाव करते हैं. क्या यह सही है ?

 

जरुरत न हो फिर भी खरीद लें

कभी कभी मैं वैसी चीज़ भी खरीद लिया करती हूँ, जो मुझे मालूम है कि मैं इस्तेमाल नहीं करुँगी. एक बार मैंने सड़क पर लम्बी कलम बेच रहे बच्चे से कलम खरीदने से मना कर दिया था, उसके बाद उसके चहरे की मायूसी देख कर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने वह लगभग न लिखने वाली लम्बी कलम खरीद ली, क्या पता उस पैसे से उसे एक वक़्त का खाना मिल जाए या वह बच्चा अपनी स्कूल की फीस दे पाए. हमारे लिए कई बार उन चीज़ों की ज़रूरत नहीं होती मगर हम ये छोटा सा काम दूसरों की ज़न्दगी में एक  परिवर्तन लाने के लिए तो कर ही सकते हैं.

 

छोटी नौकरियों की आउटसोर्सिंग

जब हम कभी कभी उस स्पेशल चाय के लिए 1 किमी की दूरी तय कर सकते हैं, तो हम उनके व्यवसाय को बढ़ाने में मदद करने के लिए कुछ प्रयास क्यों नहीं करते हैं? आपके ऑफिस के पास कम किराये की छोटी सी जगह उनके व्यवसाय को बढ़ने में काफी मदद कर सकती है या उन्हें ऑफिस से अनुमति दिलाकर आपके ऑफिस में चाय बांटने देना उनकी आमदनी बढ़ाकर उनके कई सारे मुश्किलों को हल कर सकता है.

शोध के अनुसार, यह पता चला कि प्रत्येक अमीर व्यक्ति अपनी आय का 1% परोपकारी गतिविधियों पर दान करता है। ठीक है, कई बार एक अमीर व्यक्ति की आय का 1 % हमारी आय का 100% हो सकता है। लेकिन क्या केवल इतना सोचकर हमें दूसरों के प्रति अपनी उदारता छोड़ देनी चाहिए ? मुझे यकीन है कि आप इसके लिए ना नहीं कहेंगे । हम सभी को भारत जैसे देश में ऐसी छोटी छोटी उदारता वाले सोच के प्रति जागरूक होना चाहिए।  सोचिये हमारे सवा सौ करोड़ वाले देश में यदि हर व्यक्ति अपनी तरफ से थोड़ा उदार हो जाये तो कितना अच्छा हो!

अंत में, मैं कहना चाहूंगी कि ये केवल कुछ उदाहरण ही हैं जिन्हें मैंने साझा किया है और कम सामर्थ्य वाले लोगों की सहायता करने के लिए ऐसे 100 तरीके हो सकते हैं. मनोविज्ञान के अनुसार, एक आदमी को परम संतुष्टि प्राप्त करने का एकमात्र तरीका दान या परोपकारी गतिविधियों ही हैं.

 

कहानी: चेतना जगदीश (तेजस्विनी जगदीश)

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